
आजाद भारत के करीब आठ दशकों में लगभग साढ़े तीन दशक देश का नेतृत्व नेहरू-गांधी परिवार के हाथों में रहा है। परिवार के तीन लोग दस बार प्रधानमंत्री बने (अंत में दिया गया टेबल देखें) । इंदिरा गांधी को लाल बहादुर शास्त्री की मौत के बाद पीएम बनने का मौका मिला था, जबकि राजीव गांधी को इंदिरा की मौत के नौ घंटे के भीतर ही प्रधानमंत्री बना दिया गया था। जब राजीव को पीएम बनने के लिए कहा गया तो उन्हें बहुत ज्यादा झिझक नहीं थी। प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब The Turbulent Years 1980-86 में लिखा है कि राजीव ने बस इतना कहा- मुझसे हो पाएगा? तब मुखर्जी ने कहा था- हम सब आपके साथ हैं।
असल में राजीव को राजनीति में आए ज्यादा वक्त नहीं हुआ था। इस पर भी वह अरुचि से राजनीति में आए थे। हालात की मजबूरी के चलते। वह तो पायलट की नौकरी में जम चुके थे। लेकिन, विमान हादसे में छोटे भाई संजय गांधी की मौत ने उनके लिए राजनीति के दरवाजे खोल दिए। कैसे, पूरी कहानी आगे जानिए:
साल 1980, और महीना जून का था। 23 तारीख थी। राजीव परिवार के साथ छुट्टियां मनाने इटली गए हुए थे। यहां दिल्ली में छोटे भाई संजय गांधी सुबह-सुबह ही जहाज उड़ाने सफदरजंग फ्लाइंग क्लब पहुंच गए। यह उनका शौक था। वह ऐसा अक्सर किया करते थे, लेकिन उस दिन के बाद कभी नहीं कर सके। पिट्स एस-2ए लेकर वह करीब सवा सात बजे उड़े ही थे कि कुछ देर में विमान क्रैश हो गया। संजय गांधी के दफ्तर, 12 वेलिंगटन क्रेसेंट के पीछे ही विमान धरती पर बिखर गया। संजय और उनके साथ गए कैप्टन सुभाष सक्सेना की लाश तो मिल गई, पर वे पहचानने लायक नहीं रह गई थीं।
संजय की लाश राम मनोहर लोहिया अस्पताल ले जाई गई। घटनास्थल के बाद इंदिरा गांधी वहां भी मौजूद थीं। वह आंखों पर काला चश्मा चढ़ाए हुई थीं। शायद आंखों में उमड़ा दुख दुनिया से छिपाने के मकसद से।
संजय की लाश अस्पताल से 1 अकबर रोड ले जाई गई। इस दौरान इंदिरा ने ट्रक पर मेनका गांधी को भी अपनी बगल में बैठने के लिए कहा। यह देख कर कई लोगों को लगा कि इंदिरा मेनका को ही संजय की राजनीतिक वारिस बनाएंगी। मेनका उस समय महज 24 साल की थीं और मात्र तीन महीने पहले वरुण की मां बनी थीं।
1 अकबर रोड पर संजय को श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगा हुआ था। लोगों की कतार कई किलोमीटर लंबी थी। वे लंबा इंतजार करके संजय की आखिरी झलक देख पा रहे थे। देर रात हो गई थी। फिर भी आने वालों का कारवां रुक नहीं रहा था। प्रणब मुखर्जी अपनी किताब The Turbulent Years 1980-86 में लिखते हैं, 'मैंने देखा संजय की मृत देह के पास इंदिरा गांधी आईं। मुझे ऐसा लगा कि उन्होंने देखा संजय के पांव का छोटा सा हिस्सा चादर के बाहर आ गया था। वह धीरे से बुदबुदाईं कि उसे ठंड लगेगी और चादर से पांव ढंक दिया।'
इंदिरा दुख में डूबी हुई थीं, लेकिन किसी पर जाहिर नहीं होने दे रही थीं। इस बीच राजीव इटली से आ गए थे। संजय की मौत की अगली सुबह जब इंदिरा ने राजीव को गले लगाया तो कहा, 'अब मेरे लिए तुम ही रह गए हो।' उनके इन शब्दों से साफ हो गया कि इंदिरा ने राजीव को राजनीति में लाने का फैसला कर लिया है।
राजीव ने 24 जून को शांति वन पर छोटे भाई की चिता को मुखाग्नि देकर इस लोक से विदा किया। इसके बाद उनके सामने राजनीति में आने का सवाल आया। उनका पहला जवाब तो यही था- मैं राजनीति के लायक नहीं हूं। लेकिन, मां की मनुहार के आगे राजीव को झुकना पड़ा।
कांग्रेस के 70 सदस्यों ने राजीव के राजनीति में शामिल होने के एक प्रस्ताव पर दस्तखत किए। वे इस प्रस्ताव को लेकर इंदिरा के पास पहुंचे। इंदिरा ने फैसला राजीव पर छोड़ा। राजीव बोले, 'अगर मेरी मां को इससे मदद मिलती है तो मैं राजनीति में जाऊंगा।'
16 फरवरी, 1981 को राजीव ने अपना पहला राजनीतिक भाषण दिया। उन्होंने दिल्ली में किसानों की एक बड़ी रैली को संबोधित किया। 4 मई को उन्हें अमेठी उप चुनाव में कांग्रेस का उम्मीदवार बनाने का प्रस्ताव पारित हुआ। अगस्त, 1981 में लोक दल के शरद यादव को 237000 वोट से हरा कर राजीव गांधी पहली बार सांसद बने। इस तरह उनका चुनावी सफर शुरू हुआ। दिसंबर में उन्हें यूथ कांग्रेस का अध्यक्ष बना कर पार्टी के अहम काम में भी लगा दिया गया।
राजनीतिक सफर शुरू करने के करीब तीन साल बाद राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने। बदकिस्मती से पीएम बनने का रास्ता भी परिवार में हुई एक मौत, जो हत्या थी, से ही खुली। इस बार मरने वाली उनकी मां थीं, जिनकी पीएम रहते उनके सुरक्षा गार्ड्स ने ही हत्या कर दी थी। राजीव के पीएम बनने से पहले पर्दे के पीछे क्या कुछ हुआ, जानने के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं।
| क्र.सं. | प्रधानमंत्री का नाम | कार्यकाल (Tenure) | लोकसभा / चुनाव | पदभार ग्रहण करने की परिस्थितियाँ (Official Context) |
| 1 | पंडित जवाहरलाल नेहरू | 15 अगस्त 1947 – 15 अप्रैल 1952 | अंतरिम सरकार | स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में अंतरिम सरकार का नेतृत्व संभाला। |
| 2 | पंडित जवाहरलाल नेहरू | 15 अप्रैल 1952 – 17 अप्रैल 1957 | 1ली लोकसभा | देश के पहले आम चुनाव (1951-52) में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को प्रचंड बहुमत (364 सीटें) मिला। |
| 3 | पंडित जवाहरलाल नेहरू | 17 अप्रैल 1957 – 2 अप्रैल 1962 | 2री लोकसभा | दूसरे आम चुनाव (1957) में कांग्रेस पार्टी ने पुनः भारी बहुमत (371 सीटें) हासिल किया। |
| 4 | पंडित जवाहरलाल नेहरू | 2 अप्रैल 1962 – 27 मई 1964 | 3री लोकसभा | तीसरे आम चुनाव (1962) में भी जीत दर्ज की। 27 मई 1964 को पद पर रहते हुए उनका निधन हुआ। |
| 5 | इंदिरा गांधी | 24 जनवरी 1966 – 4 मार्च 1967 | 3री लोकसभा | ताशकंद में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के आकस्मिक निधन के बाद कांग्रेस संसदीय दल द्वारा नेता चुनी गईं। |
| 6 | इंदिरा गांधी | 4 मार्च 1967 – 15 मार्च 1971 | 4थी लोकसभा | 1967 के चौथे आम चुनाव में पार्टी के बहुमत प्राप्त करने पर पुनः प्रधानमंत्री बनीं। |
| 7 | इंदिरा गांधी | 15 मार्च 1971 – 24 मार्च 1977 | 5वीं लोकसभा | 1971 के आम चुनाव में "गरीबी हटाओ" के नारे के साथ कांग्रेस (R) ने 352 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत प्राप्त किया। |
| 8 | इंदिरा गांधी | 14 जनवरी 1980 – 31 अक्टूबर 1984 | 7वीं लोकसभा | जनता पार्टी सरकार के पतन के बाद 1980 के चुनाव में कांग्रेस (I) ने 353 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की। 31 अक्टूबर 1984 को पद पर रहते हुए उनकी हत्या हुई। |
| 9 | राजीव गांधी | 31 अक्टूबर 1984 – 31 दिसंबर 1984 | 7वीं लोकसभा | इंदिरा गांधी की हत्या के तुरंत बाद देश में संवैधानिक स्थिरता के लिए राष्ट्रपति ज़ैल सिंह द्वारा नियुक्त किए गए। |
| 10 | राजीव गांधी | 31 दिसंबर 1984 – 2 दिसंबर 1989 | 8वीं लोकसभा | दिसंबर 1984 के आम चुनाव में भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी जीत दर्ज करते हुए कांग्रेस ने 404 लोकसभा सीटें हासिल कीं। |