लखनऊ

UP Politics: सपा का नया दांव: जाति जनगणना और BSP के बिखराव पर पैनी नजरें! पश्चिम यूपी की सियासत फिर गरमाई?

UP Politics: चुनाव से पहले सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती टिकट वितरण को लेकर आंतरिक खींचतान की है। कई सीटों पर दावेदारों की लंबी सूची पार्टी नेतृत्व के लिए मुश्किलें बढ़ा रही है।
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May 04, 2026
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सपा का नया दांव। फोटो सोर्स- पत्रिका न्यूज

UP Politics: उत्तर प्रदेश के मेरठ में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी (सपा) इस बार PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के साथ जाति जनगणना को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है। पार्टी नेतृत्व को उम्मीद है कि यह रणनीति उसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मजबूत स्थिति दिला सकती है। साथ ही समाजवादी पार्टी बहुजन समाज पार्टी (BSP) के संभावित बिखराव का फायदा उठाने की कोशिश में भी जुटी है।

मेरठ: पश्चिम यूपी की सियासत का केंद्र

मेरठ की राजनीति हमेशा से पश्चिमी यूपी के राजनीतिक रुझानों को दिशा देती रही है। 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी थी। उस समय सपा ने राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के साथ गठबंधन कर सात में से चार सीटों पर जीत हासिल की थी। हालांकि अब रालोद भाजपा के साथ है, जिससे सपा की चुनौती पहले से अधिक कठिन हो गई है।

इसके बावजूद सपा नेताओं का दावा है कि इस बार पार्टी का प्रदर्शन पहले से बेहतर रहेगा। बसपा के कमजोर पड़ते जनाधार को सपा अपने पक्ष में मोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है, जो चुनावी परिणामों में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

टिकट वितरण बना बड़ा सिरदर्द?

चुनाव से पहले सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती टिकट वितरण को लेकर आंतरिक खींचतान की है। कई सीटों पर दावेदारों की लंबी सूची पार्टी नेतृत्व के लिए मुश्किलें बढ़ा रही है। सरधना से अतुल प्रधान, मेरठ शहर से रफीक अंसारी और किठौर से शाहिद मंजूर मौजूदा विधायक हैं, जिनका टिकट लगभग तय माना जा रहा है। वहीं हस्तिनापुर सीट पर मुकाबला काफी दिलचस्प हो गया है। यहां पूर्व विधायक योगेश वर्मा, पूर्व मंत्री प्रभुदयाल वाल्मीकि, प्रशांत गौतम और महापौर चुनाव लड़ चुकीं दीपू मनोठिया टिकट की दौड़ में शामिल हैं। मेरठ दक्षिण और सिवालखास सीटों पर भी दावेदारों की लंबी कतार है। खासकर सिवालखास में जाट और किसान वोटों को साधना सपा के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है।

कैंट सीट: सपा के लिए सबसे कठिन चुनौती

मेरठ कैंट विधानसभा सीट भाजपा का मजबूत गढ़ मानी जाती है। इस सीट पर जीत हासिल करना सपा के लिए आसान नहीं होगा। पार्टी को यहां बेहद सोच-समझकर और मजबूत उम्मीदवार उतारना होगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस सीट पर रणनीतिक चूक सपा को भारी पड़ सकती है।

सेंट्रल मार्केट मुद्दे पर सपा की नजर

इस बार सपा मेरठ के सेंट्रल मार्केट के मुद्दे को भी चुनाव में भुनाने की तैयारी में है। पार्टी का मानना है कि मार्केट से जुड़े व्यापारियों की नाराजगी भाजपा के खिलाफ माहौल बना सकती है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव इस मुद्दे को विधानसभा में उठा चुके हैं और सोशल मीडिया पर भी कई बार इस पर अपनी प्रतिक्रिया दे चुके हैं। सपा विधायक अतुल प्रधान लगातार व्यापारियों के बीच सक्रिय नजर आते हैं। वहीं पार्टी के व्यापारी नेता राँकी वर्मा और जीतू नागपाल भी इस मुद्दे को मजबूती से उठाने की कोशिश कर रहे हैं।

व्यापारी वोट बैंक पर सपा की नजर

सपा को लगता है कि व्यापारी वर्ग पारंपरिक रूप से भाजपा का मजबूत वोट बैंक रहा है, लेकिन सेंट्रल मार्केट के ध्वस्तीकरण से व्यापारियों में नाराजगी है। अगर यह नाराजगी चुनाव में असर दिखाती है, तो इसका फायदा सपा को मिल सकता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मेरठ ही नहीं, बल्कि प्रदेश की अन्य सीटों पर भी इस मुद्दे का असर देखने को मिल सकता है।

क्या बदलेगा मेरठ का सियासी समीकरण?

अब देखना दिलचस्प होगा कि सपा की पीडीए रणनीति, बसपा के समीकरण और स्थानीय मुद्दों का मेल मेरठ की राजनीति में कितना असर डालता है। टिकट वितरण, गठबंधन की स्थिति और जमीनी मुद्दे—ये सभी फैक्टर आने वाले चुनाव में सपा की सफलता या असफलता तय करेंगे।