
कोटा .
राज्य सरकार की ओर से लाए गए राजस्थान क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट आर्डिनेंस-2017 को अभिभाषकों ने जनविरोधी बताते हुए इसे वापस लेने की मांग की है। वकीलों ने कहा कि कुछ दागी लोकसेवकों को बचाने के लिए इस तरह का बेतुका कानून लागू करने पर सरकार आमादा है। न्यायपालिका तक के अधिकारों को सीमित करने का प्रयास किया जा रहा है। कानून वापस नहीं लिए जाने तक विरोध जारी रहेगा।
सरकार की ओर से लाए जा रहे इस काले कानून के खिलाफ सोमवार को अदालत परिसर में परिषद सभागार में आयोजित टॉक शो में वकीलों ने इस कानून पर कड़ी नाराजगी जाहिर की है। टॉक शो में अभिभाषकों ने 'पत्रिका' के 'जब तक काला, तब तक ताला' शीर्षक से प्रकाशित अग्रलेख की प्रशंसा करते हुए कहा कि इसमें बेबाकी से काले कानून की खामियों को उजागर किया है। टॉक शो में परिषद के महासचिव समेत एक दर्जन से अधिक वरिष्ठ वकीलों ने विचार व्यक्त किए।
मंशा में ही खोट
पूर्व अध्यक्ष रघुनंदन गौतम का कहना है कि सरकार भ्रष्ट लोकसेवकों व राजनेताओं को बचाने के लिए कानून ला रही, जबकि इसकी कोई जरुरत नहीं है। भ्रष्ट लोक सेवकों के खिलाफ 6 महीने तक सरकार मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं देगी, तब तक आरोपित सभी सबूत नष्ट कर देगा। सरकार की मंशा सही नहीं है।
भ्रष्टाचार बढ़ाने वाला
पूर्व महासचिव दीपक मित्तल का कहना है कि अध्यादेश का कोई औचित्य नहीं। सरकार भ्रष्टाचार को बढ़ाने का काम कर रही है। इस कानून में जिस तरह के प्रावधान किए गए हैं, वे किसी भी तरह से मान्य नहीं हैं। लोकतंत्र का मजाक उड़ाया जा रहा और मीडिया की स्वतंत्रता खत्म की जा रही है।
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न्यायपालिका पर ही प्रश्नचिह्न
वरिष्ठ अधिवक्ता सलीम खान का कहना है कि सरकार ने पहले अध्यादेश लाकर, फिर प्रवर समिति को सौंप कर गलती की है। मंशा में खोट नजर आ रहा। सरकार दागियों को बचाने के लिए न्यायपालिका की कार्यवाही तक पर प्रश्न चिन्ह लगा रही है। सरकार को इसे वापस लेना ही होगा।
हौसले होंगे बुलंद
पूर्व उपाध्यक्ष सुरेन्द्र शर्मा का कहना है कि अध्यादेश में दागी लोकसेवकों के नाम व पहचान उजागर करने पाबंदी लगाई गई है। इससे भ्रष्टों के हौसले बुलंद होंगे। उनके खिलाफ मीडिया में भी खबर प्रकाशित नहीं की जा सकेगी। ऐसा करने पर सजा का प्रावधान चौथे स्तम्भ को बांधने का प्रयास है।
रामगोपाल चतुर्वेदी का कहना है कि पुलिस को अधिक अधिकार अध्यादेश में न्यायपालिका की शक्ति को तो सीमित कर पुलिस को अधिक अधिकार दिए गए। दागी लोक सेवकों के खिलाफ अदालत सरकार की अनुमति के बिना मुकदमा दर्ज का आदेश नहीं दे सकती, जबकि पुलिस को बिना मंजूरी केस दर्ज करने का अधिकार दिया है।
सरकार इसे वापस ले
वरिष्ठ अधिवक्ता राम किशन वर्मा का कहना है कि कानून में पहले से ही कई प्रावधान हैं। अदालत में परिवाद आने पर पीठासीन अधिकारी उसे जांचने के बाद ही मुकदमा दर्ज करने के लिए संबंधित थाने में भेजते हैं। इस काला कानून को लाने की जरुरत ही नहीं है। सरकार हठधर्मिता कर रही। वकील ही नहीं, लोकसेवक व जनता भी इसके खिलाफ हैं।
जनता को गुमराह करने की कोशिश
वरिष्ठ अधिवक्ता राम स्वरूप ऋषि का कहना है कि सरकार ने मंशा जाहिर कर दी कि वह भ्रष्टाचार को बढ़ावा देना चाहती है। चौतरफा विरोध होने पर किरकिरी हुई तो इसे प्रवर समिति को सौंपा, लेकिन यह भी जनता को गुमराह करने का ही प्रयास है। हकीकत में अध्यादेश लागू ही है।
खुद के पैर पर कुल्हाड़ी
वरिष्ठ अधिवक्ता राजेन्द्र गौतम का कहना है कि सरकार काला कानून लाकर जनता में सही संदेश नहीं दे रही। न्यायपालिका की कार्यप्रणाली को सीमित दायरे में बांधकर सरकार अपने ही जड़ें कमजोर कर रही है।
किसी के हित में नहीं
अधिवक्ता जितेन्द्र पाठक का कहना है कि सरकार अपने चहेते भ्रष्ट लोक सेवकों व राजनेताओं को बचाने के लिए इसे लागू कर रही। लेकिन, यह किसी के भी हित में नहीं है। सरकार को इसे वापस लेना ही होगा।
भ्रष्ट लोकसेवकों को बचाने का कानून
अभिषेक पाठक का कहना है कि इस कानून के तहत भ्रष्टाचार में लिप्त लोग बेनकाब नहीं हो पाएंगे, उनके हौसले और बुलंद होंगे। सरकार को इस कानून को वापस लेना ही होगा।
मीडिया पर पाबंदी गलत
अधिवक्ता अतीश सक्सेना का कहना है कि मीडिया चौथे स्तम्भ की भूमिका निभाता है। लोकसेवकों के द्वारा भ्रष्टाचार करने पर उनके कारनामों को मीडिया ही उजागर करता है। ऐसे में मीडिया पर ही उनके नाम व पहचान उजागर करने पर रोक लगाना गलत है। खबर छापने पर दो साल की सजा का प्रावधान करना उससे भी गलत है। इसे वापस लिया जाए।