
नई दिल्ली। संविधान के अनुच्छेद 239-एए की व्याख्या को लेकर चल रही लड़ाई पर विराम लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बड़ी टिप्पणी की है। पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने दिसंबर 2017 में सुरक्षित रखे गए फैसले का ऐलान कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी एक को पूरी ताकत देने से इनकार कर दिया है। लेकिन यह भी कहा कि चुनी हुई सरकार ही दिल्ली चलाएगी। इसे उप-राज्यपाल के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। हालांकि कोर्ट ने सभी को मिल जुलकर काम करने की बात कही है। इस संबंध में पीठ ने तीन अलग-अलग फैसले लिए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता है।
...ये हैं सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां
- उप-राज्यपाल के पास स्वतंत्र अधिकार नहीं हैं
- कैबिनेट की सलाह से काम करें केजरीवाल सरकार
- दिल्ली सरकार के सभी फैसलों की कॉपी उप-राज्यपाल को सौंपी जाए
- अराजकता के लिए कोई जगह नहीं
- दिल्ली की जनता के प्रति चुनी गई सरकार जवाबदेह
- केंद्र और राज्य सरकार मिलकर सौहार्दपूर्ण रिश्ते रखें
- विधायिका के अधिकार क्षेत्र के मसलों पर केंद्र अतिक्रमण ना करें
- चुनी हुई सरकार ही चलाएगी दिल्ली, सरकार को है किसी भी मुद्दे पर कानून बनाने का अधिकार
- दिल्ली सरकार कानून बनाए लेकिन संसद का कानून सर्वोच्च है
- उप-राज्यपाल मंत्रिमंडल की सलाह से काम करने को बाध्य है
- उप-राज्यपाल व्यवस्था के तहत काम करें और सरकार के सभी फैसले राष्ट्रपति को भेजें
- ट्रांसफर-पोस्टिंग का अधिकार भी सरकार के पास
- पुलिस और कानून व्यवस्था के मामलों में उप-राज्यपाल को तवज्जो
...इसलिए पड़ी सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की जरूरत
गौरतलब है कि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है। दिल्ली एक केंद्र शासित प्रदेश है जहां चुनी हुई सरकार शासन चलाती है। जिसके चलते यहां केंद्र सरकार के प्रतिनिधि (उप-राज्यपाल) और राज्य सरकार के बीच अधिकारों और दायित्वों को लेकर तनातनी की स्थिति बनी रहती है। मौजूदा सरकार के कार्यकाल में ऐसी स्थितियां बहुत ज्यादा देखने को मिली है, जिसके चलते राज्य का विकास प्रभावित होता है। दिल्ली के अलावा पुडुचेरी में भी प्रशासनिक स्थिति ऐसी ही है लेकिन सियासत के केंद्र में ना होने के चलते वहां राजधानी जैसा हाल नहीं है।