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चीन को फायदा पहुंचा रहे हैं पीएम मोदी…विपक्ष ने प्रधानमंत्री पर लगाया आरोप; पूछे ये सवाल

Sovereignty:भारत-चीन सीमा पर तनाव के बीच प्रधानमंत्री मोदी पर चीन के प्रति नरम रुख अपनाने के आरोप लग रहे हैं। रिकॉर्ड व्यापार घाटे और सीमाई निर्माण ने इस राजनीतिक जंग को और तेज कर दिया है।

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Jan 15, 2026
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग। ( फोटो: X Handle Vimal Patil.)

National Security: भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC Tensions 2026) पर जारी तनाव अब केवल सैन्य संघर्ष तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह देश की आंतरिक राजनीति (India China Border Dispute) का एक बड़ा मुद्दा बन गया है। हाल के बरसों में चीन (Trade Deficit with China) की लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक बढ़ती आक्रामकता ने केंद्र सरकार की विदेश नीति पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस अक्सर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर चीन के प्रति 'नरम रुख' (PM Modi China Policy) अपनाने का आरोप लगाती रही है, जिससे देश में एक नई राजनीतिक बहस छिड़ गई है।

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ड्रैगन की 'आंखें दिखाने' वाली नीति

चीन पिछले कुछ दशकों से 'सलामी स्लाइसिंग' (धीरे-धीरे जमीन कब्जाने) की नीति पर काम कर रहा है। गलवान घाटी की हिंसक झड़प के बाद से भारत और चीन के रिश्ते अपने सबसे निचले स्तर पर हैं। इसके बावजूद, व्यापारिक आंकड़ों पर नज़र डालें तो चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा कम होने के बजाय बढ़ता जा रहा है। यही वह बिंदु है जहां विपक्ष सरकार को घेरता है कि एक तरफ सीमा पर जवान शहीद हो रहे हैं और दूसरी तरफ आर्थिक मोर्चे पर चीन को लाभ मिल रहा है।

क्या है 'चीन से मोहब्बत' वाले आरोपों की हकीकत?

इस मामले को लेकर विपक्ष प्रधानमंत्री पर निशाने साध रहा है। राजनीतिक गलियारों में "पीएम मोदी को चीन से मोहब्बत है" जैसे तीखे जुमले अक्सर उछाले जाते हैं। इन आरोपों के पीछे विपक्ष के तीन मुख्य तर्क होते हैं:

लाल आंखें बनाम खामोशी: विपक्ष का कहना है कि 2014 से पहले 'लाल आंख' दिखाने की बात करने वाले पीएम अब चीन का नाम लेने से कतराते हैं।

व्यापारिक निर्भरता: चीनी ऐप्स पर बैन लगाने के बावजूद, भारी मशीनरी और कच्चे माल के लिए भारत की अभी भी चीन पर निर्भरता बनी हुई है।

बफर जोन का निर्माण: आरोप हैं कि पीछे हटने की प्रक्रिया (Disengagement) के दौरान भारत ने अपनी ही जमीन पर 'बफर जोन' बना दिए हैं, जहाँ पहले भारतीय सेना गश्त करती थी।

सरकार का जवाब: 'आत्मनिर्भर भारत' और सैन्य मजबूती

वहीं, सरकार इन आरोपों को सिरे से खारिज करती है। केंद्र का तर्क है कि सीमा पर बुनियादी ढांचे (Infrastructure) का निर्माण जिस तेजी से अब हो रहा है, वह पहले कभी नहीं हुआ।

बॉर्डर रोड्स: बीआरओ (BRO) ने लद्दाख और अरुणाचल में सामरिक सड़कों और सुरंगों का जाल बिछा दिया है।

रणनीतिक घेराबंदी: भारत अब अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ 'क्वाड' (QUAD) जैसे समूहों के जरिये चीन को वैश्विक स्तर पर घेर रहा है।

इलेक्ट्रॉनिक्स और मैन्युफैक्चरिंग: 'PLI स्कीम' के माध्यम से चीन पर निर्भरता कम करने की कोशिशें जारी हैं।

क्या वाकई नीति बदलने की जरूरत है ?

विशेषज्ञों का मानना है कि चीन एक ऐसी शक्ति है जिसे केवल सैन्य बल से नहीं, बल्कि आर्थिक और कूटनीतिक मजबूती से ही जवाब दिया जा सकता है। भारत की मौजूदा चुनौती यह है कि वह अपनी संप्रभुता से समझौता किए बिना आर्थिक विकास की गति कैसे बनाए रखे। क्या ड्रैगन को उसकी भाषा में जवाब देने का समय आ गया है या फिर पर्दे के पीछे चल रही कूटनीति ही सही रास्ता है? यह सवाल आज हर भारतीय के मन में है।

भारत के कई स्टार्टअप और टेक कंपनियाँ चीनी निवेश पर टिकी हुईं

बहरहाल, भारत के कई स्टार्टअप और टेक कंपनियाँ चीनी निवेश पर टिकी हुई हैं। चीन से पूरी तरह संबंध तोड़ना भारतीय बाजार के लिए एक 'डबल-एज्ड स्वॉर्ड' (दोधारी तलवार) जैसा है। व्यापार और राष्ट्रवाद के बीच का यह संतुलन ही असली चुनौती है।

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