
Maharashtra Politics: महाराष्ट्र की राजनीति में लागातार घटनाक्रम सामने आ रहे हैं। उद्धव ठाकरे की पार्टी शिवसेना यूबीटी को लगातार झटके लग रहे है। पार्टी के 6 लोकसभा सांसदों के जाने के बाद अब विधान परिषद सदस्य सचिन अहीर भी शिंदे गुट वाली शिवसेना में शामिल हो गए। इसके साथ ही उन्हें शिवसेना की ओर से विधान परिषद का उपसभापति भी निर्विरोध चुन लिया गया।
शिवसेना यूबीटी के 6 सांसदों के गुट में आने के बाद महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक एकनाथ शिंदे का कद बढ़ गया है। वहीं अब मोदी कैबिनेट में फेरबदल की भी अटकलें लगाई जा रही है। माना जा रहा है कि केंद्रीय कैबिनेट में भी एकनाथ शिंदे का वर्चस्व बढ़ सकता है।
सियासी गलियारों में अब सवाल उठना शुरू हो गया है कि बीजेपी हाईकमान एकनाथ शिंदे के जरिए फडणवीस के प्रभाव को क्या कम करना चाहता है? इसको लेकर महायुति के अंदर भी यह चर्चा है कि एकनाथ शिंदे की बढ़ती ताकत मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के राजनीतिक प्रभाव को संतुलित करने की रणनीति भी हो सकती है, खासकर 2029 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों को देखते हुए।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एकनाथ शिंदे की सांसदों के बाद अब उद्धव ठाकरे के विधायकों पर भी नजर है। हालांकि इस पर बीजेपी की तरफ से भी बयानबाजी शुरू हो गई है। बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि सांसदों के शामिल होने की रणनीति को केंद्रीय नेतृत्व की मंजूरी मिली थी, लेकिन राज्य स्तर पर विधायकों के संभावित दल-बदल को लेकर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
वहीं भाजपा विधायक आशीष देशमुख ने विपक्षी विधायकों को महायुति में शामिल करने पर सवाल उठाते हुए कहा कि लोकसभा में संख्या बढ़ाना समझ में आता है, लेकिन विधानसभा और विधान परिषद में विपक्ष को कमजोर करने की जरूरत नहीं है।
एकनाथ शिंदे के ऑपरेशन टाइगर से संसद में एनडीए के सांसदों की संख्या बढ़ी है। बीजेपी सदन में दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा पार करना चाहती है, क्योंकि कई अहम विधेयक पास करने है। जिसमें एक परिसीमन बिल भी शामिल है। लोकसभा चुनाव 2029 से पहले परिसीमन बिल को सदन से पास करना बीजेपी का मुख्य एजेंडा है।
विपक्ष इसे सीधे-सीधे फडणवीस के खिलाफ साजिश बता रहा है। उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे ने तो साफ कह दिया, "यह ऑपरेशन टाइगर नहीं, ऑपरेशन देवेंद्र फडणवीस है। 2029 के चुनावों को देखते हुए फडणवीस के पर कतरने की पूरी योजना बनाई गई है।
देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे के रिश्ते पिछले कुछ सालों में कई उतार-चढ़ाव से गुजरे हैं।
शिंदे समर्थकों का दावा है कि 'लाड़की बहिन योजना' जैसी कल्याणकारी योजनाओं ने महायुति की चुनावी जीत में अहम भूमिका निभाई थी। ऐसे में माना जा रहा है कि शिंदे अब 2029 को ध्यान में रखते हुए अपनी राजनीतिक ताकत और संगठन दोनों को लगातार मजबूत करने में जुटे हैं।