
लखनऊ. सोशल मीडिया पर केंद्र व राज्य सरकार को लेकर टिप्पणी करना महंगा पड़ सकता है। दरअसल सीएम योगी और डिप्टी सीएम डा.दिनेश शर्मा के विरुद्ध सोशल मीडिया में की गई पोस्ट से सचिवालय का एक निजी सचिव फंस गया है। सचिवालय प्रशासन की ओर से मामले को गंभीरता से लेते हुए निजी सचिव के खिलाफ चार्जशीट जारी कर दी गई है। दरअसल निजी सचिव संघ के अध्यक्ष अमर सिंह पटेल ने सीएम योगी और डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा को लेकर सोशल मीडिया पर जातिसूचक टिप्पणी की थी जिसके बाद उन पर कार्रवाई के आदेश हुए।
अपर मुख्य सचिव सचिवालय प्रशासन महेश कुमार गुप्ता ने इसकी पुष्टि की। सचिवालय प्रशासन की ओर से मामले को गंभीरता से लेते हुए निजी सचिव के खिलाफ चार्जशीट जारी कर दी गई है। दरअसल ट्विटर पर अपने निजी एकाउंट से उसने गोरखपुर विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति प्रक्रिया में जाति विशेष के लोगों का चयन किए जाने को लेकर मुख्यमंत्री एवं उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा पर सवाल खड़ा किया है। पटेल ने अपने ट्विटर एकाउंट पर गोरखपुर विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसरों के चयन पर सवाल उठाते हुए लिखा है कि 71 में से 52 सहायक प्रोफेसर एक ही जाति के बनाए गए हैं।मुख्यमंत्री के सख्त रुख को देखते हुए प्रदेश के ऐसे कर्मचारियों पर भी तलवार लटक सकती है जो लंबे समय से सरकार के मंत्रियों या मुख्यमंत्री को लेकर कर्मचारी आचरण के विरुद्ध सोशल मीडिया पर लगातार एक्टिव हैं।
सोशल मीडिया पर सख्त सरकार
इससे पहसे भी सोशल मीडिया पर टिप्पणी को लेकर सरकार कार्रवाई कर चुकी है। प्रदेश सरकार ने श्रम विभाग के उप निदेशक (सेवायोजन) लखनऊ राजीव यादव को अपनी फेसबुक आईडी पर केन्द्र और राज्य सरकार की आलोचना करने के मामले में प्रथम दृष्टया दोषी मिलने पर तत्काल प्रभाव से निलम्बित कर दिया था। निलम्बन अवधि में उन्हें सेवायोजन (मुख्यालय) से संबद्ध किया गया है।
दरअसल डिप्टी डायेक्टर राजीव यादव अपनी फेसबुक आईडी से केन्द्र एवं राज्य सरकार के साथ इनकी नीतियों की भी आलोचना करने और इस प्रकार के पोस्ट को शेयर करने के मामले में उत्तर प्रदेश सरकारी कर्मचारी आचरण नियमावली के उल्लंघन के दोषी पाये गये हैं, जिससे इनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही की गयी है। उनके ऊपर लगे आरोपों की जांच करने के लिए विशेष सचिव श्रम कृष्ण मोहन त्रिवेदी को जांच अधिकारी नामित किया गया है।
डीएम को भी देनी पड़ी थी सफाई
कासगंज उपद्रव के दौरान तत्कालीन बरेली डीएम राघवेंद्र विक्रम सिंह द्वारा फेसबुक पर किए गए एक पोस्ट ने प्रदेश सरकार के लिए मुश्किल खड़ी कर दी थी। उन्होंने कासगंज घटना की पृष्ठभूमि में कारण माने जा रहे नारेबाजी प्रकरण को केंद्रबिंदु में रखकर 28 जनवरी को विचार साझा किए। हालांकि, महज 39 शब्दों के पोस्ट से विवाद उत्पन्न हो गया। फिर भी उन्होंने माना-यह उनके निजी विचार हैं।
इंदिरा भवन-जवाहर भवन कर्मचारी संगठन के महामंत्री सुशील कुमार बच्चा का कहना है कि सोशल मीडिया पर विचार लिखने के आधार पर कार्रवाई से पहले मामले की जांच होनी चाहिए। हमारे लोकतंत्र में विचारों की असहमती की पूरी जगह है।