Money laundering cases: मूल केस कमजोर पड़ने पर भी मनी लॉन्ड्रिंग जांच नहीं रुकेगी। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू ने कहा, ED को हर मामले में गहराई से जांच जारी रखनी चाहिए।
Financial Crime Policy: मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में अक्सर देखा गया है कि जैसे ही मूल केस कमजोर पड़ता है, पूरी जांच नहीं होती है। लेकिन अब सरकार के शीर्ष वकील ने इस पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू (Additional Solicitor General S.V. Raju) ने साफ कहा है कि अगर मुख्य आरोप प्रेडिकेट ऑफेंस (Predicate Offense) में आरोपी बरी हो जाते हैं या केस खत्म हो जाता है, तब भी ED को अपनी जांच बंद नहीं करनी चाहिए। दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि कानून की मौजूदा स्थिति भले ही मनी लॉन्ड्रिंग (Money Laundering) को मूल अपराध से जोड़ती हो, लेकिन हर मामले में इसे सीधे खत्म मान लेना सही तरीका नहीं है।
राजू ने इस मुद्दे को आसान शब्दों में समझाते हुए कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग एक अलग अपराध माना जाता है, लेकिन यह प्रोसीड्स ऑफ क्राइम (Proceeds of Crime) यानी अपराध से कमाई गई रकम पर निर्भर करता है। अगर अदालत कह देती है कि मूल अपराध ही नहीं हुआ, तो फिर मनी लॉन्ड्रिंग का केस भी कमजोर पड़ जाता है। उदाहरण के तौर पर, अगर धोखाधड़ी का केस साबित नहीं होता, तो उससे जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप भी टिक नहीं पाते। यही वजह है कि कई मामलों में ED की कार्रवाई अदालत में टिक नहीं पाती।
यह बहस ऐसे समय सामने आई है जब दिल्ली एक्साइज नीति मामले में कई कानूनी उलझनें हैं। इस केस में कई बड़े नाम आरोपी रहे हैं और अलग-अलग अदालतों में समानांतर सुनवाई हो रही है। हाल ही में ट्रायल कोर्ट ने कुछ प्रमुख आरोपियों को सबूतों की कमी के आधार पर राहत दी थी, लेकिन हाई कोर्ट ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए इसे पहली नजर में गलत बताया। अब इस मामले की अगली सुनवाई तय है, जिस पर सभी की नजरें टिकी हैं।
एक और बड़ी चुनौती उन मामलों में आती है जहां पक्षकार आपस में समझौता कर लेते हैं। जैसे किसी बिल्डर और खरीदार के बीच समझौते के बाद केस वापस ले लिया जाए, तो इससे मनी लॉन्ड्रिंग का मामला भी कमजोर पड़ सकता है। राजू ने माना कि यह ED के लिए एक बड़ी बाधा है, लेकिन इससे निपटने के लिए एजेंसी को और सतर्क रहने की जरूरत है।
राजू ने यह भी साफ किया कि हर तरह की राहत एक जैसी नहीं होती। अगर कोई आरोपी सबूतों की कमी के कारण बरी होता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि अपराध हुआ ही नहीं। ऐसे मामलों में ED के पास जांच जारी रखने का आधार हो सकता है। वहीं, अगर अदालत शुरुआती चरण में ही आरोप हटा देती है, तो भी एजेंसी को यह देखना चाहिए कि जांच में कहीं कमी तो नहीं रह गई। जरूरत पड़े तो दोबारा जांच की मांग की जा सकती है।
राजू ने सुझाव दिया कि ED को ऐसे मामलों में नई जांच शुरू करने, पुराने फैसलों को चुनौती देने और जरूरत पड़ने पर दूसरी एजेंसियों की भूमिका पर सवाल उठाने से पीछे नहीं हटना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर कोई मामला सिर्फ तकनीकी वजहों से बंद हुआ है, जैसे समय सीमा खत्म होना या मंजूरी न मिलना, तो इसका मतलब यह नहीं कि अपराध नहीं हुआ। ऐसे मामलों में भी कानूनी विकल्प खुले रहते हैं।