
धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा मंत्री पद से दिया इस्तीफा (Photo-IANS)
Dharmendra Pradhan Resignation: केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहा आंदोलन खत्म हो गया है। शनिवार को प्रधान ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। बताया जा रहा है कि सरकार ने सीजेपी की अन्य मांगों को भी मांग लिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का फैसला लंबे मंथन के बाद लिया गया है। शुक्रवार तक अटकलें लगाई जा रही थी सरकार शिक्षा मंत्री का इस्तीफा नहीं लेगी, लेकिन शनिवार को इस्तीफे की खबर ने सबको चौंका दिया।
बताया जा रहा है कि सरकार को आशंका थी यदि यह आंदोलन लगातार जारी रहा तो इसका सामाजिक और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है। साथ ही, आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारी कर रही बीजेपी को इसका राजनीतिक नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। बता दें कि यूपी, पंजाब और गुजरात में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार के सामने सबसे बड़ी चिंता देश के युवाओं, विशेषकर जेनरेशन-जी (Gen Z) की बढ़ती नाराजगी थी। माना गया कि यह आंदोलन जाति, धर्म और क्षेत्रीय सीमाओं से ऊपर उठकर छात्रों को एक मंच पर ला रहा था, जिससे इसका प्रभाव लगातार बढ़ रहा था।
बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि सरकार ने शुरुआत में इस्तीफे के बजाय व्यवस्था में सुधार और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई को प्राथमिकता दी। नीट की दोबारा परीक्षा कराई गई और जांच एजेंसियों ने आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई भी शुरू की।
हालांकि, पार्टी का मानना था कि विपक्ष और अन्य समूह आंदोलन को राजनीतिक रंग देकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे थे। इसके बावजूद छात्रों का विरोध लगातार बढ़ता गया।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर सड़क से लेकर संसद तक राजनीति गरमा गई थी। विपक्ष इस मांग को लेकर लगातार प्रदर्शन कर रहा था, जिसके कारण संसद भी नहीं चल पा रही थी।
उनका कहना था कि जब तक मंत्री पद नहीं छोड़ते, तब तक संसद की कार्यवाही नहीं चलने दी जाएगी। इससे सरकार के लिए सार्वजनिक परीक्षाओं में नकल और अनियमितताओं के खिलाफ कानून को और सख्त बनाने वाला विधेयक पारित कराना भी मुश्किल हो गया था।
सूत्रों के अनुसार, सुरक्षा एजेंसियों ने सरकार को चेतावनी दी थी कि सप्ताहांत में आंदोलन के हिंसक होने और सामाजिक अशांति फैलने की आशंका है। इसके बाद सरकार ने तनाव कम करने के लिए त्वरित कदम उठाने का फैसला किया।
सूत्रों का कहना है कि सरकार किसी भी कीमत पर हिंसा और रक्तपात नहीं चाहती थी। इसलिए हालात को नियंत्रित करने के लिए यह फैसला लिया गया। दरअसल, 20 जुलाई को सीजेपी ने संसद चलो मार्च का आयोजन किया था। इस मार्च के दौरान प्रदर्शनकारी और पुलिस आमने-सामने हो गए। जिसमें कई छात्रों को चोट भी लगी थी।
छात्रों पर हुई लाठीचार्ज के विरोध में विपक्ष ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं बॉलीवुड से लेकर सामाजिक हस्तियों ने पुलिस की इस कार्रवाई की आलोचना की। जिससे सरकार घिर गई थी।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने भी सरकार को छात्रों के आंदोलन को गंभीरता से लेने और शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार करने की सलाह दी थी।
शुक्रवार को संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी कहा कि आज का युवा केवल आदेश नहीं मानता, बल्कि हर सवाल का जवाब तर्क और समझ के आधार पर चाहता है। उन्होंने कहा कि संस्थाओं और परिवारों को युवाओं की बात सुननी होगी और संवाद के माध्यम से समाधान निकालना होगा।
वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार के फैसले के पीछे आगामी विधानसभा चुनाव भी एक बड़ा कारण रहे। पार्टी को आशंका थी कि यदि छात्र आंदोलन और तेज हुआ तो विपक्ष इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बना सकता है।
बीजेपी के एक नेता ने कहा कि भारत के राजनीतिक इतिहास में युवाओं ने कई बड़े आंदोलनों का नेतृत्व किया है। ऐसे में कोई भी राजनीतिक दल युवाओं की नाराज़गी को लंबे समय तक नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं उठा सकता।
Updated on:
26 Jul 2026, 11:17 AM IST
Published on:
26 Jul 2026, 10:56 AM IST
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