सरकार और अफसर व्यवस्था के नाम अन्नदाता की जान दांव पर लगा रहे हैं। सिंचाई को दिन में बिजली न देकर उनकी जान से खेल रहे हैं।
कड़ाके की सर्दी में खुले आसमां तले पानी के बीच खड़ा रहने में केवल अन्नदाता ही जोखिम नहीं ले रहा, पीछे उनके परिवार भी इस सितम को सह रहे हैं। यह एेसी पीड़ा है जिसे वे किसी से कह ते नहीं पाते, बस सहन कर आंसुओं के घूंट पी जाते हैं। 'पत्रिका' ने गांवों में पहुंच कृषक महिलाओं, परिजनों से सामाजिक, पारिवारिक जीवन के अनछुए पहलुओं को टटोला तो कई बातें एेसी सामने आई कि बयां नहीं की जा सकती।
'वो' खेत में अकेले, हम घर पर बेसहारा
खेत में लहसुन की खरपतवार साफ कर रही महिलाएं प्रकाशी बाई नायक, रामकन्या मेरोठा, ललिता नायक, कजोड़ी मेरोठा, कौशल्या नागर, संतोष नायक अलग दर्द छलका। बोलीं, 'घर के धणी तो रात भर खेतों में रहते हैं। रात में हम लोग घर पर बच्चे, या माता-पिता के साथ अकेले किसके भरोसे रहें। बीमार भी हो जाएं तो डॉक्टर तक जाने को तरस जाते हैं। खेत में पूरी रात भर धणी नंगे पैर घूमते हैं। हमे हमेशा चिंता सताती है। सुबह जब तक वे घर नहीं आ जाएं, सांसें अटकी रहती हैं।
डराती हैं सुनसान राहें
बरगू गांव के एक खेत में एक दर्जन से अधिक महिलाएं लहसुन की खरपतवार हटाती दिखाई दी। खेत की मालकिन सुरजा बाई मीणा ने बताया कि रात में लाइटें आने के कारण पति मजदूर के साथ पूरी रात भर खेत में ही रहते हैं। सुबह वे घर चले जाते हैं। एेेसे में खेत में लगे सबमर्सिबल व अन्य सामानों की रखवाली के लिए उन्हें घर के काम जल्दी निपटाकर खेत में आना पड़ता है। सुनसान खेतों में अकेला रहने से डर लगता है।
लगाणा पड़े छै 3 चक्कर
बारां रोड पर ताथेड़ से आगे पौलाईकलां गांव में प्रवेश करते ही महिला पुराने गेहूं को बीज के लिए तैयार करती मिली। खेत में नलकूप के बारे में पूछा तो बताया कि रात को ही खेत में पलेवा करके निपटे हैं। बात चल ही रही थी कि 60 वर्षीय सुगना बाई मीणा बोल उठी, 'लाइटां दन मं क्यूं नी आवै। पूरी रात काळी करणी पड़े छै। दन में भाया जी सोबा क ले ख घर आ जावे छै तो वां ने सामाना की रुखाळी करबा क ले ख दन भर खेत मं रहणी पड़े छै। अस्या सुबह, दुपैरी, शाम तीन चक्कर खेत का लागे छै। अगर दन मं लाइटां आवे तो भायो स्याम की घर पै तो आ जावे।'
अकड़ जाते हैं हाथ पैर
सुगना के साथ ही काम कर रहे बुजुर्ग पति अमरलाल ने बताया कि पाणत में बच्चे खेत पर आते हैं। वो खुद भी उनके साथ आते हैं। वो चिंता के साथ बोले, 'रात-रात भर खेतां मं कब तक रहवां। ...पूरी रात भर ही म्हाके तो चक्कर ही लाग्या रैवे छै। बूढ़ारा मं भी साता कोनी। सर्दी में पाणी में रहबा सूं हाथ पांव भी अकड़ ग्या।'