लखनऊ

यूपी की अजब-गजब पॉलिटिक्स: जब सरकार बचाने के लिए हर समर्थक MLA को बनाया मंत्री, 93 पहुंची थी संख्या

UP Politics: जब कुर्सी बचाने के लिए कल्याण सिंह को बनाने पड़े थे 93 मंत्री। जानिए यूपी की उस 'जम्बो सरकार' की पूरी कहानी, जिसने राजनीति के सारे समीकरण बदल दिए और क्यों 1 दिन के ही सीएम रह गए जगदंबिका पाल।

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Jun 11, 2026
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Uttar Pradesh Politics: यूपी की राजनीति में कई किस्से अलबेले है। ऐसा ही एक किस्सा कल्याण सिंह से जुड़ा हुआ है। ये तो सर्वविदित है कि गठबंधन की सरकार में सबको खुश करना पड़ता है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में ऐसे परोक्ष रूप से जब दिखा जिस वक्त मुख्यमंत्री के रूप में कल्याण सिंह के सामने एक वक्त ऐसा भी आया जब उन्हें गठबंधन के हर सहयोगी को मंत्री बनाना पड़ा, क्योंकि उनकी सरकार दांव पर थी। इस मजबूरी के चलते मंत्रियों की संख्या बढ़कर 93 हो गई, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड था।

कल्याण सिंह के इस फैसले की आलोचना भी हुई, लेकिन उस समय उनके सामने यही एकमात्र विकल्प था। बात है 1998 की, जब मायावती ने कल्याण सरकार से समर्थन वापसी का ऐलान किया था। भाजपा की कल्याण सरकार बसपा और कुछ छोटे दलों के सहारे चल रही थी।

सरकार गिराने के लिए मशहूर थीं मायावती

दरअसल, 1996 के चुनाव में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था। बीजेपी 174 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन बहुमत के जादुई आंकड़े 213 से दूर रही। इस चुनाव में समाजवादी पार्टी 110 सीटों के साथ दूसरे और बसपा 67 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर रही। जबकि कांग्रेस के खाते में 33 सीटें आईं। भाजपा ने मायावती और लोकतांत्रिक कांग्रेस से हाथ मिलाकर सरकार बनाई। उन दिनों गठबंधन की सरकारों में रोटेशन सीएम का कल्चर था। यानी पहले एक पार्टी का मुख्यमंत्री बनेगा और फिर शेष कार्यकाल के लिए दूसरे दल का। मायावती अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद सरकार गिराने के लिए विख्यात थीं। कल्याण सिंह के साथ भी उन्होंने वही किया।

1997 का वो काला दिन

1998 में उन्होंने कल्याण सरकार से समर्थन वापसी का ऐलान कर डाला। मायावती ने बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इसकी जानकारी दी, लेकिन दिन वो चुना जब कल्याण सिंह लखनऊ से बाहर थे। लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी के प्रचार के लिए कल्याण गोरखपुर गए थे। जब तक वो लौटे बहुत कुछ बदल चुका था। हालांकि, इससे पहले यानी 1997 में यूपी विधानसभा में कुछ ऐसा हुआ, जिसने कल्याण सरकार और राज्यपाल रोमेश भंडारी के बीच मनमुटाव की एक महीन लेकिन स्पष्ट रेखा खींच दी। कांग्रेस विधायक विधानसभा अध्यक्ष के आसन के पास पहुंच कर विरोध प्रकट कर रहे थे, तभी समाजवादी पार्टी और बसपा के विधायक भी वहाँ पहुंच गए और देखते ही देखते स्थिति बेकाबू हो गई। विधानभसा में कुर्सियाँ तक फेंकी गईं और यह यूपी के इतिहास का सबसे काला दिन बन गया।

हर साथी को बनाया मंत्री

इस घटना के बाद यूपी में राष्ट्रपति शासन लगाने की बातें होनी लगीं, राज्यपाल रोमेश भण्डारी ने इसकी सिफारिश भी की, लेकिन उसे मंजूरी नहीं मिली। इस बीच, कल्याण सिंह को आने वाले संकट का अंदेशा हो गया, उन्होंने गठबंधन के सभी सहयोगियों को मंत्री पद ऑफर किया, ताकि कोई उनका साथ छोड़कर न जाए। इस तरह कल्याण सरकार में मंत्रियों की संख्या बढ़कर 93 हो गई। इसे यूपी की जम्बो सरकार कहा जाता है।

कल्याण सिंह ऐसा इसलिए कर पाए, क्योंकि इस समय मंत्रियों की संख्या को लेकर 15% का फॉर्मूला अस्तित्व में नहीं था। संविधान में 91वां संशोधन 2003 में हुआ. इसके अनुसार, किसी भी राज्य में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या विधानसभा की कुल सीटों के 15% से अधिक नहीं हो सकती। उत्तर प्रदेश में 403 विधानसभा सीटें हैं, 15% के हिसाब से अधिकतम 60 मंत्री ही बनाए जा सकते हैं। वर्तमान योगी आदित्यनाथ सरकार में हालिया कैबिनेट विस्तार के बाद मंत्रियों की संख्या बढ़कर 60 हो गई है।

फिर साजिश... आखिरी में जीत

कल्याण सिंह ने अपने हर सहयोगी को मंत्री जरूर बना दिया, लेकिन उनके खिलाफ बड़ी साजिश अंदरखाने परवान चढ़ती रही। मायावती ने सरकार से समर्थन वापसी के ऐलान के साथ जगदंबिका पाल को विधायक दल का नेता घोषित किया। पाल कल्याण सरकार में यातायात मंत्री थे, और इसे महत्वपूर्ण पोर्टफोलियो माना जाता था। लेकिन बात सीएम की कुर्सी पर बैठने की थी, इसलिए वह तुरंत कल्याण का साथ छोड़ मायावती के साथ हो लिए। साजिश परिवान चढ़ी, जगदंबिका पाल सीएम भी बने पर महज 1 दिन के लिए। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राज्यपाल रोमेश भण्डारी के फैसले पर आपत्ति जताई, कल्याण सिंह को बहुमत साबित करने का मौका मिला और वह इसमें सफल रहे।

120 करोड़ सालाना खर्चा!

कल्याण सिंह के 93 मंत्री बनाने के फैसले की आलोचना हुई थी। क्योंकि इतने बड़े मंत्रिमंडल का भारी-भरकम खर्चा राज्य के खजाने पर आता। उस समय यह अनुमान लगाया गया था कि सरकार को 93 मंत्रियों के वेतन और सुविधाओं पर हर साल कम से कम 120 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे। औसतन, हर मंत्री और उनके छह लोगों के निजी स्टाफ (साथ ही चपरासी, ड्राइवर और सुरक्षाकर्मी) को दिए जाने वाले भत्ते का खर्चा ही 10 लाख रुपए प्रति माह बैठता है।

Updated on:
11 Jun 2026 08:01 pm
Published on:
11 Jun 2026 07:58 pm