
उत्तर प्रदेश में कुछ ही महीने में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में घमासान हो गया है। सुप्रीमो मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को पहले पद और अब पार्टी से ही मुक्त कर दिया है। अपने सोशल मीडिया (एक्स) अकाउंट पर इसकी जानकारी देते हुए मायावती ने बताया कि इस समय बसपा यूपी में पांचवी बार सरकार बनाने के लिए जबरदस्त तैयारियों में लगी है। मायावती चार बार मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। आखिरी बार वह 2007 में अकेले दम पर भारी बहुमत लाकर मुख्यमंत्री बनी थीं। वह उनकी राजनीतिक लोकप्रियता और कॅरियर का चरम साबित हुआ। 2007 के बाद से राजनीतिक रूप से बसपा लगातार कमजोर होती गई और आज हाशिए पर है। इसके कई कारण हैं, पर उनमें से एक मायावती की कार्य शैली भी है। उनकी कार्यशैली समझने के लिए उस दौर की कुछ बातों को जान लेना सही रहेगा, जब मायावती ने चुनावी राजनीति में कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ना शुरू की थीं।
मायावती पहली बार 3 जून, 1995 को सीएम बनी थीं। भाजपा के समर्थन से। इससे पहले समाजवादी पार्टी (सपा) से उनका समझौता था। दोनों ने चुनाव पूर्व समझौता किया था। सपा की 109 और बसपा की 69 सीटें आईं थीं। बसपा के समर्थन से मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने थे। लेकिन, मायावती इसकी पूरी 'कीमत' वसूल रही थीं। सरकार बनने के दो महीने के भीतर ही मायावती ने लखनऊ की एक रैली में कहा था, 'मैं मुलायम पर अंकुश रखूंगी।' वह सीएम के सामने लगातार कोई न कोई मांग रखती रहतीं। दोनों के बीच रिश्ते लगातार तल्ख हो रहे थे। सीएम सचिवालय के गलियारे में उन दिनों यह चर्चा आम थी कि मुलायम ने मायावती का फोन तक उठाना बंद कर दिया था। उन्होंने यह जिम्मेदारी एक आईएएस अफसर को दे रखी थी। उस समय मीडिया में भी इस तरह की बात आई थी।
मायावती अक्सर अपनी पसंद के क्षेत्र में बसपा से हमदर्दी रखने वाले दलित अफसरों की तैनाती की मांग करती रहती थीं। आगे चल कर वह कई दूसरे मामलों में भी दखल देने लगीं। हालत यह हो गई थी कि मुलायम को शक होने लगा था कि मायावती उनके खिलाफ एससी आईएएस-आईपीएस की लॉबी बना रही हैं। बसपा के बड़े नेता इन अफसरों के साथ अक्सर बैठकें भी करते थे। मुलायम यह तक कहने लगे थे कि वे अफसर उनकी बात को गंभीरता से नहीं लेते हैं। यह मायावती के काम करने का अंदाज था, तो मुलायम ने भी इसकी काट के लिए चाल चली। उन्होंने बसपा में मायावती के खिलाफ विरोध को हवा देने की योजना बनाई।
लखनऊ में बसपा की एक मीटिंग हो रही थी। वहां मायावती के लिए तो ऊंची कुर्सी रखी गई थी, लेकिन बाकी नेताओं के लिए जमीन पर बैठने की व्यवस्था थी। वरिष्ठ मंत्रियों और विधायकों के लिए भी कुर्सी का इंतजाम नहीं था। इसे मुलायम ने एक मौके के रूप में इस्तेमाल किया। बीएसपी के कुछ नेताओं ने मायावती के काम करने के तौर-तरीके के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चलाने की योजना बनाई। तब कांशीराम बीच में आ गए थे। उन्होंने मुलायम को सरकार से समर्थन वापस ले लेने की धमकी देकर बैक फुट पर ला दिया था।
कांशीराम के दखल से आग की लपटें कम हो गईं थीं, पर बुझी नहीं थी। मायावती ने 24 मई, 1995 को मुलायम पर सीधा आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि मुलायम के भाई शिवपाल अफसरों और उद्योगपतियों से डील में बिचौलिये का काम कर रहे हैं। 27 मई को होने वाले उपचुनावों में सपा उम्मीदवारों के विरोध की भी घोषणा कर दी। उधर, मुलायम को यह भनक लग चुकी थी कि कांशीराम अपने एक राज्य सभा सांसद (जो कारोबारी भी थे) के जरिये बीजेपी से संपर्क में थे। कुछ एससी अफसर भी राज्य में बसपा और भाजपा के बीच डील कराने में लगे थे। 29 मई को मुलायम ने बजट सत्र पर चर्चा के लिए कैबिनेट की बैठक बुलाई। बसपा के मंत्रियों ने इसका बहिष्कार किया। मुलायम के लिए संकेत और साफ हो गया था।
1 जून को मायावती ने मुलायम सरकार से समर्थन वापसी और भाजपा के साथ सरकार बनाने का फैसला ले लिया था। कांशीराम दिल्ली में अस्पताल में थे। इधर लखनऊ में गेस्ट हाउस कांड हो गया। 3 जून, 1995 को बीजेपी के समर्थन से मायावती यूपी की पहली दलित मुख्यमंत्री बन गईं। हालांकि, उनका यह कार्यकाल महज 136 दिनों का रहा, लेकिन इस दौरान भी जो उनकी कार्य शैली रही, उसमें उनका 'आत्म केंद्रित' रवैया ही नजर आया।
मायावती के कार्यकाल के बारे में तब कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी ने कहा था, 'उनका दलित राज दलितों के कल्याण के लिए नहीं, बल्कि अगड़ी जातियों को परेशान करने के लिए है।' दलितों के मन में बीएसपी को दलितों की पार्टी के रूप में स्थापित नहीं कर पाना मायावती की सबसे बड़ी कमजोरी रही। न ही वह खुद को दलितों की नेता के रूप में स्थापित कर सकीं। उनका रहन-सहन भी इसमें बाधक रहा। हीरे के जेवर, महंगे ब्युटी पार्लर जाना, शाही अंदाज में जन्मदिन मनाना, शाही अंदाज में रहना, बंगले को किले में तब्दील कर देना, पहले से वक्त लिए बिना पार्टी के वरिष्ठ मंत्रियों तक से नहीं मिलना जैसी उनकी आदतें संगठन के विकास में बाधक रहीं।
मायावती ने सीएम बनते ही मुलायम पर वार किए। पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा था, 'मैं मुलायम की गुंडागर्दी खत्म कर दूंगी।' मुलायम पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के साथ अपनी हत्या की साजिश रचने तक का आरोप लगा दिया। सपा विधायकों के खिलाफ अनेक मुकदमे दर्ज कराए गए। बसपा विधायकों को बहुमत साबित करने (20 जून) तक एक तरह से अपने सरकारी बंगले पर कैद रखा गया। यहां तक कि कांशीराम के चहेते आईएएस अफसर माता प्रसाद को भी नहीं बख्शा गया। प्रसाद उनके चीफ सेक्रेटरी थे, लेकिन मायावती भरी मीटिंग में उनकी बेइज्जती कर बैठती थीं।
मायावती ने बीजेपी नेताओं को भी अपने तेवर दिखाए। कलराज मिश्रा ने कहा था, 'बताने के बावजूद मायावती को इस बात की जरा भी फिक्र नहीं है कि वह बीजेपी के समर्थन से सरकार में हैं।' मिश्रा ने सीएम से संवाद के लिए बीजेपी नेताओं की एक समन्वय समिति बनाई थी। मायावती ने साफ कह दिया कि उनके लिए आडवाणी, जोशी और वाजपेयी के अलावा कोई समन्वय समिति नहीं है।
30 साल से भी ज्यादा वक्त बीत गया है, लेकिन मायावती की कार्यशैली लगभग वही है। ऐसे में बदले राजनीतिक समीकरणों में पांचवी बार यूपी में बसपा सरकार बनाने की उनकी कोशिश कितनी सफल होगी, ये अगले साल पता चलेगा।