
साल 1949 में चीन में कम्युनिस्ट पार्टी का राज स्थापित हो चुका था। माओ से-तुंग के नेतृत्व में चीन विस्तारवादी योजनाओं के तहत आगे बढ़ने लगा। 7 अक्टूबर 1950 को चीन की पीपल्स लिब्रेसन आर्मी ने तिब्बत के पूर्वी हिस्से में घुसपैठ की। उन्होंने चाम्दो की लड़ाई में तिब्बती सेना को हरा दिया। 23 मई 1951 को चीन की PLA ने जबरन 17-पॉइंट एग्रीमेंट पर दस्तखत करवाए गए, जिसके बाद तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया गया। तिब्बत पर राज करने वाले बौद्ध धर्म गुरु दलाई लामा को साल 1959 में लहासा से भागकर अरुणाचल प्रदेश के रास्ते भारत आना पड़ा। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें शरण दी। आज तिब्बत की निर्वासित सरकार व लोग हिमाचल के धर्मशाला में रहते हैं। उधर, कब्जे के बाद से ही चीन का तिब्बत में अत्याचार शुरू हो गया। आज 78 साल बाद चीन पूरी तरह से तिब्बत का अस्तित्व मिटाना चाहता है। चीन ने तिब्बत के 10 लाख बच्चों को अपने परिवारों से दूर कर दिया है। वह अपनी भाषा तक भूल चुके हैं।
भारत के सामरिक मामलों के जाने माने विशेषज्ञ ब्रह्म चेलानी ने द हिल में लिखे आर्टिकल में बताया है कि चीन, तिब्बत का अस्तित्व मिटाने पर पूरी प्लानिंग के तहत काम कर रहा है। उन्होंने बताया कि पिछले दस साल में बीजिंग ने 10 लाख से ज्यादा तिब्बती बच्चों को जबरन सरकारी बोर्डिंग स्कूलों में भर्ती कर लिया है। बच्चों को महज 4 साल की उम्र में परिवार और माता-पिता से अलग कर दिया जाता है। ये बच्चे ज्यादातर बोर्डिंग स्कूलों में अपना समय बिताते हैं। जिसकी वजह से ये अपनी तिब्बती मातृभाषा, संस्कृति और धर्म से दूर होते जा रहे हैं।
ब्रह्म चेलानी ने अपने आर्टिकल में बताया कि चीन अब तिब्बत शब्द को दुनिया की डिक्सनरी से मिटाने में जुटा है। उसने तिब्बत को नया नाम शिजांग दिया है। इसका मतलब है पश्चिमी खजाना। पश्चिम (यूरोप) के कुछ यूनिवर्सिटी भी अब तिब्बत की जगह शिजांग नाम का इस्तेमाल करते हैं। इससे चीन की चाल पर मुहर लगती है।
दरअसल, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने शिजांग नाम देकर नई चाल भी चली है। तिब्बत बीजिंग से दक्षिण पश्चिम दिशा में है। यहां से कई नदियां निकलती है। जहां अब चीन बड़े पैमाने पर बांध निर्माण का कार्य कर रहा है। साथ ही, खनिज संसाधनों का दोहन भी तेजी से कर रहा है।