
TMC Crisis Update: पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर मची उथल-पुथल ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सामने अब तक की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। पार्टी के 58 विधायकों की बगावत और निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी के विधानसभा में विपक्ष के नेता बनने के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या ममता बनर्जी अपनी पार्टी पर फिर से मजबूत पकड़ बना पाएंगी या TMC में टूट का खतरा और गहरा जाएगा।
करीब तीन दशक के राजनीतिक सफर में ममता बनर्जी ने कई मुश्किल दौर देखे हैं, लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह संकट पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा गंभीर है। ऐसे में नजर इस बात पर है कि पार्टी को टूटने से बचाने के लिए ममता बनर्जी के पास कौन-कौन से विकल्प मौजूद हैं।
बागी विधायकों ने साफ कर दिया है कि उनकी नाराजगी सीधे तौर पर ममता बनर्जी से नहीं, बल्कि पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी और उनके कामकाज के तरीके से है। लंबे समय से पार्टी के भीतर यह चर्चा रही है कि अभिषेक की बढ़ती भूमिका से कई पुराने और प्रभावशाली नेताओं में असंतोष पैदा हुआ।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ी दुविधा यही है कि वह अभिषेक बनर्जी को अलग करके बागियों को मनाने की स्थिति में नहीं हैं। ऐसा करने से यह संदेश जा सकता है कि उन्होंने दबाव के आगे झुकने का फैसला किया है, जबकि ममता की राजनीति हमेशा आक्रामक और संघर्षशील रही है।
बदलते राजनीतिक हालात में TMC अब कानूनी रास्ता अपनाने की तैयारी कर रही है। पार्टी का मानना है कि निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता बनाए जाने की प्रक्रिया को अदालत में चुनौती दी जा सकती है।
तृणमूल कांग्रेस के नेताओं का तर्क है कि जिसे पार्टी पहले ही निष्कासित कर चुकी हो, वह उसी पार्टी की ओर से विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष कैसे बन सकता है। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी इस मुद्दे को लेकर जल्द ही कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकती है।
विधायकों की बगावत के बाद अब TMC नेतृत्व की नजर अपने सांसदों पर भी है। पार्टी के भीतर आशंका है कि अगर असंतोष बढ़ा तो इसका असर लोकसभा और राज्यसभा सांसदों पर भी पड़ सकता है।
हाल के दिनों में कुछ नेताओं के रुख ने पार्टी की चिंता बढ़ाई है। यही वजह है कि ममता बनर्जी और शीर्ष नेतृत्व लगातार बैठकों के जरिए संगठन को एकजुट रखने की कोशिश कर रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मौजूदा हालात में किसी भी चुनावी हार से उनकी राजनीतिक स्थिति और कमजोर हो सकती है। इसलिए पार्टी जल्दबाजी में कोई जोखिम लेने के बजाय पहले संगठन को मजबूत करने पर ध्यान दे सकती है।
यही नहीं राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ममता बनर्जी ने अपने करियर में कई बार मुश्किल हालात से उबरकर वापसी की है। 2004 के लोकसभा चुनाव और 2006 के विधानसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद भी उन्होंने खुद को मजबूत किया था।
हालांकि इस बार हालात अलग हैं, क्योंकि चुनौती विपक्ष से ज्यादा अपनी ही पार्टी के भीतर से आई है। कई विश्लेषकों का मानना है कि यदि ममता संगठन को फिर से एकजुट करने, सांसदों और नेताओं को साथ रखने तथा कानूनी लड़ाई में बढ़त हासिल करने में सफल रहती हैं, तो वह इस संकट से बाहर निकल सकती हैं।
TMC के सामने फिलहाल संगठनात्मक एकता बनाए रखने, बागी नेताओं से निपटने, कानूनी लड़ाई लड़ने और जनता के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत रखने जैसी कई चुनौतियां हैं। ममता बनर्जी के लिए यह सिर्फ सत्ता का नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक भविष्य और पार्टी के अस्तित्व का भी सवाल बन चुका है।
यही वजह है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में हर किसी की नजर अब ममता बनर्जी के अगले कदम पर टिकी हुई है। आने वाले कुछ सप्ताह तय करेंगे कि TMC इस संकट से उबर पाती है या फिर पार्टी के भीतर की दरार और गहरी हो जाती है।