मेरठ

अजब-गजब: यहां जानवर भी होते हैं भगवान की भक्ति में लीन-देखें वीडियो

आमतौर पर एक-दूसरे के दुश्मन माने जाने वाले जानवर भी प्रभु की भक्ति में लीन होकर आपसी बैर को उस वक्त मानो भुला देते हैं, जब यहां भगवान की आरती होती है।

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Jan 31, 2018

मेरठ। प्रभु की भक्ति इस सृष्टि में रहने वाले प्रत्येक जीव के ह्दय में होती है। भले ही हम उसे समझ न पाएं, परंतु प्रत्येक प्राणी अपने जीवन के लिये प्रभु को धन्यवाद देता है। भले की उनके पास मानवों की तरह संसाधन न हों। किंतु कहते हैं कि प्रभु तो बस भाव के भूखे होते हैं और वह प्रत्येक प्राणी के भाव का मान अवश्य रखते हैं।

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जानवरों की भगवान के प्रति श्रद्धा और भाव को महसूस करना चाहते हैं तो मेरठ के गगोल तीर्थ पर आएं। मेरठ के परतापुर क्षेत्र में स्थित सात हजार पुराने मंदिर में प्रतिदिन होने वाली आरती में इंसानों के साथ जानवर भी शामिल होते हैं। भले ही आरती के समय उनके कंठ से निकलने वाले स्वर उनके मनुष्य की पूजा-पद्धति से मेल न खाते हों लेकिन उनके भाव और श्रद्धा को कम नहीं आंका जा सकता। बात आश्चर्यचकित करने वाली तो है लेकिन सच है।

उत्तर प्रदेश के मेरठ जनपद से लगभग 14 किलोमीटर दूर स्थित ऐतिहासिक गगोल गांव में स्थित महर्षि विश्वामित्र तपोभूमि तीर्थ में नित्य होने वाली पूजा के वक्त अनेक प्रकार के जानवर भी मंदिर स्थल के पास एकत्रित हो जाते हैं। कुत्ते, सियार, मोर, जलमुर्गी, बंदर जैसे जानवर एक साथ मंदिर परिसर में पहुंचते हैं और आरती के दौरान अपने भावों के श्रद्धासुमन अपने तरीके से भगवान को अर्पण करते हैं। जानवर होने के नाते उनको मंदिर में प्रवेश भले ही न करने दिया जाता हो लेकिन उनको भाव नित-प्रतिदिन भगवान के चरणों तक पहुंचते जरूर हैं।

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आमतौर पर एक-दूसरे के दुश्मन माने जाने वाले जानवर भी प्रभु की भक्ति में लीन होकर आपसी बैर को उस वक्त मानो भुला देते हैं। न कोई झगड़ा, न लड़ाई, न एक-दूसरे को मारने की इच्छा, उनके मन में होती है तो बस भगवान के प्रति श्रद्धा। मंदिर में रोज आने वाले लोग तो इन जानवरों की भक्ति को ह्दय से महसूस कर चुके हैं लेकिन यहां पहली बार आने वालो को यह नजारा देखकर आश्चर्य जरूर होता है। जब मंदिर के महंत शिवदास शंख बजाते हैं तो उस शंखनाद में सुर मिलाने का भरसक प्रयास यह जानवर भी करते हैं।

आपको बता दें कि गगोल तीर्थ में लगभग सात हजार वर्ष पुराने विश्वामित्र जी के मंदिर की बेहद मान्यता है। यूं तो वर्ष भर श्रद्धालुओं का तांता इस ऐतहासिक मंदिर में लगा रहता है परंतु ज्येष्ठ शुक्ल के दशहरे में यहां लगने वाले विशाल मेले में श्रद्धालुओं की असंख्य भीड़ यहां उमड़ती है। दूर-दराज से आने वाले भक्त यहां स्नान कर पूजा-अर्चना करते हैं। लोगों की मान्यता है कि यहां सच्चे भाव से मांगी गयी मन्नत अवश्य पूर्ण होती है। कहा जाता है कि ऋषि विश्वामित्र दशरथ से राम-लक्ष्मण को मांग कर यहीं पर लाये थे। राम ने अपने तीर के द्वारा भू-गर्भ से जल का स्रोत (किवदन्तियों में गंगा) प्रकट किया। इसलिए इस तीर्थ एवं गांव का नाम गंगलो (गंगा व जल-गंगोल) प्रसिद्ध हुआ।

यह भी कहा जाता है कि यह जोहड़ विश्वामित्र के यज्ञ कुण्ड का अवशेष हैं। खुदाई में यहां पर आज भी राख एवं बालू रेत निकलती है। पर्यटन विभाग ने इस तालाब को विस्तृत एवं पक्का बना दिया, लेकिन आज इसकी हालत दयनीय हो चुकी है। यहां पर एक धर्मशाला भी है जिसमे श्रद्धालु ठहरते हैं। वर्तमान में इसके महन्त महेश गोसांई व बाबा शिवदास है। दूसरा गया तीर्थ माने जाने के चलते पितृ उद्धार हेतु यहां लोग दूर-दूर से पिण्ड दान करने आते हैं। यहां पर भगवान राम, लक्ष्मण एवं शिव के मन्दिर भक्तों की आस्था के केंद्र हैं।

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Published on:
31 Jan 2018 10:06 pm
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