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खजाना बढ़ा, ताकत नहीं: समझिए कैसे डॉलर तोड़ रहा नरेंद्र मोदी सरकार की कमर

Rupee Vs Dollar: कोविड के बाद पश्चिम एशिया संकट भारतीय अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ रहा है। इस संकट ने सीधे-सीधे देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर असर डाला है और पेट्रोल-डीजल की महंगाई करा कर हर व्यक्ति की जेब कटवाई है। 12 साल के शासन में मोदी सरकार के लिए गंभीर चुनौती है।

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मजबूत होता डॉलर हर मोर्चे पर नरेंद्र मोदी सरकार के लिए परेशानी खड़ी कर रहा है। (फोटो डिज़ाइन: पत्रिका.कॉम)।

26 मई, 2026 को नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने 12 साल हो गए हैं। इन वर्षों में उनकी पार्टी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सत्ता का जोरदार विस्तार हुआ है। लेकिन, देश की अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर, कोरोना के दौर को छोड़ दें तो संभवतः पहली बार वह सबसे गंभीर चुनौती का सामना कर रहे हैं।

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डॉलर ने तोड़ रखी है नरेंद्र मोदी सरकार की कमर

अर्थव्यवस्था पर छाए मौजूदा संकट की जड़ में डॉलर के मुक़ाबले लगातार कमजोर होता रुपया है। हमें निर्यात (दूसरे देशों को सामान बेचना) से जितने डॉलर मिलते हैं, उससे कहीं ज्यादा आयात (दूसरे देशों से सामान मंगाना) पर खर्च हो जाते हैं। पश्चिम एशिया संकट ने यह असंतुलन और गहरा कर दिया है। यही वजह रही कि प्रधानमंत्री को लोगों से एक साल सोना नहीं खरीदने, विदेश जाने से बचने और पेट्रोल-डीजल व खाद्य तेल कम इस्तेमाल करने की अपील करनी पड़ी।

पीएम मोदी ने कहा कि विदेशी मुद्रा बचाने के लिए हमारी देशभक्ति चुनौती दे रही है। हमें यह चुनौती स्वीकार करनी चाहिए और विदेशी मुद्रा बचाने के लिए जो जो कुछ करना पड़े, करना चाहिए। उन्होंने छुट्टियां मनाने के लिए विदेश नहीं जाने, सोना नहीं खरीदने और खाने में तेल कम इस्तेमाल करने की अपील की और कहा कि यह देश के प्रति लोगों की सेवा होगी।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने भी तीन एफ (Fuel, Fertiliser और Forex - ईंधन, खाद और विदेशी मुद्रा) को चिंता की सबसे बड़ी वजह बताया है।

खजाने में डॉलर बढ़ा, पर रुपये की ताकत नहीं बढ़ी

नरेंद्र मोदी के शासनकाल में विदेशी मुद्रा भंडार दोगुने से भी ज्यादा हो गया है। विदेशी मुद्रा असेट भी लगभग डबल हो गया है। फिर भी डॉलर सरकार के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर रहा है। इसकी वजह यह है कि इसका विनिमय दर (एक डॉलर के बदले मिलने वाला रुपया) काफी बढ़ गया है।

नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने के वक्त जो डॉलर करीब 60 रुपये के बराबर था, वह आज 95 पार चला गया है। इस वजह से भंडार दोगुना बढ़ जाने के बाद भी बेचैनी है।

वित्तीय वर्ष (Financial Year)विदेशी मुद्रा भंडार($ बिलियन में)विदेशी मुद्रा असेट ($बिलियन में)विनिमय दर(रुपये प्रति$)
2003-0411310745.92
2004-0514213644.85
2005-0615214544.28
2006-0719919245.28
2007-0831029940.24
2008-0925224145.92
2009-1027925547.42
2010-1130527445.57
2011-1229426047.95
2012-1329226054.45
2013-1430427660.50
2014-1534131661.15
2015-1635633365.46
2016-1737034667.09
2017-1842439964.45
2018-1941238469.89
2019-2047843370.88
2020-2157953774.20
2021-2263556074.52
2022-2357853080.39
2023-2464657182.79
2024-2566556584.55
2025-2668055188.31

विदेशी निवेशकों का झटका

2021 के बाद भारतीय शेयर बाजार में उछाल का एक दौर चला था। इसके बाद विदेश की कई कंपनियों ने यहां के शेयर बाजार में खुद को लिस्ट कराया। लेकिन आज भारतीय बाजार में उनका भरोसा नहीं रह गया है। वो या तो बिकवाली कर या अपने शेयर बेच कर पैसा अपने देश वापस ले गए। दूसरी ओर, रुपये की कमजोरी से होने वाले नुकसान से बचने के लिए भारतीय कंपनियों ने भी विदेश में निवेश करना शुरू कर दिया।

दो साल में देश में शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) 28 अरब डॉलर से घट कर एक अरब डॉलर पर रह गया। एफडीआई आने में कमी नहीं हुई, लेकिन निवेश टिका नहीं। अप्रैल से दिसम्बर 2025 के नौ महीनों में ही 44.6 अरब डॉलर का विदेशी निवेश देश से वापस गया। यह ट्रेंड जहां देश के विकास की रफ्तार को रोकता है, वहीं सरकार के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी दबाव बढ़ाने वाला होता है।

मुफ्त वाली योजनाएं अर्थव्यवस्था पर पड़ रहीं भारी

चुनावी घोषनाएं पूरी करने और सब्सिडी देने में बड़ी रकम खर्च होती है। अकेले खाद पर सब्सिडी देने के लिए सरकार ने 1.71 लाख करोड़ रुपये रखे हैं। अनुमान है कि पश्चिम एशिया संकट लंबा खिंचा तो यह बोझ 3 लाख करोड़ रुपये तक जा सकता है।

कोरोना काल में सरकार ने 80 करोड़ से ज्यादा लोगों को मुफ्त अनाज देने की योजना शुरू की थी। 2024 के लोक सभा चुनाव से कुछ महीने पहले घोषणा की गई कि यह योजना 2029 तक जारी रखी जाएगी। पांच साल में इस पर 11.80 लाख करोड़ रुपये खर्च का अनुमान है।

इतने लंबे समय तक इस योजना को चलाने के सरकारी कदम को कई अर्थशास्त्रियों ने अर्थव्यवस्था की तरक्की के लिहाज से सही नहीं माना। इस योजना की समीक्षा करने वाले कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि इससे लोगों की क्रय शक्ति नहीं बढ़ी और उत्पादकता में लोगों का योगदान भी कम हुआ।

बजट बढ़ाने का भी नहीं मिलता फायदा

बजट का अच्छा-खासा हिस्सा ऐसी योजनाओं और गैर उत्पादक कामों पर खर्च होता है। लिहाजा बजट में साल-दर-साल बढ़ोत्तरी के बावजूद लोगों की समृद्धि नहीं बढ़ती।

वित्तीय वर्ष (Financial Year)कुल बजट आकार(करोड़ रुपये में)*पिछले वर्ष की तुलना में बदलाव (%)मुख्य विवरण / टिप्पणी
2009-10₹10,24,487वैश्विक मंदी के बाद प्रोत्साहन पैकेज के कारण व्यय में वृद्धि।
2010-11₹11,97,328📈 +16.8%बुनियादी ढांचे और सामाजिक योजनाओं पर खर्च बढ़ा।
2011-12₹13,04,365📈 +8.9%राजकोषीय समेकन (Fiscal Consolidation) की शुरुआत।
2012-13₹14,10,372📈 +8.1%सब्सिडी और राजस्व खर्चों में वृद्धि।
2013-14₹15,59,447📈 +10.6%चुनाव से पूर्व के वर्ष में ग्रामीण विकास पर ध्यान।
2014-15₹16,63,673📈 +6.7%नई सरकार का पहला पूर्ण बजट।
2015-16₹17,90,783📈 +7.6%14वें वित्त आयोग के तहत राज्यों को अधिक फंड ट्रांसफर।
2016-17₹19,75,194📈 +10.3%रेलवे बजट का सामान्य बजट में विलय करने का निर्णय।
2017-18₹21,41,975📈 +8.4%प्लान और नॉन-प्लान खर्चों का वर्गीकरण समाप्त हुआ।
2018-19₹23,15,113📈 +8.1%ग्रामीण और कृषि अवसंरचना पर बल।
2019-20₹26,86,330📈 +16.0%चुनाव वर्ष और पीएम-किसान (PM-KISAN) योजना की शुरुआत।
2020-21₹35,11,181📈 +30.7%कोविड-19 महामारी: आत्मनिर्भर भारत पैकेज के कारण रिकॉर्ड वृद्धि।
2021-22₹37,94,007📈 +8.1%स्वास्थ्य और आपातकालीन पूंजीगत व्यय (Capex) पर जोर।
2022-23₹41,93,111📈 +10.5%महामारी के बाद आर्थिक सुधार और बुनियादी ढांचे में तेजी।
2023-24₹44,43,447📈 +6.0%पूंजीगत निवेश (Capex) को बढ़ाकर ₹10 लाख करोड़ किया गया।
2024-25₹46,52,867📈 +4.7% राजकोषीय घाटे को कम करने पर ध्यान।
2025-26 (RE)₹49,64,842📈 +6.7%संशोधित अनुमान (Revised Estimates)।
2026-27 (BE)₹53,47,315📈 +7.7%बजट अनुमान (Budget Estimates) - पहली बार ₹53 लाख करोड़ पार।

युवाओं की बेरोजगारी

युवाओं की बेरोजगारी भी अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार की राह का बड़ा रोड़ा है। 2020 में युवा बेरोजगारी दर 24.5 प्रतिशत थी। 2023 में यह 15.4 प्रतिशत पर आ गई थी, लेकिन 2025 में फिर बढ़ कर 17.7 प्रतिशत पर जा पहुंची। 15-24 साल के ऐसे युवाओं की तादाद भी अच्छी खासी है जो न पढ़ाई कर रहे, न रोजगार और न ही कोई ट्रेनिंग ले रहे। 2020 में इनका आंकड़ा 30.7 प्रतिशत था। पांच साल में इसमें पांच प्रतिशत ही गिरावट आई। 2025 में यह आंकड़ा 25.6 प्रतिशत पर था।

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