
Passive Euthanasia for the First Time in India : हरीश राणा के "इच्छामृत्यु" केस के बाद 'पैसिव यूथेनेशिया' को लेकर बात हो रही है। भारत के कानूनी इतिहास का 'पैसिव यूथेनेशिया' को लेकर सबसे पहला और बड़ा फैसला बताया जा रहा है। हरीश की कहानी वाकई दर्दनाक है। पर, ये कोई पहला मामला नहीं है। ऐसा एक मामला 2011 में अरुणा रामचंद्र शानबाग का सामने आया था। ये महिला 42 साल तक कोमा में रही थी। आइए, अरुणा की इच्छामृत्यु वाली कहानी पढ़ते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने 13 साल से अधिक समय से कोमा में 32 साल के हरीश राणा को लाइफ सपोर्ट से हटाने की मंजूरी दे दी है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने इस मामले को लेकर फैसला सुनाया। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पैसिव यूथेनेशिया कानून बनाने को भी कहा है। साथ ही कोर्ट ने एम्स-दिल्ली को भी ये निर्देश दिया है कि लाइफ सपोर्ट हटाने के लिए एक खास योजना तैयार करे।
अरुणा रामचंद्र शानबाग ये महिला मुंबई में नर्स थी। साल 1973 में सोहनलाल नाम के वॉर्ड बॉय ने रेप किया था। जिसके बाद अरुणा कोमा में चली गई थी। इस दर्द के कारण वो पूरे 42 साल तक कोमा में रहीं। इस तरह से जीवन को देखते हुए साल 2009 में सुप्रीम कोर्ट में इच्छामृत्यु के लिए अपील की गई थी।
अरुणा शानबाग बनाम भारत संघ (Aruna Ramchandra Shanbaug v. Union of India (2011)) का ये पहला पैसिव यूथेनेशिया केस था। हालांकि, कोर्ट ने फैसला तो नहीं सुनाया था, पर ये कहा कि अगर डॉक्टर और परिवार को लगता है कि वो ठीक नहीं हो सकतीं तो 'पैसिव यूथेनेशिया' की मदद ले सकते हैं।
कोर्ट ने इच्छामृत्यु पर भले फैसला नहीं सुनाया पर, अरुणा को एक बीमारी ने घेर लिया। अरुणा को निमोनिया हो गया। उसके बाद वो 18 मई 2015 को निमोनिया की वजह से 68 साल की उम्र में दुनिया से चल बसीं।