
Medical Device Pricing Regulation: आज के समय में एक आम आदमी को सबसे ज्यादा डर बीमार पड़ने के बाद अस्पताल के बिल को देखकर लगता है। लगे भी क्यों ना, प्राइवेट अस्पतालों में दवाइयों, ग्लव्स और कॉटन जैसी साधारण चीजों के दाम भी बाजार से कई गुना ज्यादा होते हैं। ऐसे में आम आदमी इलाज के दौरान बस यही सोचता है कि काश इलाज के नाम पर होने वाली यह लूट कम हो जाती। इसी बात को ध्यान में रखते हुए सरकार अब इसे नियंत्रित करने के लिए एक नया नियम बनाने जा रही है। आइए जानते हैं इस नए नियम के बारे में विस्तार से।
सरकार अब प्राइवेट अस्पतालों की मनमानी पर लगाम लगाने के लिए पेसमेकर, हार्ट वाल्व, सिरिंज और ग्लव्स जैसे जरूरी मेडिकल उपकरणों पर वसूले जाने वाले अतिरिक्त पैसों को रोकने की योजना बना रही है। सरकार का मानना है कि इलाज की पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता होनी चाहिए, इसलिए वे मेडिकल डिवाइस कंपनियों और इंश्योरेंस कंपनियों के साथ लगातार बातचीत कर रहे हैं। सरकार ऐसी नीति लाना चाहती है जहां दवाओं और उपकरणों के दाम एमआरपी (MRP) के बजाय सही कीमतों पर आधारित हों।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार ने अलग-अलग मेडिकल डिवाइस पर मुनाफा तय करने के लिए एक प्रस्ताव तैयार किया है। इसके तहत अगर कोई पेसमेकर ₹1,00,000 तक की कीमत का है, तो उस पर अधिकतम 66% का ट्रेड मार्जिन तय किया जा सकता है। वहीं, अगर कोई उपकरण ₹1,00,000 से ज्यादा महंगा है, तो उस पर 50% का मार्जिन लागू हो सकता है। सस्ती चीजों के मामले में, जैसे कि सिरिंज और आईवी सेट जिनकी कीमत ₹1,000 के आसपास या उससे कम है, उन पर 75% तक का मार्जिन तय करने की बात चल रही है। इसी तरह, हड्डियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाले ऑर्थोपेडिक इंप्लांट्स पर भी 75 से 85% तक की मार्जिन सीमा तय की जा सकती है।
टीमआर (TMR) यानी ट्रेड मार्जिन रेशनलाइजेशन का मतलब है मुनाफे पर सरकार द्वारा लगाई गई लगाम। इसके जरिए सरकार यह तय कर देती है कि कोई भी अस्पताल या डिस्ट्रीब्यूटर किसी सामान को खरीदने के बाद उस पर एक फिक्स्ड लिमिट से ज्यादा मुनाफा नहीं कमा सकता, जिससे मनमानी कीमतों पर रोक लग सकेगी। वहीं, टीएमयू (TMU) यानी ट्रेड मार्जिन अनकैप्ड का मतलब होता है मुनाफे पर कोई सीमा नहीं होना। टीएमयू के कारण ही अस्पताल मरीजों से मनचाहा बिल वसूल पाते हैं, क्योंकि इसमें मुनाफे की कोई ऊपरी सीमा नहीं होती।