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उस दिन लालच में आ जातीं तो शायद कभी राष्ट्रपति नहीं बन पातीं द्रौपदी मुर्मू

President Draupadi Murmu Birthday: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू राजनीति में किनके कहने पर आई थीं? आखिर ऐसा क्या हुआ था कि एक वक्त पर उन्होंने राजनीति छोड़ने के बारे में सोचना शुरू कर दिया था। उनके जीवन से जुड़े तीन किस्से पढ़िए।

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President Droupadi Murmu
भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू (इमेज सोर्स: आईएएनएस)

President Droupadi Murmu : साल 2022, मंगलवार का दिन और जून की 21 तारीख थी। ओडिशा के रायरंगपुर में उस शाम तेज बारिश हुई थी। इस वजह से बिजली चली गई थी। फोन का नेटवर्क भी सही काम नहीं कर रहा था। आठ-साढ़े आठ का वक्त था। द्रौपदी मुरमू खाना खा चुकी थीं। सोने की तैयारी में थीं। तभी उनके पीए विकास महंत भागे-भागे उनके पास आए। उन्होंने उनको फोन पकड़ाया। फोन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे। उन्होंने जो बात कही, वह सुनते ही द्रौपदी मुर्मू का चेहरा चमक गया था। उन्हें एनडीए की ओर से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जा रहा था।

द्रौपदी मुर्मू के लिए यह जन्मदिन का सबसे बड़ा तोहफा था। भले ही जन्मदिन के अगले दिन आया था।

द्रौपदी मुर्मू के राजनीति में आने का किस्सा

1997 में रायरंगपुर अधिसूचित क्षेत्र परिषद (Notified Area Council - NAC) का चुनाव होने वाला था। बीजेपी को वार्ड नंबर दो के लिए किसी अच्छे उम्मीदवार की तलाश थी। यह वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित था और जनजातीय आबादी ज्यादा थी। उस समय भाजपा के जिला अध्यक्ष थे रवींद्र महंत। उनका घर उसी स्कूल के पास था, जिसमें द्रौपदी मुर्मू पढ़ाती थीं। ऐसे में उनकी नजर द्रौपदी मुर्मू पर पड़ी। वह राजधानी भुवनेश्वर में पढ़ी महिला थीं, सरकारी स्कूल में शिक्षक की नौकरी कर रही थीं और संथाल समुदाय की थीं।

बीजेपी नेता राजकिशोर दास लगातार दूसरी बार एनएसी चेयरमैन बनने के लिए मैदान में थे। उन्होंने मुर्मू के ही स्कूल में पढ़ाने वाले एक शिक्षक के जरिये उन्हें चुनाव लड़ने का प्रस्ताव भिजवाया। उन्होंने इसे हल्के में लिया और कोई रुचि नहीं दिखाई। संदीप साहू ने द्रौपदी मुर्मू की जीवनी 'मैडम प्रेसिडेंट' में बताया है कि इंकार के बाद भाजपा के नेताओं ने खुद मुर्मू और उनके पति से संपर्क किया। इसके बाद वह मान गईं। इस तरह उनकी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत हुई, जो करीब ढाई दशक बाद देश के सर्वोच्च पद तक जा पहुंची।

बीजद ने दिया था मंत्री पद का लालच

2009 में जब लोक सभा और ओडिशा विधान सभा के चुनाव एक साथ होने वाले थे, बीजू जनता दल (बीजद) ने बीजेपी से रिश्ता तोड़ लिया। इसके बाद बीजद नेताओं ने द्रौपदी मुर्मू और उनके पति से संपर्क साधा। उन्हें विधायक का टिकट और मंत्री का पद ऑफर किया। लेकिन, उन्होंने मना कर दिया। उस दिन अगर वह मंत्री पद के लालच में आ जातीं तो शायद कभी राष्ट्रपति नहीं बन पातीं।

राजनीति छोड़ने के बारे में सोचने लगी थीं

द्रौपदी मुर्मू ने पारिवारिक जीवन में बड़े झंझावात देखे हैं। पांच साल के भीतर उन्होंने दो बेटों और पति को खोया। 2010 में बड़े बेटे लक्ष्मण की रहस्यमय मौत हो गई। महज 26 की उम्र में! तीन साल बाद एक सड़क हादसे में 28 साल का दूसरा बेटा भी चला गया। इसके एक साल के भीतर बीमारी के चलते पति का साथ भी हमेशा के लिए छूट गया।

चार साल में तीन मौतें देखने के बाद द्रौपदी मुर्मू अवसाद में चली गई थीं और राजनीति छोड़ने तक का सोचने लगी थीं। लेकिन, रायरंगपुर में प्रजापिता ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के दौरे ने उनका नजरिया बदल दिया। धीरे-धीरे उन्होंने मन की खोई शांति वापस पाई और जीने की इच्छा भी लौटने लगी।

रायरंगपुर से राष्ट्रपति का नाता आज भी वैसा ही है। अपनी माटी से उनका जुड़ाव पहले जैसा ही बना है। 19 जून को भी वह रायरंगपुर में ही थीं।

Published on:
20 Jun 2026 08:02 am