
1997 में मई का ही महीना था, जब ममता बनर्जी कांग्रेस में अलग-थलग पड़ चुकी थीं। वह अपने बागी तेवर तो काफी पहले से दिखाने लगी थीं, लेकिन तब तक ऐसा वक्त आ गया था जब पश्चिम बंगाल कांग्रेस और ममता के बीच की खाई लगातार चौड़ी हो रही थी। साल के अंत तक मतभेद इतने बढ़ गए कि ममता ने अपनी राह अलग कर ली। उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर अपनी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) बना ली थी।
28 साल बाद मई के महीने में ही तृणमूल बिखर गई। पश्चिम बंगाल में सत्ता से बाहर होते ही 2026 की मई में पार्टी को सबसे बड़ी बगावत झेलनी पड़ी। ममता बनर्जी के विधायकों ने ही विधान सभा में पार्टी को दो फाड़ कर दिया। अब लोक सभा में भी पार्टी टूटने के कगार पर है।
ममता बनर्जी का यह हाल पश्चिम बंगाल में उसी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से हारने के बाद हुआ है, जिसकी मदद लेकर उन्होंने कांग्रेस को पश्चिम बंगाल में पहले कमजोर किया और फिर एक तरह से मिटा ही दिया। ममता ने जनवरी, 1998 में कांग्रेस से अलग होकर टीएमसी बनाई थी। फरवरी में लोक सभा के मध्यावधि चुनाव हुए। यह चुनाव उन्होंने भाजपा से समझौता कर लड़ा और टीएमसी को पश्चिम बंगाल की दूसरी सबसे बड़ी और मुख्य विपक्षी पार्टी बना दिया। कांग्रेस का बस एक सांसद जीता, जबकि इससे पहले के चुनाव में कांग्रेस के नौ सांसद थे।
इसके बाद विधान सभा चुनावों में भी ममता ने कांग्रेस को कभी खड़ा नहीं होने दिया। पहले उन्होंने वामपंथियों को 'साफ' किया और फिर कांग्रेस को नंबर दो पर ला खड़ा किया।
| चुनाव वर्ष | पहला दल (सीटें) | दूसरा दल (सीटें) | तीसरा दल (सीटें) | चौथा दल (सीटें) | अन्य | कुल सीटें |
| 1952 | 🔵 INC (150) | 🔴 CPI (28) | 🟠 KMPP (15) | 🟤 AIFB (11) | 34 | 238 |
| 1957 | 🔵 INC (152) | 🔴 CPI (46) | 💗 PSP (21) | 🔵 AIFB (8) | 25 | 252 |
| 1962 | 🔵 INC (157) | 🔴 CPI (50) | 🟤 AIFB (13) | 🔵 RSP (9) | 23 | 252 |
| 1967 | 🔵 INC (127) | 🔴 CPI(M) (43) | 🔵 BC (34) | 🔴 CPI (16) | 60 | 280 |
| 1969 | 🔴 CPI(M) (80) | 🔵 INC (55) | 🔵 BC (33) | 🔴 CPI (30) | 82 | 280 |
| 1971 | 🔴 CPI(M) (113) | 🟢 INC(R) (105) | 🔴 CPI (13) | 🔵 SUCI (7) | 56 | 280 |
| 1972 | 🟢 INC(R) (216) | 🔴 CPI (35) | 🔴 CPI(M) (14) | 🔵 RSP (3) | 26 | 280 |
| 1977 | 🔴 CPI(M) (178) | 🔵 JP (29) | 🔵 AIFB (25) | 🟢 INC(R) (20) | 42 | 294 |
| 1982 | 🔴 CPI(M) (174) | 🟢 INC(I) (49) | 🔵 AIFB (28) | 🔵 RSP (19) | 24 | 294 |
| 1987 | 🔴 CPI(M) (187) | 🟢 INC(I) (40) | 🔵 AIFB (26) | 🔵 RSP (18) | 23 | 294 |
| 1991 | 🔴 CPI(M) (182) | 🔵 INC (43) | 🔵 AIFB (29) | 🔵 RSP (18) | 22 | 294 |
| 1996 | 🔴 CPI(M) (153) | 🔵 INC (82) | 🔵 AIFB (21) | 🔵 RSP (18) | 20 | 294 |
| 2001 | 🔴 CPI(M) (143) | 🟢 AITC (60) | 🟢 INC (26) | 🟤 AIFB (25) | 40 | 294 |
| 2006 | 🔴 CPI(M) (176) | 🟢 AITC (30) | 🔵 AIFB (23) | 🔵 INC (21) | 44 | 294 |
| 2011 | 🟢 AITC (184) | 🔵 INC (42) | 🔴 CPI(M) (40) | 🟤 AIFB (11) | 17 | 294 |
| 2016 | 🔵 AITC (211) | 🔵 INC (44) | 🔴 CPI(M) (26) | 🟠 BJP (3) | 10 | 294 |
| 2021 | 🟢 AITC (215) | 🟠 BJP (77) | 🔵 ISF (1) | 🟢 GJM (1) | 0 | 294 |
| 2026 | 🟠 BJP (207) | 🟢 AITC (80) | 🔵 INC (2) | 🔵 AJUP (2) | 🔴 CPI(M) (1) | 293 |
पश्चिम बंगाल की राजनीति में कांग्रेस 1977 से ही वामपंथियों के खिलाफ सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी का रोल निभाते आ रही थी। लेकिन, 1990 के दशक में ममता बनर्जी को लगने लगा था कि पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार का कांग्रेस उस मजबूती से विरोध नहीं कर पा रही, जितनी उसे करनी चाहिए थी।
ममता को लगने लगा कि वही एक मात्र नेता हैं जो वामपंथियों की मजबूत सरकार को टक्कर दे सकती हैं। वह गठबंधन सरकारों का दौर था। केंद्र में सरकार चलाने के लिए वामपंथियों पर कांग्रेस की निर्भरता से ममता को अपनी आलोचनाओं को और धार देने का मौका मिला। प्रदेश कांग्रेस के नेताओं से उनके मतभेद बढ़ते गए और 1998 में उन्होंने अपनी अलग पार्टी बना ली। इसके बाद के पहले ही चुनाव में ममता की तृणमूल कांग्रेस ने मुख्य विपक्षी कांग्रेस की जगह खुद ले ली।
1993 में 27 जुलाई को पश्चिम बंगाल युवा कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने मतदाता पहचान पत्र को मतदान के लिए अनिवार्य किए जाने की मांग करते हुए बड़ा प्रदर्शन किया। कोलकाता की सड़कों पर हजारों कांग्रेसी निकल पड़े थे। उन्हें रोकने के लिए बैरिकेड लगाए गए थे, लेकिन उन्हें तोड़ कर कार्यकर्ता आगे बढ़ने लगे। पुलिस को फायरिंग करनी पड़ी। इसमें 13 युवा कार्यकर्ताओं की मौत हो गई। इससे ममता बनर्जी की 'फायरब्रांड नेता' की छवि और मजबूत हुई।
1994 में 21 जुलाई को ममता बनर्जी ने मारे गए कार्यकर्ताओं की पहली बरसी पर कोलकाता में बड़ा कार्यक्रम किया। इससे पहले 1993 में ममता बनर्जी ने नरसिम्हा राव की सरकार से मंत्री पद से भी इस्तीफा दे दिया था।
1993 में 27 अगस्त को ममता ने कांग्रेस की तुलना तरबूज से करते हुए कहा था कि वह ऊपर से हरा, लेकिन अंदर से लाल है। उन्होंने कहा था, 'कांग्रेस के नेता माकपा और वाम मोर्चा सरकार की खुल कर आलोचना नहीं करते, क्योंकि वे गुपचुप सत्ता से फायदे ले रहे हैं। वे पैसे और कोलकाता के साल्ट लेक जैसे पॉश इलाके में कीमती जायदाद ले रहे हैं। कांग्रेस में ऐसे तरबूज़ों की भरमार है जो केवल ऊपर से हरा दिखते हैं, अंदर से लाल हैं।'
इस बीच राज्य में कांग्रेस के दो गुट बन गए। सोमेन मित्रा के हाथ में राज्य कांग्रेस की कमान थी। ममता बनर्जी का कांग्रेस के प्रति आक्रामक रुख कायम रहा। नवंबर, 1996 में पश्चिम बंगाल सरकार ने 'ऑपरेशन सनशाइन' शुरू किया। यह ऑपरेशन कोलकाता की सड़कों को रेहड़ी-ठेली वालों से मुक्त करने के लिए था। ममता बनर्जी ने सड़कों पर कारोबार करने वाले हॉकर्स के पक्ष में मोर्चा खोल दिया। उन्होंने उनके समर्थन में आंदोलन की घोषणा की। सोमेन मित्रा को लग रहा था कि ममता का यह अभियान फेल हो जाएगा। यह सोच कर उन्होंने इस अभियान के समर्थन की घोषणा कर दी। इस अभियान से जुड़े घटनाक्रम के चलते ममता बनर्जी और प्रदेश कांग्रेस की दूरियां और बढ़ गईं। ममता को इससे झटका लगा। मई 1997 तक ममता पार्टी में अलग-थलग पड़ चुकी थीं।
9 अगस्त को कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के पहले ही दिन ममता बनर्जी ने अपनी अलग पार्टी तृणमूल कांग्रेस बनाने की घोषणा कर दी। पार्टी के 80वें अधिवेशन में सोमेन मित्रा ने 421 सदस्यों को पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी में शामिल करने की घोषणा की। ममता बनर्जी का नाम इस लिस्ट में नहीं था।
ममता ने खुले तौर पर पार्टी नेतृत्व को चुनौती दे दी थी। सोनिया गांधी ने मान मनौवल की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी। 21 दिसंबर को ममता को कांग्रेस से बर्खास्त किया गया। इसके बाद 27 दिसम्बर, 1997 को कोलकाता में ममता बनर्जी ने पार्टी बनाने की औपचारिक घोषणा कर दी। कांग्रेस के नौ में से एक सांसद अजित पांजा भी उनके साथ आए थे।
ममता ने भले ही टीएमसी की घोषणा 27 दिसंबर को की, लेकिन उन्होंने कहा कि पार्टी का स्थापना दिवस 1 जनवरी, 1998 रहेगा। तब से ममता का राजनीतिक सफर पहली बार उतार पर दिख रहा है।