
अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व पीएम
Kargil Vijay Diwas Atal Bihari Vajpayee: आज देश करगिल विजय दिवस की 27वीं वर्षगांठ मना रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से लेकर कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने शहीदों को याद करते हुए एक्स पर पोस्ट किया है। साल 199 में करगिल युद्ध भारत के पीठ में पाकिस्तान द्वारा घोंपा गया एक खंजर था। तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी ने ललकारते हुए पाकिस्तान को दुनिया के नक्शे से मिटाने की बात कह दी थी।
साल 1999 तक भारत और पाकिस्तान तब तक तीन जंग लड़ चुके थे। रिश्तों पर पड़ी बर्फ पिघलाने के लिए भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने साहसी फैसला लिया। दिल्ली से लाहौर तक मैत्री बस सेवा की शुरुआत की। खुद बस में सवार होकर भारत के प्रधानमंत्री लाहौर पहुंचे। वह अपने साथ क्रिकेटरों व बॉलीवुड के सितारों को लेकर भी लाहौर पहुंचे। पाकिस्तान के पीएम नवाज शरीफ (1999) ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। दोनों नेताओं ने लाहौर डेक्लरेशन (लाहौर घोषणा पत्र) पर हस्ताक्षर किए। जब अटल बिहारी के नेतृत्व में भारत पाकिस्तान के सामने दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा था। उसी दौरान पाकिस्तान के सेना अध्यक्ष परवेज मुशर्रफ, जो बाद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति भी बने। भारत के पीठ में खंजर घोंपने की तैयारी में जुटे थे।
साल 1999 के मई महीने में पाकिस्तान की नॉर्दन लाइन इंफ्रेंट्री के सैनिक द्रास, कारगिल और LoC के हिस्सों पर घुसपैठ कर चुके थे। कुछ चरवाहों ने इसकी सूचना भारतीय सैनिकों को दी। पेट्रोलिंग पर गई भारतीय सैनिकों की टुकड़ी को पाकिस्तानी घुसपैठियों ने निशाना बनाया। शुरुआत में भारतीय सेना को लगा कि ये कुछ मुट्ठी भर मुजाहिदीन हैं, लेकिन लगातार हताहतों की संख्या बढ़ने पर सेना को यह समझ में आ गया कि यह काम पाकिस्तानी सेना का है, जो भारतीय सेनाओं के बनाए गए बंकरों में घुसपैठ कर चुकी है।
उस समय दोनों देशों की सेना के बीच एक अनकहा नियम था, दोनों देशों की सेनाएं सर्दी के मौसम में ऊंचाई पर बनीं पोस्टों को छोड़कर नीचे आ जाती थी। इसी का फायदा उठाते हुए साल 1999 में गर्मी का मौसम शुरू होने से पहले पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय पोस्ट पर कब्जा जमा लिया था।
भारतीय सेना ने अपनी जमीन वापस लेने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। भारतीय सेना का ऑपरेशन विजय और वायुसेना का ऑपरेशन सफेद सागर शुरू हो चुका था। करगिल युद्ध के दौरान बोफोर्स की तोप के गोलें पहाड़ों के दरख्त उड़ा रहे थे। पूरी दुनिया की नजह इस सैन्य झड़प पर थी।
इस दौरान अमेरिका अपनी चौधराहट दिखाने के लिए आतुर था। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भारत और पाकिस्तान पर जंग रोकने का दबाव बना रहे थे। क्लिंटन ने अपनी आत्मकथा में माय लाइफ में कारगिल युद्ध और भारत के पीएम अटल बिहारी वाजपेयी संग बातचीत का जिक्र किया है।
बोफोर्स की तोपों और भारतीय सेना के युवा अधिकारी अद्मय साहस का परिचय दे रहे थे। पाकिस्तानी सैनिकों के पास पीछे हटने के अलावा कोई चारा नहीं था। पाकिस्तान ने खुद को हारता देख परमाणु बम की गीदड़ भभकी देनी शुरू कर दी। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को पता चला कि पाकिस्तान ने अपने परमाणु हथियार अलर्ट पर रखे हैं।
इससे वाशिंगटन में बैठे क्लिंटन के माथे पर शिकन की लकीरें आ गईं। उन्होंने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से बात की, जो परमाणु हमले के डर का हवाला देकर युद्ध रोकने की गुहार लगा रहे थे। इसके बाद क्लिंटन ने भारत पर दबाव डालने की कोशिश की और वाजपेयी जी से संपर्क किया। कुछ रिपोर्ट्स में आधी रात के फोन कॉल का जिक्र है, तो कुछ में गोपनीय पत्र का।
अटल बिहारी ने पाकिस्तान की गीदड़ भभकी पर क्लिंटन की बात का जवाब देते हुए कहा, 'मिस्टर क्लिंटन, मैं आपको बता दूं कि मैं अपनी आधी आबादी खोने को तैयार हूं, लेकिन पाकिस्तान कल सुबह का सूरज नहीं देख पाएगा। वाजपेयी ने स्पष्ट कर दिया कि भारत LOC पार नहीं करेगा, लेकिन घुसपैठियों को हर हाल में निकालेंगे। भारतीय प्रधानमंत्री की बात सुनने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने फौरन पाकिस्तान के पीएम नवाज शरीफ को वाशिंगटन बुलाया। नवाज भागे-भागे अमेरिका पहुंचे। 4 जुलाई 1999 को शरीफ ने क्लिंटन से मुलाकात की और पाकिस्तानी सैनिकों की वापसी की घोषणा की। 26 जुलाई को भारत ने कारिगल विजय की घोषणा की।
Updated on:
26 Jul 2026 09:33 am
Published on:
26 Jul 2026 09:32 am
