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2027 में कमबैक कर पाएगी मायावती की बसपा? जानिए क्यों 206 से एक पर पहुंची पार्टी

बसपा भले ही चुनावी सीन से बाहर होती जा रही हो, लेकिन मायावती ने 70 साल की उम्र में भी पार्टी पर पकड़ ढीली नहीं की है।

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लखनऊ

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Vijay Kumar Jha

Jan 15, 2026

पूर्व सीएम मायावती (Photo-IANS)

उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं और इसमें बहुजन समाज पार्टी (बसपा) कैसा प्रदर्शन करती है, यह देखने वाली बात होगी। इस चुनाव से बसपा के वजूद का सवाल जुड़ा है। पार्टी अभी मरणासन्न है। इस चुनाव में अगर वह उठ खड़ी नहीं हुई, तो उसके लिए कोई उम्मीद बाकी नहीं रह जाएगी।

कांशी राम की बनाई बसपा की कमान मायावती के हाथों में है। वह 70 पार की हो गई हैं। पार्टी भले ही कमजोर हुई हो, लेकिन इस उम्र में भी मायावती ने बसपा पर अपनी पकड़ कमजोर नहीं होने दी है।

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की उम्र जिस तेजी से बढ़ रही है, उनका राजनीतिक कद उससे ज्यादा तेजी से घट रहा है। 15 जनवरी, 2026 को मायावती के जीवन के 70 साल पूरे हो गए। इनमें करीब सात साल बतौर सीएम बीते।

मायावती जब पहली बार सीएम बनीं तो उनकी उम्र 40 के करीब थी। इसके बाद वह तीन बार और सीएम बनीं, लेकिन अपने दम पर एक बार ही बन सकीं। 2007 में। यह उनके राजीनतिक जीवन का शिखर था। उसके बाद से उनका चुनावी या राजनीतिक सफर ढलान की ओर ही बढ़ रहा है।

30-40 की उम्र के करीब सीएम बनने वाले कुछ नेता

नेता का नामराज्य / UTशपथ के समय उम्रवर्षदल (Party)
एम. ओ. एच. फारूकपुडुचेरी (UT)29 वर्ष1967कांग्रेस
प्रफुल्ल कुमार महंतअसम33 वर्ष1985असम गण परिषद
भजन लालहरियाणा33 वर्ष1979जनता पार्टी
पेमा खांडूअरुणाचल प्रदेश36 वर्ष2016भाजपा (बाद में)
नबाम तुकीअरुणाचल प्रदेश37 वर्ष2011कांग्रेस
शरद पवारमहाराष्ट्र38 वर्ष1978कांग्रेस (U)
अखिलेश यादवउत्तर प्रदेश38 वर्ष2012समाजवादी पार्टी
मोहन लाल सुखाड़ियाराजस्थान38 वर्ष1954कांग्रेस
हेमंत सोरेनझारखंड38 वर्ष2013JMM
मायावतीउत्तर प्रदेश39 वर्ष1995BSP
अब्दुल गफूरबिहार35 वर्ष1973कांग्रेस

उत्तर प्रदेश विधानसभा में मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी (बसपा) 206 से एक पर पहुंच गई है। अब 2027 में चुनाव है। फिर 2032 में। तब मायावती की उम्र 80 के करीब होगी। उस समय की संभावनाओं पर बात करना अभी सही नहीं होगा। लेकिन, क्या अगले साल के चुनाव में मायावती के कमबैक की संभावना है? समझते हैं:

विधानसभा चुनाव वर्षकुल सीटेंवोट शेयर (%)मुख्य कारण
200720630.43%ब्राह्मण-दलित गठबंधन की सफलता।
20128025.95%सत्ता विरोधी लहर और भ्रष्टाचार के आरोप।
20171922.23%मोदी लहर और गैर-जाटव वोटों का बिखराव।
20220112.88%द्विध्रुवीय चुनाव (BJP vs SP) में अप्रासंगिकता।
2024 (LS)009.39%गठबंधन न करना और कैडर की निष्क्रियता।

आखिर क्यों मायावती की बसपा लगातार ढलान पर है?

दलित राजनीति: मायावती आईएएस बनना चाहती थीं, उन्हें नेता बना दिया गया। आईएएस बन कर वह पूरे समाज की सेवा करना चाहती थीं, लेकिन नेता बनीं तो दलित समाज को राजनीति का मुख्य आधार बनाया। इसलिए उन्हें सत्ता के लिए लगातार बैसाखी की जरूरत पड़ी। इसकी खामी समझ कर जब उन्होंने अगड़ी जाति को भी जोड़ा तो पहली बार तो लोगों ने उन्हें आजमाया, लेकिन दोबारा मौका देने लायक नहीं समझा। मायावती के लिए ‘माया मिली, न राम’ वाली स्थिति हो गई और यह उनके राजनीतिक सफर के लिए घातक साबित हुआ।

मायावती बतौर सीएम कार्यकाल की अवधिदिनसमर्थन/गठबंधन
पहली बार3 जून 1995 – 18 अक्टूबर 1995137 दिनभाजपा के बाहरी समर्थन से
दूसरी बार21 मार्च 1997 – 21 सितंबर 1997184 दिनभाजपा के साथ (6-6 महीने का रोटेशन फॉर्मूला)
तीसरी बार3 मई 2002 – 29 अगस्त 20031 वर्ष, 118 दिनभाजपा और अन्य दलों के समर्थन से
चौथी बार13 मई 2007 – 15 मार्च 20124 वर्ष, 307 दिनबसपा का पूर्ण बहुमत (सोशल इंजीनियरिंग)

नैरेटिव का फर्क: मायावती ने अपनी राजनीति का आधार दलित को बनाया, लेकिन अपनी जीवनशैली उनसे एकदम अलग दिखाई। जन्मदिन पर आलीशान पार्टियां करना, मंच पर किसी को जगह नहीं देना, पार्टी के बजाय अपने नाम पर चंदा मांगना आदि काम दलितों की वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाने वाली छवि बनाते रहे। इसका खामियाजा धीर-धीरे देखने को मिला।

व्यक्ति पर फोकस, संगठन पर नहीं: मायावती ने व्यक्ति पर फोकस किया, संगठन पर नहीं। बसपा को उन्होंने एक व्यक्ति (खुद) पर केन्द्रित कर चलाया। पार्टी का पूरा नियंत्रण अपने हाथों में रखा। हर निर्णय खुद लिया। सबसे करीबी पदाधिकारी को भी फैसले लेने का अधिकार नहीं दिया। उन्हें ऐसा लगा जैसे पार्टी प्रमुख का उन पर पूरा भरोसा नहीं है। इस तरह की कार्य शैली से संगठन के विस्तार में बाधा आई और वोटर्स को जोड़े रखने की कवायद कमजोर पड़ी।

उत्तराधिकार में परिवारवाद: मायावती ने खुद पर केन्द्रित रख कर बसपा को चलाया और जब किसी दूसरे व्यक्ति की जरूरत महसूस हुई तो परिवार पर ही भरोसा किया। उन्होंने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी का कामकाज सौंपा और अपना ‘उत्तराधिकारी’ बनाया। हालत यह रही कि उन्हें ‘अपरिपक्व’ पाने पर हटाया और कुछ ही समय बाद दोबारा बड़ा पद देकर वापस भी बुला लिया।

आकाश का अनुभव: आकाश आनंद का राजनीति में बहुत ज्यादा अनुभव नहीं है। वह लंदन से पढ़ कर लौटे हैं और राजनीति में नए हैं। उनकी लोगों में कोई साख नहीं है। मायावती को कांशी राम ने लंबे समय तक राजनीति के लिए तैयार किया, लेकिन आकाश को वैसा कोई गुरू नहीं मिला है। इसलिए 2027 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर उनके सामने बड़ी चुनौती है। कांशी राम और मायावती की तरह वोटर्स के बीच इनकी अपील भी नहीं है।

चंद्रशेखर फैक्टर: कांशी राम के चुनावी सीन में आने से पहले तक दलित मुख्य रूप से कांग्रेस के प्रति समर्पित वोटर्स माने जाते थे। कांशी राम ने उनमें सेंध लगाई। तब से अब तक दलित वोट बैंक में कई पार्टियां सेंधमारी कर चुकी हैं। अब एक नेता दलितों के बीच से भी उभरा है। चंद्रशेखर रावण। बीएसपी को चंद्रशेखर फैक्टर से निपटने के लिए भी ठोस रणनीति बनानी होगी।

कोई विरासत या चेहरा नहीं: बसपा के पास ऐसी कोई विरासत नहीं है, जिसे वह भुना सके। मतदाताओं के बीच पार्टी की पहचान मुख्य रूप से दो ही लोगों के नाम से है- कांशी राम और मायावती। ये दोनों नेता भी अपनी ऐसी छवि नहीं बना सके कि पार्टी विरासत के तौर पर इस्तेमाल कर सके।

कांशी राम की मृत्यु 2006 में हुई। उस साल जन्मे लोग 2027 के चुनाव में पहली बार वोट करेंगे। उन्हें शायद ही कांशी राम याद हों। मायावती के बारे में भी उन्हें बताना-समझाना पड़ सकता है, क्योंकि जब वे होश संभालने लायक हुए होंगे तब से मायावती का राजनीतिक सफर उतार की ओर बढ़ना शुरू हो गया।

चुनाव वर्षकुल सीटें (UP)वोट शेयर (%)परिणाम
19936711.12%सपा के साथ गठबंधन सरकार
20029823.06%भाजपा के समर्थन से सरकार
200720630.43%पूर्ण बहुमत की सरकार
20128025.95%सत्ता से बाहर
20171922.23%भारी गिरावट
20220112.88%ऐतिहासिक न्यूनतम

फिर भी कांशी राम की विरासत को भुनाने की कोशिश चल रही है। लेकिन, इस कोशिश में बसपा के अलावा दूसरी पार्टियां भी लग गई हैं। कांग्रेस इसमें सबसे आगे रही। शायद इसलिए क्योंकि इस बार की कांशी राम की जयंती (15 मार्च, 2026) विधानसभा चुनाव से पहले की आखिरी जयंती है। लेकिन, सवाल है कि कांशी राम के नाम पर क्या अब दलितों को वापस जोड़ा जा सकता है?

पैसा-संसाधन: आजकल चुनाव में बड़े पैमाने पर पैसा, कार्यकर्ता और अन्य तरह के संसाधनों की जरूरत होती है। बसपा इस मामले में अपने प्रतिद्वंदियों से काफी पीछे है।

बसपा 1984 में बनी थी। 1980 और 1990 के दशक में ये पार्टियां भी बनी थीं:

पार्टी कब बनी बनाने वाले / प्रमुख नेताबनने का आधार/संदर्भ
भारतीय जनता पार्टी (BJP)1980अटल बिहारी वाजपेयी, एल.के. आडवाणीजनता पार्टी से अलग होकर हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के विचार पर गठन।
तेलुगु देशम पार्टी (TDP)1982एन.टी. रामा राव (NTR)आंध्र प्रदेश में "तेलुगु गौरव" के मुद्दे पर क्षेत्रीय पहचान की शुरुआत।
बहुजन समाज पार्टी (BSP)1984मान्यवर कांशीरामदलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों (बहुजन) के राजनीतिक सशक्तीकरण के लिए।
समाजवादी पार्टी (SP)1992मुलायम सिंह यादवजनता दल के टूटने के बाद सामाजिक न्याय और लोहियावादी समाजवाद पर आधारित।
समता पार्टी 1994नीतीश कुमार, जॉर्ज फर्नांडिस जनता दल में एक और टूट का नतीजा। बाद में जदयू में इसका विलय हो गया, जिसके अध्यक्ष अभी नीतीश कुमार हैं।
राष्ट्रीय जनता दल (RJD)1997लालू प्रसाद यादवजनता दल से अलग होकर बिहार में "सामाजिक न्याय" और धर्मनिरपेक्षता का मोर्चा।
बीजू जनता दल (BJD)1997नवीन पटनायकबीजू पटनायक की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए ओडिशा में गठित।
तृणमूल कांग्रेस (TMC)1998ममता बनर्जीकांग्रेस से अलग होकर पश्चिम बंगाल में वामपंथ के विरोध में एक क्षेत्रीय शक्ति।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP)1999शरद पवार, पी.ए. संगमाकांग्रेस नेतृत्व (सोनिया गांधी के विदेशी मूल) के मुद्दे पर अलग होकर महाराष्ट्र में प्रभाव बनाया।
जम्मू और कश्मीर नेशनल पैंथर्स पार्टी (JKNPP)1982भीम सिंहजम्मू और कश्मीर के लोगों के अधिकारों पर केंद्रित।
इंडियन नेशनल लोक दल (INLD)1996चौधरी देवी लाल1996 में देवी लाल ने हरियाणा लोक दल नाम से इसकी स्थापना की थी। 1998 में इसका मौजूदा नाम रखा गया।

इनमें से कई पार्टियां आज के समय में अच्छा कर रही हैं। ममता बनर्जी लगातार दो बार से पश्चिम बंगाल में सत्ता में हैं। नवीन पटनायक लंबे समय तक ओड़िशा की सत्ता में रहने के बाद अब विपक्ष में हैं। शरद पवार ने भी पार्टी में टूट से पहले तक बहुत अच्छा प्रदर्शन किया।

पार्टी सरकार में स्थिति (States)लोकसभा (2024) चुनाव में वोट %अंतिम विधानसभा चुनाव प्रदर्शन (प्रमुख राज्य)वर्तमान स्थिति
भाजपा (BJP)19 राज्यों में (सत्ता/गठबंधन)36.56%ओडिशा: 78 सीटें (जीत), हरियाणा: 48 सीटें (जीत), बिहार: 89 सीटें (गठबंधन की जीत)केंद्र में सत्तारूढ़; राज्यों में सबसे मजबूत पकड़।
सपा (SP)0 (UP में मुख्य विपक्ष)4.58%UP (2022): 111 सीटें (32.06% वोट शेयर)लोकसभा 2024 में 37 सीटों के साथ तीसरी बड़ी पार्टी।
TMC1 (पश्चिम बंगाल)4.37%बंगाल (2021): 215 सीटें (47.9% वोट शेयर)बंगाल में मजबूत पकड़; 2026 चुनाव की तैयारियों में व्यस्त।
TDP1 (आंध्र प्रदेश)1.98%आंध्र (2024): 135 सीटें (जीत, 45.6% वोट)आंध्र प्रदेश में भारी बहुमत; केंद्र में महत्वपूर्ण सहयोगी।
RJD0 (बिहार में विपक्ष)1.57%बिहार (2025):* 25 सीटें (विपक्ष में)बिहार विधानसभा में बड़ी पार्टी होने के बावजूद सत्ता से बाहर।
BJD0 (ओडिशा में विपक्ष)1.46%ओडिशा (2024): 51 सीटें (सत्ता से बाहर)24 साल बाद सत्ता गँवाई; नवीन पटनायक विपक्ष के नेता।
NCP (SP)0 (महाराष्ट्र विपक्ष)0.92%महाराष्ट्र (2024 चुनाव) से पहले पार्टी टूट गई थी। शरद पवार खेमे को झटका लगा। इससे पहले के चुनाव में महाविकास अघाड़ी में कांग्रेस के साथ अच्छा प्रदर्शन किया था।अब शरद पवार गुट पर अजीत पवार खेमा भारी है और महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ है।
बसपा (BSP)02.04%UP (2022): 1 सीट (12.8% वोट शेयर)राष्ट्रीय स्तर पर वोट शेयर और सीटों में भारी गिरावट।

तो क्या 2027 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के लिए संभावनाएं बनती हैं? सीट भले एक से बढ़ जाए, लेकिन अभी की स्थिति के अनुसार कमबैक आसान नहीं लगता। मायावती के पारंपरिक वोटर्स अब बंट चुके हैं। प्रतिद्वंदियों की तुलना में कार्यकर्ता कम हैं और जो हैं भी वे शिथिल पड़ चुके हैं। सोशल मीडिया के इस्तेमाल में भी पार्टी बहुत पीछे है। गठबंधन के लिए भी कोई विकल्प बचा लगता नहीं है। कमबैक के लिए मायावती को नए सिरे से बहुत कुछ करना होगा, और वक्त कम है।