सशस्त्र बल अधिकरण लखनऊ पीठ ने 82 वर्षीय पूर्व सैनिक लक्ष्मण सिंह के मामले में आदेशों की अवहेलना पर सख्त रुख अपनाया है। तीन साल से लंबित दिव्यांग पेंशन न मिलने पर अधिकरण ने रक्षा मंत्रालय पर 20 हजार रुपए का जुर्माना लगाते हुए 17 नवंबर तक आदेश पालन के निर्देश जारी किए हैं।
AFT Lucknow Slams Defence Ministry: सशस्त्र बल अधिकरण (Armed Forces Tribunal - AFT), क्षेत्रीय पीठ लखनऊ ने एक महत्वपूर्ण मामले में केंद्र सरकार और रक्षा मंत्रालय के प्रति कड़ा रुख अपनाते हुए आदेशों की अवहेलना पर गहरी नाराजगी व्यक्त की है। न्यायमूर्ति अनिल कुमार (सदस्य-न्यायिक) और लेफ्टिनेंट जनरल अनिल पुरी (सदस्य-प्रशासनिक) की खंडपीठ ने 82 वर्षीय सेवानिवृत्त सुबेदार मेजर लक्ष्मण सिंह के मामले में आदेश का पालन न करने पर भारत सरकार, रक्षा मंत्रालय पर ₹20,000 का जुर्माना लगाया है तथा 17 नवंबर 2025 तक आदेश का पालन कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
मामले की शुरुआत वर्ष 2022 में हुई थी, जब सशस्त्र बल अधिकरण ने बुजुर्ग सैनिक लक्ष्मण सिंह के पक्ष में फैसला सुनाते हुए निर्देश दिया था कि उन्हें चार महीने के भीतर दिव्यांगता पेंशन प्रदान की जाए। लेकिन आदेश पारित हुए तीन वर्ष बीतने के बाद भी, संबंधित विभागों द्वारा उस पर अमल नहीं किया गया। लक्ष्मण सिंह ने मजबूर होकर आदेश के क्रियान्वयन के लिए पुनः अधिकरण की शरण ली। जब कई बार सुनवाई के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो उन्होंने उच्च न्यायालय लखनऊ खंडपीठ में याचिका दायर की।
उच्च न्यायालय ने 19 नवंबर 2024 को अपने आदेश में अधिकरण को निर्देश दिया कि इस मामले की निष्पादन कार्यवाही शीघ्रता से पूरी की जाए। लेकिन इसके बावजूद भी न तो पेंशन जारी हुई और न ही संबंधित अधिकारियों ने कोई ठोस कार्यवाही की। अधिवक्ता विजय कुमार पाण्डेय, जो लक्ष्मण सिंह का पक्ष रख रहे हैं, ने अधिकरण के समक्ष पूरा घटनाक्रम विस्तार से रखा। उन्होंने कहा कि माननीय न्यायालय के आदेशों के बावजूद रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने कोई कदम नहीं उठाया। यह एक सैनिक के अधिकारों की उपेक्षा का उदाहरण है, जो अपनी पूरी उम्र देश की सेवा में लगा चुका है।
अधिकरण ने यह पाया कि दिनांक 09 दिसंबर 2022 के आदेश का पालन करने के लिए बार-बार अवसर दिए जाने के बावजूद भी रक्षा मंत्रालय ने आदेशों का पालन नहीं किया। खंडपीठ ने स्पष्ट टिप्पणी की कि न्यायालय के आदेशों की अवहेलना किसी भी स्तर पर स्वीकार्य नहीं है। आदेशों के पालन में लापरवाही न्याय व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही दोनों पर प्रश्नचिह्न लगाती है। इस पर अधिकरण ने भारत सरकार, रक्षा मंत्रालय पर ₹20,000 का जुर्माना लगाते हुए कहा कि यह राशि 17 नवंबर 2025 से पहले जमा की जाए और आदेश का पालन कर न्यायालय को सूचित किया जाए।
खंडपीठ ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया है कि यदि निर्धारित अवधि तक आदेश का पालन नहीं किया गया, तो रक्षा मंत्रालय के जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध वेतन रोकने, दंडात्मक कार्रवाई करने तथा अवमानना नोटिस जारी करने की कार्यवाही की जाएगी। इसके साथ ही रक्षा मंत्रालय के सचिव, नई दिल्ली को व्यक्तिगत रूप से यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है कि आदेश का अनुपालन निर्धारित अवधि के भीतर किया जाए।
अधिकरण ने यह भी निर्देशित किया कि आदेश की प्रति AFT लीगल सेल और रक्षा मंत्रालय (MoD) दोनों को अनुपालन हेतु तत्काल भेजी जाए। इसके अलावा, मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2025 को निर्धारित की गई है, जिसमें यह देखा जाएगा कि आदेश का पालन हुआ या नहीं।
82 वर्षीय लक्ष्मण सिंह, जिन्होंने भारतीय सेना में दशकों तक सेवाएं दीं, आज भी अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं। वे सेवानिवृत्ति के बाद से ही स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। उनकी दिव्यांगता पेंशन का मामला बार-बार न्यायालयों के आदेशों के बावजूद लंबित रहा है। यह मामला न केवल एक सैनिक के प्रति प्रणाली की उपेक्षा को दर्शाता है, बल्कि उन हजारों सेवानिवृत्त जवानों की पीड़ा का प्रतीक है, जो पेंशन और सेवा लाभों के लिए दर-दर भटक रहे हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह आदेश न केवल एक व्यक्ति के लिए राहत है, बल्कि उन सभी मामलों के लिए मिसाल बनेगा, जिनमें सरकारी विभाग आदेशों के अनुपालन में लापरवाही बरतते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता रमेश श्रीवास्तव का कहना है कि AFT का यह निर्णय शासन-प्रशासन को स्पष्ट संदेश देता है कि न्यायालय के आदेश केवल कागज पर नहीं रहने चाहिए। यदि अधिकारी जिम्मेदारी से काम नहीं करेंगे तो उन्हें दंड भुगतना होगा।
सरकारी तंत्र की सुस्ती पर सवाल
यह मामला एक बार फिर सरकारी तंत्र की कार्यशैली पर सवाल उठाता है। जहाँ एक ओर सरकार “वन रैंक, वन पेंशन” और सैनिकों के कल्याण के लिए योजनाएं चलाती है, वहीं जमीनी स्तर पर आदेशों का पालन करने में लापरवाही चिंताजनक है। AFT की सख्ती ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब “देरी या उपेक्षा” के लिए कोई जगह नहीं बची है।