UP Politics: समाजवादी पार्टी ने बंगाल चुनाव के नतीजों से कई सबक लिए हैं। जिसके बाद पार्टी अब नई रणनीति पर काम करने का प्लान कर रही है।
UP Politics: पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजों के बाद समाजवादी पार्टी ने 'अंदरखाने' अपनी चुनावी रणनीति को लेकर गंभीर मंथन शुरू कर दिया है। पार्टी नेतृत्व और रणनीतिकारों का मानना है कि आगामीउत्तर प्रदेश चुनावों में सिर्फ राजनीतिक परामर्श फर्मों और पेड वर्कर्स पर निर्भर रहने के बजाय जमीनी कार्यकर्ताओं को ज्यादा जिम्मेदारी देना अधिक प्रभावी साबित हो सकता है।
सपा अब अपने पारंपरिक संगठन और कार्यकर्ताओं पर ज्यादा भरोसा करने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी को यह भी आशंका है कि चुनाव के दौरान मतदाता सूची में गड़बड़ी बड़ा मुद्दा बन सकती है। इसी वजह से आंदोलन और प्रदर्शन से ज्यादा फोकस वोटर लिस्ट की निगरानी पर रखने की तैयारी की जा रही है।
समाजवादी पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि भाजपा चुनावी मौके पर मतदाता सूची में फेरबदल या गड़बड़ी करने की कोशिश कर सकती है। इसी वजह से पार्टी अब बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने की योजना बना रही है ताकि वोट कटने जैसी स्थितियों को रोका जा सके।
पार्टी सूत्रों के अनुसार सपा आगामी चुनावों में मतदाता सूची के पुनरीक्षण और फॉर्म-7 जैसी प्रक्रियाओं पर विशेष नजर रखेगी। इसके लिए स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी देने की योजना बनाई जा रही है।
सपा के भीतर पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान अपनाई गई रणनीतियों का तुलनात्मक अध्ययन किया जा रहा है। पार्टी नेताओं का कहना है कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़ा काम तृणमूल कांग्रेस ने काफी हद तक राजनीतिक परामर्श फर्म आई-पैक को सौंप दिया था। वहीं उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने इस काम के लिए अपने जमीनी कार्यकर्ताओं को “पीडीए प्रहरी” के रूप में लगाया।
सपा नेताओं के मुताबिक दोनों राज्यों के परिणामों में बड़ा अंतर साफ दिखाई दिया। उनका दावा है कि पश्चिम बंगाल में अंतिम मतदाता सूची में तार्किक त्रुटियों और संदिग्ध श्रेणी के आधार पर करीब 27.16 लाख वोट हटाए गए, जबकि उत्तर प्रदेश में नोटिस पाने वाले करोड़ों मतदाताओं में अपेक्षाकृत बहुत कम नाम हटे।
राजनीतिक विश्लेषण के आधार पर सपा के भीतर यह चर्चा है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस को मिले कुल वोटों के अंतर और हटाए गए वोटों के आंकड़े काफी महत्वपूर्ण रहे। पार्टी रणनीतिकारों का मानना है कि यदि मतदाता सूची में बड़ी संख्या में नाम नहीं कटते तो चुनावी तस्वीर अलग हो सकती थी। इसी वजह से सपा अब सड़क पर आंदोलन से ज्यादा संगठनात्मक स्तर पर वोटर लिस्ट की निगरानी को प्राथमिकता देना चाहती है।
समाजवादी पार्टी के भीतर राजनीतिक परामर्श फर्मों की भूमिका को लेकर भी चर्चा तेज है। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि पश्चिम बंगाल में आई-पैक की सलाह पर तृणमूल कांग्रेस ने कई मौजूदा विधायकों के टिकट काटे और बड़ी संख्या में नए उम्मीदवारों को मैदान में उतारा।
सपा के नेताओं का दावा है कि इन नए चेहरों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसी को देखते हुए पार्टी अब चुनावी रणनीति में पारंपरिक संगठनात्मक ढांचे और अनुभवी कार्यकर्ताओं पर ज्यादा भरोसा करने के पक्ष में दिखाई दे रही है।
समाजवादी पार्टी अब बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने, कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने और मतदाता सूची की लगातार निगरानी करने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी का मानना है कि सिर्फ सोशल मीडिया अभियान या राजनीतिक सलाहकारों के सहारे चुनाव नहीं जीते जा सकते। मजबूत जमीनी नेटवर्क और सक्रिय कार्यकर्ता ही चुनावी सफलता की सबसे बड़ी ताकत साबित हो सकते हैं।