
India Fuel Price Latest Update: भारत में पेट्रोल, डीजल और LPG की कीमतों में अब तक कोई खास राहत नहीं मिली है। इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब ग्लोबल मार्किट में कच्चा तेल सस्ता हो गया है, तो हमारे लोगों को महंगा ईंधन खरीदने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ रहा है?
कांग्रेस प्रेसिडेंट ने साफ कहा कि सरकार टैक्स के जरिए जनता की जेब काट रही है। वह गैस की लगातार कीमतें बढ़ाकर लोगों पर आर्थिक रूप से अतिरिक्त बोझ डाल रही है। अब तो आम जनता बीजेपी के लिए सिर्फ टैक्स वसूलने का जरिया बन गई है। उनका सवाल था कि आखिर वैश्विक बाजार में राहत मिलने के बावजूद देशवासियों को पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के दामों में राहत कब मिलेगी?
उन्होंने आगे कहा कि जब पश्चिम एशिया में युद्ध के दौरान कच्चा तेल 138 डॉलर प्रति बैरल था, तब पेट्रोल और डीजल की कीमतें वर्तमान से कम थीं, जबकि अब कच्चे तेल की कीमत लगभग 70.71 डॉलर प्रति बैरल होने के बावजूद उपभोक्ताओं को राहत नहीं दी जा रही है।
बता दें होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है। इसी रास्ते से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचते हैं। अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण पिछले दिनों जब, इस अहम समुद्री मार्ग को बंद किया गया… तब पूरी दुनिया में तेल-गैस संकट छा गया। भारत, नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश और पाकिस्तान में तेल-गैस की कीमतों में बढ़ोतरी देखी गई। हाहाकार सा मच गया। भारत में जो पेट्रोल 97 और 100 रुपये प्रति लीटर मिलता था, उसकी कीमत 108-112 पहुंच गई।
अब ब्लूमबर्ग ने इसी मुद्दे (होर्मुज संकट) पर रिपोर्ट साझा की है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, इस संकट ने दिखाया कि दुनिया के कई देश जेट फ्यूल के लिए बाहरी सप्लाई पर काफी निर्भर हैं। ऐसे में ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और मेक्सिको जैसे देशों पर सबसे ज्यादा जोखिम है। इसके अलावा फ्रांस, जर्मनी और वियतनाम जैसे देशों की एविएशन इंडस्ट्री भी प्रभावित हो सकती है।
हालांकि अभी फारस की खाड़ी से तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की सप्लाई दोबारा शुरू हो गई है, लेकिन शिपिंग पूरी तरह सामान्य होने में समय लगेगा। इस वजह से भविष्य में सप्लाई चेन पर खतरा बना रह सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, यह आकलन पिछले साल सबसे ज्यादा हवाई यात्रा वाले 50 देशों के आंकड़ों के आधार पर किया गया है। इसमें एयरलाइन क्षमता को 'अवेलेबल सीट माइल्स' के जरिए मापा गया, जिससे पता चलता है कि किसी देश में हवाई यात्रा की मांग कितनी है। जिन देशों में उड़ानों की संख्या ज्यादा है लेकिन जेट फ्यूल का उत्पादन कम है, वहां संकट की स्थिति में सबसे अधिक असर पड़ सकता है।