
Armed Forces Tribunal: सशस्त्र बल अधिकरण (आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल) की क्षेत्रीय पीठ, लखनऊ ने पूर्व सैनिकों के अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए भारतीय सेना के पूर्व हवलदार आसिफ हुसैन को बड़ी राहत प्रदान की है। अधिकरण ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2003 में पदोन्नति संबंधी अनिच्छा-पत्र (Unwillingness Certificate) देने के आधार पर किसी सैनिक को बाद में लागू हुई मॉडिफाइड एश्योर्ड करियर प्रोग्रेशन (MACP) योजना के वित्तीय लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता। न्यायाधिकरण ने केंद्र सरकार और रक्षा मंत्रालय को याची को द्वितीय एमएसीपी (MACP-II) का लाभ, संशोधित वेतन, पेंशन, पीपीओ तथा समस्त देय एरियर चार माह के भीतर उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।
यह निर्णय सशस्त्र बल अधिकरण की लखनऊ क्षेत्रीय पीठ के न्यायमूर्ति सुरेश कुमार गुप्ता, सदस्य (न्यायिक) तथा माननीय मेजर जनरल संजय सिंह, सदस्य (प्रशासनिक) की खंडपीठ ने सुनाया। मामले में पूर्व सैनिक आसिफ हुसैन की ओर से अधिवक्ता विजय कुमार पाण्डेय ने प्रभावी पैरवी की। अधिकरण ने दोनों पक्षों की दलीलों और उपलब्ध अभिलेखों का गहन अध्ययन करने के बाद यह माना कि याची को एमएसीपी-II का लाभ दिए जाने से इंकार करना विधिसम्मत नहीं था।
मामले के अनुसार आसिफ हुसैन भारतीय सेना की शिक्षा शाखा (Army Education Wing) में 20 अप्रैल 1990 को सीधे हवलदार (Instructor) के पद पर भर्ती हुए थे। उन्होंने लगभग दो दशकों तक सेना में पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ सेवा दी। इस दौरान उन्हें कोई नियमित पदोन्नति नहीं मिली और वे पूरे सेवा काल में उसी पद पर कार्यरत रहे। अंततः 30 अप्रैल 2010 को वे सेवानिवृत्त हो गए।
सेवा के दौरान वर्ष 2003 में उन्होंने पदोन्नति से संबंधित एक अनिवार्य प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में शामिल न होने के लिए अनिच्छा-पत्र दिया था। यही दस्तावेज बाद में उनके लिए परेशानी का कारण बना, जब रक्षा मंत्रालय ने इसी आधार पर उन्हें एमएसीपी-II का लाभ देने से इंकार कर दिया।
पूर्व सैनिक ने 4 दिसंबर 2022 को रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी उस आदेश को अधिकरण में चुनौती दी थी, जिसमें कहा गया था कि चूंकि उन्होंने पदोन्नति से इंकार किया था, इसलिए वे एमएसीपी-II के पात्र नहीं हैं।
याची की ओर से यह तर्क रखा गया कि जिस समय उन्होंने वर्ष 2003 में अनिच्छा-पत्र दिया था, उस समय एमएसीपी योजना अस्तित्व में ही नहीं थी। यह योजना बाद के वर्षों में लागू हुई। इसलिए भविष्य में लागू हुई किसी योजना के प्रावधानों को पूर्व प्रभाव (Retrospective Effect) से लागू करके उन्हें वित्तीय लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
सुनवाई के दौरान अधिवक्ता विजय कुमार पाण्डेय ने अधिकरण के समक्ष यह भी स्पष्ट किया कि एमएसीपी योजना नियमित पदोन्नति नहीं, बल्कि कर्मचारियों और सैनिकों को लंबी सेवा के बावजूद पदोन्नति न मिलने की स्थिति में दिया जाने वाला वित्तीय उन्नयन (Financial Upgradation) है।
उन्होंने तर्क दिया कि पदोन्नति और एमएसीपी दो अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं। यदि कोई कर्मचारी पदोन्नति स्वीकार नहीं करता है तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह भविष्य में मिलने वाले वित्तीय उन्नयन से भी स्वतः वंचित हो जाएगा, विशेषकर तब जब संबंधित योजना उस समय लागू ही नहीं थी।
मामले में प्रतिवादी पक्ष की ओर से कहा गया कि याची ने स्वेच्छा से पदोन्नति लेने से इंकार किया था। रक्षा मंत्रालय की नीतियों के अनुसार ऐसे सैनिक एमएसीपी के पात्र नहीं होते। यह भी कहा गया कि याची को बाद में अपना अनिच्छा-पत्र वापस लेने का अवसर दिया गया था, लेकिन उन्होंने इसका लाभ नहीं उठाया। प्रतिवादी पक्ष ने अधिकरण से मंत्रालय के आदेश को सही ठहराने का अनुरोध किया, लेकिन अधिकरण ने उपलब्ध तथ्यों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
खंडपीठ ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि वर्ष 2003 में दिए गए अनिच्छा-पत्र के आधार पर किसी सैनिक को उस योजना से वंचित नहीं किया जा सकता, जो बाद में लागू हुई। न्यायाधिकरण ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्ष 2011 में जारी रक्षा मंत्रालय की नीति को पूर्व प्रभाव से उन सैनिकों पर लागू नहीं किया जा सकता, जो उससे पहले ही सेवानिवृत्त हो चुके थे।
अधिकरण ने माना कि याची ने 20 अप्रैल 2006 को अपनी 16 वर्ष की सेवा पूरी कर ली थी और उसी तिथि से वे एमएसीपी-II के पात्र हो गए थे। इसलिए उन्हें उसी दिनांक से वित्तीय उन्नयन का लाभ मिलना चाहिए था।
सशस्त्र बल अधिकरण ने रक्षा मंत्रालय को निर्देश दिया कि याची का वेतन और पेंशन पुनर्निर्धारित की जाए। साथ ही संशोधित पेंशन भुगतान आदेश (PPO) जारी कर समस्त बकाया एरियर का भुगतान किया जाए। अधिकरण ने आदेश के अनुपालन के लिए चार माह की समय-सीमा निर्धारित की है। यदि निर्धारित अवधि में आदेश का पालन नहीं किया गया तो याची को देय राशि पर छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञ अविनाश शर्मा का मानना है कि यह फैसला देशभर के हजारों पूर्व सैनिकों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। ऐसे अनेक सैनिक हैं जिन्होंने एमएसीपी योजना लागू होने से पहले पदोन्नति संबंधी अनिच्छा-पत्र दिए थे और बाद में उन्हें वित्तीय उन्नयन से वंचित कर दिया गया। अधिकरण के इस निर्णय से यह सिद्धांत और मजबूत हुआ है कि नियमित पदोन्नति तथा एमएसीपी दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं। पुराने अनिच्छा-पत्र को आधार बनाकर सैनिकों के वैधानिक वित्तीय अधिकार समाप्त नहीं किए जा सकते।
यह निर्णय नकेवल एक पूर्व सैनिक को न्याय दिलाने वाला है, बल्कि यह भविष्य में इसी प्रकार के मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टांत (Precedent) बन सकता है। इससे यह संदेश गया है कि प्रशासनिक निर्णय संविधान और न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप होने चाहिए तथा किसी कर्मचारी या सैनिक को ऐसी नीति के आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता, जो उसके सेवा काल के बाद लागू हुई हो। पूर्व सैनिक संगठनों ने भी इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि इससे लंबे समय से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे अनेक सेवानिवृत्त सैनिकों को राहत मिलने की उम्मीद बढ़ी है।