
Shiv Sena Row: शिवसेना के नाम और चुनाव चिन्ह 'धनुष-बाण' को लेकर उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे गुट के बीच चल रहा कानूनी विवाद एक बार फिर चर्चा में है। केंद्रीय चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती देने वाली उद्धव ठाकरे गुट की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है, जिसमें शिंदे गुट को ही असली शिवसेना माना गया था। इसी मामले में नामी वकील असीम सरोदे ने पुणे में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर शिंदे गुट की कानूनी स्थिति को लेकर बड़ा दावा किया है।
सरोदे ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में उद्धव ठाकरे, मामले की पैरवी कर रहे वकील कपिल सिब्बल या कोई अन्य बाहरी व्यक्ति एकनाथ शिंदे के लिए सबसे बड़ी परेशानी नहीं है। उनके मुताबिक शिंदे गुट के साथ मौजूद तीन मंत्री ही कुछ ऐसे दस्तावेजों की वजह से कानूनी तौर पर मुश्किल में पड़ सकते हैं, जो मामले में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट में अगले सप्ताह शिंदे गुट को अपना पक्ष रखने का मौका मिलने की संभावना के बीच असीम सरोदे ने कहा कि उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती समय की होगी। उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि शिंदे गुट को अपने दावे सुप्रीम कोर्ट के सामने रखने के लिए कम समय मिलेगा।
सरोदे ने दावा किया कि शिंदे गुट के सामने दूसरी बड़ी चुनौती दस्तावेजों की है। उन्होंने उस प्रस्ताव का हवाला दिया, जिसमें एकनाथ शिंदे को पार्टी से निलंबित किए जाने की बात कही गई थी।
असीम सरोदे के मुताबिक, जब एकनाथ शिंदे और उनके समर्थक विधायक मुंबई से बाहर चले गए थे, उस दौरान शिवसेना के कुछ विधायक मुंबई में ही रुके थे। उन्हीं के बीच एकनाथ शिंदे को पार्टी से निलंबित करने से संबंधित प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए गए थे।
सरोदे ने दावा किया कि इस प्रस्ताव में उदय सामंत, संजय राठोड और दादा भुसे के हस्ताक्षर हैं। उनका कहना है कि इन तीनों नेताओं ने अब तक सार्वजनिक तौर पर यह नहीं कहा है कि प्रस्ताव पर मौजूद हस्ताक्षर उनके नहीं हैं।
सरोदे ने कहा कि यही दस्तावेज शिंदे गुट के लिए महत्वपूर्ण कानूनी चुनौती बन सकता है। उनके मुताबिक, इस प्रस्ताव में एकनाथ शिंदे के निलंबन के समर्थन में हस्ताक्षर करने वाले नेताओं की भूमिका स्पष्ट दिखाई देती है।
असीम सरोदे ने शिवसेना के पार्टी संविधान में किए गए बदलाव का भी उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि एकनाथ शिंदे खुद पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक में नेता के तौर पर मौजूद थे और जब पार्टी संविधान में विस्तार किया गया, तब उन्होंने उस पर हस्ताक्षर भी किए थे।
सरोदे के अनुसार, इस संबंध में दस्तावेज सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश किए जा चुके हैं। उनका सवाल है कि अगर इन दस्तावेजों में एकनाथ शिंदे की मौजूदगी और हस्ताक्षर दर्ज हैं तो इन्हें कैसे नकारा जा सकता है?
सरोदे ने आरोप लगाया कि केंद्रीय चुनाव आयोग के फैसले में इन दस्तावेजों पर गौर नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि यही उद्धव ठाकरे गुट की ओर से सुप्रीम कोर्ट में रखे जा रहे प्रमुख तर्कों में से एक है। उन्होंने दावा किया कि शिंदे गुट के लिए यह साबित करना आसान नहीं होगा कि उद्धव ठाकरे गुट की ओर से पेश किए गए दस्तावेज और दावे गलत हैं।
हालांकि, ये दावे असीम सरोदे की ओर से किए गए हैं और इस मामले में दस्तावेजों की कानूनी व्याख्या तथा अंतिम निष्कर्ष सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और फैसले पर निर्भर करेगा। इस वजह से अब सुप्रीम कोर्ट में होने वाली अगली सुनवाई में इन दस्तावेजों और दावों पर दोनों पक्षों की दलीलें महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं।