Maharashtra news: मुंबई से महज 122 किमी दूर स्थित डैपुरमाल गांव के निवासी अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए भारी जल संकट का सामना कर रहे हैं। यहां के बच्चे और बुजुर्ग एक मटका पानी के लिए हर दिन खतरनाक पहाड़ों और जंगलों के बीच 8 किलोमीटर का सफर तय करने को मजबूर हैं।
Maharashtra news: मुंबई से सिर्फ 122 किमी दूर बसा एक आदिवासी गांव डैपुरमाल आज बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहा है। हैरानी की बात यह है कि यह गांव एक बहुत बड़े जलाशय के ठीक ऊपर पहाड़ी पर बसा है, जहां से पूरी मुंबई को पानी मिलता है। लेकिन अपनी आंखों के सामने पानी का इतना बड़ा भंडार होने के बावजूद, इस गांव के 250 लोगों के नसीब में प्यास और संघर्ष है। यहां के निवासी सिर्फ एक मटका पानी के लिए हर दिन खतरनाक जंगलों और खड़ी पहाड़ियों के बीच घंटों पैदल चलने को मजबूर हैं।
डैपुरमाल गांव की किस्मत में एक अजीब सी विडंबना है। गांव के ठीक नीचे अपर वैतरणा बांध का विशाल पानी चमकता नजर आता है, जो मुंबई जैसे बड़े शहर की प्यास बुझाता है। लेकिन ऊपर गांव में रहने वाले परिवार पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे हैं। साल 2025 में, गांव वालों ने खुद मेहनत करके एक छोटा सा कुआं खोदा था, ताकि तपती गर्मी में कुछ राहत मिल सके। कुछ समय तक तो काम चला, लेकिन जैसे ही अप्रैल की कड़कती धूप पड़ी, जमीन फटने लगी और वह कुआं भी पूरी तरह सूख गया। अब गांव वालों के पास सिर्फ मायूसी बची है और फिर से वही पुरानी मुश्किल भरी पदयात्रा शुरू हो गई है, जिससे वे सालों से जूझ रहे हैं।
हर सुबह सूरज की तपिश बढ़ने से पहले ही, महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग पानी लाने के लिए निकल पड़ते हैं। उन्हें जंगल के ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होकर करीब चार किलोमीटर नीचे उतरना पड़ता है। यह रास्ता बहुत ही खतरनाक और पथरीला है, जहां हर कदम पर पैर फिसलने का डर रहता है। रास्ते इतने संकरे हैं कि खाली बर्तन लेकर चलना भी मुश्किल हो जाता है। ऊपर से कड़ी धूप में जंगल की छाया भी साथ छोड़ देती है और गर्मी जानलेवा लगने लगती है। गांव वालों के लिए यह कोई एक दिन की मुसीबत नहीं है, बल्कि उनकी जिंदगी का हर दिन इसी संघर्ष में बीतता है।
डैपुरमाल गांव में जो लड़कियां शादी करके आती हैं, उनके लिए यहां की हकीकत झेलना बहुत मुश्किल होता है। 30 साल की आशा, जो इगतपुरी से यहां ब्याह कर आई थीं, बताती हैं कि उनके लिए यह मानना ही मुश्किल था कि बिना पानी के जिंदगी कैसी होती है। वह कहती हैं, जब मैं पहली बार यहां आई तो मेरी आंखों में आंसू आ गए थे। मेरे मायके में तो नल खोलते ही पानी आ जाता था, लेकिन यहां हर बार पानी लाने जाते वक्त ऐसा लगता है जैसे शरीर अब और साथ नहीं देगा। पर हम करें भी तो क्या, हमारे पास और कोई रास्ता ही नहीं है। आशा का यह दर्द पूरे गांव का दर्द है, जहां जिंदगी सुविधाओं के भरोसे नहीं बल्कि लोगों के हौसले पर टिकी है।
जब आप इन ग्रामीणों के साथ चलते हैं, तब समझ आता है कि यह दूरी कितनी भारी है। पहाड़ की चढ़ाई शरीर की पूरी ताकत सोख लेती है, सांस फूलने लगती है और तेज गर्मी में बदन टूटने लगता है। जो रास्ता यहां के लोग रोज तय करते हैं, वह किसी को भी एक बार में ही सजा जैसा लगेगा। डैपुरमाल के लोगों के पास न तो कोई दूसरा रास्ता है और न ही पानी का कोई और जरिया। यहां प्यास सिर्फ पानी की कमी का नाम नहीं है, बल्कि उस पानी तक पहुंचने के लिए शरीर को दी जाने वाली तकलीफ की कहानी है।
डैपुरमाल मुंबई से सिर्फ 122 किलोमीटर दूर है, जो देश का सबसे अमीर शहर माना जाता है। लेकिन इन दोनों जगहों के बीच जमीन-आसमान का फर्क है। जहां मुंबई में हर वक्त भरपूर पानी रहता है, वहीं इस गांव के लोग एक-एक मटके के लिए पहाड़ चढ़ते हैं। मुंबई में नल खोलते ही पानी मिल जाता है, जबकि यहां के लोग खतरनाक जंगलों के बीच से पानी लाने को मजबूर हैं। डैपुरमाल के लोगों के लिए यह सिर्फ कोई खबर या कुछ दिनों की परेशानी नहीं है, बल्कि यह उनकी जिंदगी की कड़वी सच्चाई है जो हर दिन दोहराई जाती है।
डैपुरमाल के बच्चों पर इस संकट का असर बचपन से ही दिखने लगता है। यहां के छोटे-छोटे बच्चे अपने माता-पिता के साथ पानी लाने जाते हैं। उन्हें बहुत कम उम्र में ही समझ आ जाता है कि पानी लाना उतना ही जरूरी है जितना पढ़ाई करना या खाना खाना। गर्मियों की छुट्टियों में जब बच्चे खेलते हैं, तब यहां के मासूम घंटों पहाड़ पर मटके ढोते हैं। उनकी थकान साफ देखी जा सकती है जब वे घर लौटते वक्त थकान मिटाने के लिए पेड़ों की छांव में बार-बार रुकते हैं। इन बच्चों के लिए पानी की कमी किताबी बात नहीं है, यह एक भारी हकीकत है जिसे वे अपने कंधों पर ढो रहे हैं।