
food production: भोजन की थाली में घटते पोषक तत्त्व और अन्न उत्पादन में उर्वरकों का बढ़ता इस्तेमाल सेहत, मिट्टी और पर्यावरण पर भारी पड़ रहा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अनुसार आज फसलों में जिंक, लोहा, मैग्नीशियम अैर कैल्शियम के पोषक तत्त्वों में 30% तक कम हो चुके हैं। यानी जो अनाज हम खा रहे हैं, वह पेट तो भर रहा है, लेकिन जरूरी पोषण नहीं दे पा रहा। 1970 के दशक के खाद्यान्न संकट से उबरकर भारत ने कृषि उत्पादन में कई रिकॉर्ड बनाए। उपज बढ़ने से किसानों की आय बढ़ी, लेकिन इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी। जिस मिट्टी ने अन्न भंडार भरे, उसी पर रासायनिक खाद और कीटनाशकों का बोझ बढ़ गया। नतीजा यह हुआ कि उत्पादन तो तीन गुना से ज्यादा बढ़ा, लेकिन उर्वरकों का इस्तेमाल भी 14 गुना से ज्यादा हो गया।
इससे मिट्टी की सेहत कमजोर पड़ने लगी और खेती पहले से कहीं अधिक रसायनों पर निर्भर होती चली गई। वैज्ञानिक अध्ययनों और सरकारी संस्थाओं की रिपोर्टें बता रही हैं कि अत्यधिक और असंतुलित उर्वरक उपयोग से मिट्टी की जैविक गुणवत्ता घट रही है, पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ रहा है और खेती की उत्पादकता बनाए रखने के लिए पहले से अधिक रसायनों की जरूरत पड़ रही है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अब चुनौती केवल अधिक अन्न पैदा करने की नहीं, बल्कि स्वस्थ मिट्टी और पोषण-सुरक्षित भोजन बचाने की भी है।
राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण (एनआरएए) के मुताबिक देश की मिट्टी में जैविक कार्बन का स्तर 70 वर्षों में एक प्रतिशत से घटकर 0.3 प्रतिशत रह गया है। यही कार्बन मिट्टी की उर्वरता, पानी रोकने की क्षमता और सूक्ष्मजीवों के जीवन का आधार है। विशेषज्ञों के अनुसार जैविक कार्बन में गिरावट का मतलब है कि मिट्टी की प्राकृतिक शक्ति कमजोर हो रही है।
| वर्ष | खाद्यान्न उत्पादन | उर्वरक खपत |
|---|---|---|
| 1970-71 | 10.84 करोड़ टन | 22.5 लाख टन |
| 2020-21 | 30.86 करोड़ टन | 3.25 करोड़ टन |
निष्कर्ष:
50 वर्षों में खाद्यान्न उत्पादन लगभग 2.8 गुना बढ़ा, जबकि रासायनिक उर्वरकों की खपत 14.4 गुना बढ़ गई।
श्री कर्ण नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय जोबनेर के निदेशक शिक्षा प्रो. राकेश सम्मौरिया ने कहा, 'वैज्ञानिक अनुशंसा के आधार फसलों में उर्वरक की मात्रा गलत नहीं है, लेकिन अंधाधुंध तरीके से इस्तेमाल से मिट्टी, फसल, पर्यावरण और स्वास्थ्य सब पर प्रतिकूल असर होगा। देसी खाद के प्रयोग को बढ़ावा देना भी अच्छा विकल्प है। कीटनाशकों का प्रयोग बंद करना चाहिए।'