
पूर्व सीएम मायावती (Photo-IANS)
उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की उम्र जिस तेजी से बढ़ रही है, उनका राजनीतिक कद उससे ज्यादा तेजी से घट रहा है। 15 जनवरी, 2026 को मायावती के जीवन के 70 साल पूरे हो गए। इनमें करीब सात साल बतौर सीएम बीते।
मायावती जब पहली बार सीएम बनीं तो उनकी उम्र 40 के करीब थी। इसके बाद वह तीन बार और सीएम बनीं, लेकिन अपने दम पर एक बार ही बन सकीं। 2007 में। यह उनके राजीनतिक जीवन का शिखर था। उसके बाद से उनका चुनावी या राजनीतिक सफर ढलान की ओर ही बढ़ रहा है।
| नेता का नाम | राज्य / UT | शपथ के समय उम्र | वर्ष | दल (Party) |
| एम. ओ. एच. फारूक | पुडुचेरी (UT) | 29 वर्ष | 1967 | कांग्रेस |
| प्रफुल्ल कुमार महंत | असम | 33 वर्ष | 1985 | असम गण परिषद |
| भजन लाल | हरियाणा | 33 वर्ष | 1979 | जनता पार्टी |
| पेमा खांडू | अरुणाचल प्रदेश | 36 वर्ष | 2016 | भाजपा (बाद में) |
| नबाम तुकी | अरुणाचल प्रदेश | 37 वर्ष | 2011 | कांग्रेस |
| शरद पवार | महाराष्ट्र | 38 वर्ष | 1978 | कांग्रेस (U) |
| अखिलेश यादव | उत्तर प्रदेश | 38 वर्ष | 2012 | समाजवादी पार्टी |
| मोहन लाल सुखाड़िया | राजस्थान | 38 वर्ष | 1954 | कांग्रेस |
| हेमंत सोरेन | झारखंड | 38 वर्ष | 2013 | JMM |
| मायावती | उत्तर प्रदेश | 39 वर्ष | 1995 | BSP |
| अब्दुल गफूर | बिहार | 35 वर्ष | 1973 | कांग्रेस |
उत्तर प्रदेश विधानसभा में मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी (बसपा) 206 से एक पर पहुंच गई है। अब 2027 में चुनाव है। फिर 2032 में। तब मायावती की उम्र 80 के करीब होगी। उस समय की संभावनाओं पर बात करना अभी सही नहीं होगा। लेकिन, क्या अगले साल के चुनाव में मायावती के कमबैक की संभावना है? समझते हैं:
| विधानसभा चुनाव वर्ष | कुल सीटें | वोट शेयर (%) | मुख्य कारण |
| 2007 | 206 | 30.43% | ब्राह्मण-दलित गठबंधन की सफलता। |
| 2012 | 80 | 25.95% | सत्ता विरोधी लहर और भ्रष्टाचार के आरोप। |
| 2017 | 19 | 22.23% | मोदी लहर और गैर-जाटव वोटों का बिखराव। |
| 2022 | 01 | 12.88% | द्विध्रुवीय चुनाव (BJP vs SP) में अप्रासंगिकता। |
| 2024 (LS) | 00 | 9.39% | गठबंधन न करना और कैडर की निष्क्रियता। |
दलित राजनीति: मायावती आईएएस बनना चाहती थीं, उन्हें नेता बना दिया गया। आईएएस बन कर वह पूरे समाज की सेवा करना चाहती थीं, लेकिन नेता बनीं तो दलित समाज को राजनीति का मुख्य आधार बनाया। इसलिए उन्हें सत्ता के लिए लगातार बैसाखी की जरूरत पड़ी। इसकी खामी समझ कर जब उन्होंने अगड़ी जाति को भी जोड़ा तो पहली बार तो लोगों ने उन्हें आजमाया, लेकिन दोबारा मौका देने लायक नहीं समझा। मायावती के लिए ‘माया मिली, न राम’ वाली स्थिति हो गई और यह उनके राजनीतिक सफर के लिए घातक साबित हुआ।
| मायावती बतौर सीएम | कार्यकाल की अवधि | दिन | समर्थन/गठबंधन |
| पहली बार | 3 जून 1995 – 18 अक्टूबर 1995 | 137 दिन | भाजपा के बाहरी समर्थन से |
| दूसरी बार | 21 मार्च 1997 – 21 सितंबर 1997 | 184 दिन | भाजपा के साथ (6-6 महीने का रोटेशन फॉर्मूला) |
| तीसरी बार | 3 मई 2002 – 29 अगस्त 2003 | 1 वर्ष, 118 दिन | भाजपा और अन्य दलों के समर्थन से |
| चौथी बार | 13 मई 2007 – 15 मार्च 2012 | 4 वर्ष, 307 दिन | बसपा का पूर्ण बहुमत (सोशल इंजीनियरिंग) |
नैरेटिव का फर्क: मायावती ने अपनी राजनीति का आधार दलित को बनाया, लेकिन अपनी जीवनशैली उनसे एकदम अलग दिखाई। जन्मदिन पर आलीशान पार्टियां करना, मंच पर किसी को जगह नहीं देना, पार्टी के बजाय अपने नाम पर चंदा मांगना आदि काम दलितों की वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाने वाली छवि बनाते रहे। इसका खामियाजा धीर-धीरे देखने को मिला।
व्यक्ति पर फोकस, संगठन पर नहीं: मायावती ने व्यक्ति पर फोकस किया, संगठन पर नहीं। बसपा को उन्होंने एक व्यक्ति (खुद) पर केन्द्रित कर चलाया। पार्टी का पूरा नियंत्रण अपने हाथों में रखा। हर निर्णय खुद लिया। सबसे करीबी पदाधिकारी को भी फैसले लेने का अधिकार नहीं दिया। उन्हें ऐसा लगा जैसे पार्टी प्रमुख का उन पर पूरा भरोसा नहीं है। इस तरह की कार्य शैली से संगठन के विस्तार में बाधा आई और वोटर्स को जोड़े रखने की कवायद कमजोर पड़ी।
उत्तराधिकार में परिवारवाद: मायावती ने खुद पर केन्द्रित रख कर बसपा को चलाया और जब किसी दूसरे व्यक्ति की जरूरत महसूस हुई तो परिवार पर ही भरोसा किया। उन्होंने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी का कामकाज सौंपा और अपना ‘उत्तराधिकारी’ बनाया। हालत यह रही कि उन्हें ‘अपरिपक्व’ पाने पर हटाया और कुछ ही समय बाद दोबारा बड़ा पद देकर वापस भी बुला लिया।
आकाश का अनुभव: आकाश आनंद का राजनीति में बहुत ज्यादा अनुभव नहीं है। वह लंदन से पढ़ कर लौटे हैं और राजनीति में नए हैं। उनकी लोगों में कोई साख नहीं है। मायावती को कांशी राम ने लंबे समय तक राजनीति के लिए तैयार किया, लेकिन आकाश को वैसा कोई गुरू नहीं मिला है। इसलिए 2027 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर उनके सामने बड़ी चुनौती है। कांशी राम और मायावती की तरह वोटर्स के बीच इनकी अपील भी नहीं है।
चंद्रशेखर फैक्टर: कांशी राम के चुनावी सीन में आने से पहले तक दलित मुख्य रूप से कांग्रेस के प्रति समर्पित वोटर्स माने जाते थे। कांशी राम ने उनमें सेंध लगाई। तब से अब तक दलित वोट बैंक में कई पार्टियां सेंधमारी कर चुकी हैं। अब एक नेता दलितों के बीच से भी उभरा है। चंद्रशेखर रावण। बीएसपी को चंद्रशेखर फैक्टर से निपटने के लिए भी ठोस रणनीति बनानी होगी।
कोई विरासत या चेहरा नहीं: बसपा के पास ऐसी कोई विरासत नहीं है, जिसे वह भुना सके। मतदाताओं के बीच पार्टी की पहचान मुख्य रूप से दो ही लोगों के नाम से है- कांशी राम और मायावती। ये दोनों नेता भी अपनी ऐसी छवि नहीं बना सके कि पार्टी विरासत के तौर पर इस्तेमाल कर सके। कांशी राम की मृत्यु 2006 में हुई। उस साल जन्मे लोग 2027 के चुनाव में पहली बार वोट करेंगे। उन्हें शायद ही कांशी राम याद हों। मायावती के बारे में भी उन्हें बताना-समझाना पड़ सकता है, क्योंकि जब वे होश संभालने लायक हुए होंगे तब से मायावती का राजनीतिक सफर उतार की ओर बढ़ना शुरू हो गया।
| चुनाव वर्ष | कुल सीटें (UP) | वोट शेयर (%) | परिणाम |
| 1993 | 67 | 11.12% | सपा के साथ गठबंधन सरकार |
| 2002 | 98 | 23.06% | भाजपा के समर्थन से सरकार |
| 2007 | 206 | 30.43% | पूर्ण बहुमत की सरकार |
| 2012 | 80 | 25.95% | सत्ता से बाहर |
| 2017 | 19 | 22.23% | भारी गिरावट |
| 2022 | 01 | 12.88% | ऐतिहासिक न्यूनतम |
पैसा-संसाधन: आजकल चुनाव में बड़े पैमाने पर पैसा, कार्यकर्ता और अन्य तरह के संसाधनों की जरूरत होती है। बसपा इस मामले में अपने प्रतिद्वंदियों से काफी पीछे है।
तो क्या 2027 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के लिए संभावनाएं बनती हैं? सीट भले एक से बढ़ जाए, लेकिन अभी की स्थिति के अनुसार कमबैक आसान नहीं लगता। मायावती के पारंपरिक वोटर्स अब बंट चुके हैं। प्रतिद्वंदियों की तुलना में कार्यकर्ता कम हैं और जो हैं भी वे शिथिल पड़ चुके हैं। सोशल मीडिया के इस्तेमाल में भी पार्टी बहुत पीछे है। गठबंधन के लिए भी कोई विकल्प बचा लगता नहीं है। कमबैक के लिए मायावती को नए सिरे से बहुत कुछ करना होगा, और वक्त कम है।
Updated on:
15 Jan 2026 06:02 pm
Published on:
15 Jan 2026 06:00 am

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