2019 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस पार्टी खासकर राहुल गांधी के लिये संकेत अच्छे नहीं हैं, जानें- क्या कहते हैं राजनीतिक जानकार...
लखनऊ. आगामी 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस पार्टी खासकर राहुल गांधी के लिये संकेत अच्छे नहीं हैं। भले ही प्रमुख विपक्षी दल भाजपा से निपटने को तीसरे मोर्चे की बात कह रहे हों, लेकिन कई बड़े नेता राहुल गांधी को मुखिया मानने को तैयार नहीं हैं। राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गये हैं, लेकिन अभी भी बड़ी पार्टियों के नेता उन्हें तीसरे दल का मुखिया मानने के लिये खुद को तैयार नहीं कर पा रहे हैं। इनमें ममता बनर्जी , शरद पवार और अखिलेश यादव जैसे नाम प्रमुखता से शामिल हैं।
राजस्थान में हुये उपचुनाव में कांग्रेस पार्टी ने दो लोकसभा सीटें और एक विधानसभा सीट जीतकर खुद को मजबूती से पेश किया है। कांग्रेस पार्टी चाहती है कि उसके नेतृत्व में तीसरे मोर्चे का गठन हो, जिसके मुखिया राहुल गांधी हों। लेकिन एनसीपी नेता शरद पवार, तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी और अखिलेश यादव राहुल की अगुवाई में काम करने का मन नहीं बना पा रहे हैं। यही वजह है कि अभी कुछ दिन पहले ही विपक्षी दलों की बैठक बुलाने के लिए कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी को मोर्चा संभालना पड़ा था।
राहुल गांधी के सामने चुनौतियां ही चुनौतियां
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस वक्त राहुल गांधी के सामने ठीक वैसी ही हालात हैं, जैसे 2004 सोनिया गांधी के सामने थे। तब उन्होंने कुशलता से यूपीए बना लिया था। लेकिन उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा को एक साथ लाना कांग्रेस के लिये टेढ़ी खीर है। बसपा सुप्रीमो मायावती ऐसे किसी भी मोर्चे में शामिल नहीं होना चाह रही हैं, जिसमें समाजवादी पार्टी शामिल है। हाल ही में मायावती ने समाजवादी पार्टी के साथ किसी भी तरह के समझौते से इनकार कर ऐसा ही संकेत दिया है।
दोस्ती राहुल से है कांग्रेस से नहीं : अखिलेश यादव
हाल ही में अखिलेश यादव ने भी साफ तौर पर कहा था कि उनकी दोस्ती राहुल गांधी से कांग्रेस पार्टी से नहीं। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस में कई ऐसे बड़े नेता हैं, जो शुरू से ही सपा-कांग्रेस की दोस्ती के खिलाफ थे। विधानसभा चुनाव में गठबंधन के बावजूद करारी हार के बाद यह विरोध और मुखर हो गया।
अपने बूते उपचुनाव लड़ रहीं सपा-कांग्रेस
गोरखपुर और फूलपुर की संसदीय सीटों पर हो रहे उपचुनाव को ही ले लीजिये, यहां भी दोनों पार्टियों (सपा-कांग्रेस) ने अपने अलग-अलग प्रत्याशी उतारे है। गोरखपुर सीट के अखिलेश यादव ने जहां प्रवीण निषाद को टिकट दिया है, वहीं कांग्रेस पार्टी ने डॉक्टर सुरहिता करीम अपना उम्मीदवार बनाया है। फुलपुर में भी ऐसा ही है। फूलपुर उपचुनाव के लिये अखिलेश यादव ने नागेन्द्र प्रताप सिंह पटेल पर और कांग्रेस ने मनीष मिश्रा पर दांव खेला है। दोनों ही दल अपने-अपने तरीके से भाजपा को मात देने की जुगत में हैं। मतलब साफ है कि लोकसभा चुनाव से पहले दोनों 'अच्छे लड़कों' की दोस्ती खटाई में है। बता दें योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद गोरखपुर और केशव प्रसाद मौर्य के उपमुख्यमंत्री बनने के बाद फूलपुर सीट खाली हुई है, जहां अब उपचुनाव हो रहे हैं।