Shab-e-Qadr 2026: रमज़ान का आख़िरी अशरा शुरू हो चुका है। मुसलमानों के लिए शब-ए-क़द्र (Laylatul Qadr) का क्या महत्व है, यह क़ुरान में कहां दर्ज है और 2026 में इसकी सही तारीख़ें क्या हैं, यहां आसान भाषा में समझें।
Night of Power : इस्लामी कैलेंडर में रमज़ान के पवित्र महीने के आख़िरी दस दिन (अशरा) बेहद फ़ज़ीलत और रहमत वाले माने जाते हैं। इसी आख़िरी अशरे की विषम (ताक़) रातों में मुस्लिम समुदाय 'शब-ए-क़द्र' (Shab-e-Qadr 2026) की तलाश करता है। इस साल भारत में रमज़ान की शुरुआत 19 फ़रवरी 2026 से हुई थी और अब इबादत का यह सबसे अहम दौर शुरू हो चुका है। अरबी भाषा में शब-ए-क़द्र को 'लैलतुल-क़द्र' (Laylatul Qadr Date) कहा जाता है, जिसका अर्थ है 'सम्मान की रात' या 'शक्ति की रात' (Night of Power)। इस्लामी मान्यताओं के अनुसार, यह वह मुक़द्दस (पवित्र) रात है जब अल्लाह ने पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद (सअव) पर पवित्र ग्रंथ 'क़ुरान' को पहली बार नाज़िल करना (उतारना) शुरू किया था। शब-ए-क़द्र ( Shab-e-Qadr)कितनी महत्वपूर्ण है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पवित्र क़ुरान के 30वें पारे की 'सूरह अल-क़द्र' में इसका स्पष्ट ज़िक्र है। इस सूरह में अल्लाह ने फ़रमाया है कि शब-ए-क़द्र में की गई इबादत हज़ार महीनों (क़रीब 83 साल) की इबादत से भी ज़्यादा अफ़ज़ल (बेहतर) है।
इस रात मुस्लिम समाज के लोग पूरी रात जाग कर इबादत करते हैं, नमाज़ अदा करते हैं, क़ुरान की तिलावत (पाठ) करते हैं और अपने अब तक के गुनाहों के लिए अल्लाह से सच्चे मन से तौबा (माफ़ी) मांगते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस रात हज़रत जिब्रील (अलै.) के नेतृत्व में अनगिनत फ़रिश्ते अल्लाह की शांति और रहमत का पैग़ाम लेकर ज़मीन पर उतरते हैं।
रमज़ान के आख़िरी 10 दिनों की ताक़ रातों (21वीं, 23वीं, 25वीं, 27वीं और 29वीं) में से कोई एक रात शब-ए-क़द्र होती है। हालांकि, ज़्यादातर इस्लामी विद्वान 27वीं रात को शब-ए-क़द्र मानकर विशेष इबादत करते हैं। साल 2026 के कैलेंडर के अनुसार भारत में ये अहम तारीख़ें इस प्रकार हैं:
21वीं रात: 10 मार्च 2026 (मंगलवार)
23वीं रात: 12 मार्च 2026 (गुरुवार)
25वीं रात: 14 मार्च 2026 (शनिवार)
27वीं रात: 16 मार्च 2026 (सोमवार) - मुख्य शब-ए-क़द्र
29वीं रात: 18 मार्च 2026 (बुधवार)
शहर के प्रमुख उलेमा और मुफ़्ती-ए-आज़म का कहना है कि शब-ए-क़द्र सिर्फ़ मस्जिदों को सजाने या बाज़ारों में घूमने की रात नहीं है, बल्कि यह अपने रब को राज़ी करने का मौक़ा है। युवाओं को नसीहत दी गई है कि वे इस रात सड़कों पर हुड़दंग मचाने के बजाय मस्जिदों या अपने घरों में बैठकर अल्लाह के हुज़ूर गिड़गिड़ाकर दुआएं मांगें। इस रात मांगी गई हर जायज़ दुआ क़बूल होती है।
शब-ए-क़द्र की अहम रातों के गुज़रने के साथ ही अब मुस्लिम समाज में ईद-उल-फ़ित्र (मीठी ईद) की तैयारियां तेज़ हो जाएंगी। 29वें या 30वें रोज़े की शाम को चांद नज़र आने के बाद अगले दिन पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ ईद मनाई जाएगी। ईद की नमाज़ से पहले हर हैसियतमंद मुसलमान के लिए 'सदक़ा-ए-फ़ित्र' (दान) अदा करना अनिवार्य है, ताकि ग़रीब तबक़ा भी नए कपड़े पहनकर ख़ुशियों में शरीक हो सके।
रमज़ान के आख़िरी अशरे में इबादत के साथ-साथ बाज़ारों की रौनक़ भी दुगुनी हो गई है। रात भर मस्जिदों में तरावीह और नफ़िल नमाज़ों का दौर चलता है, तो वहीं मस्जिदों के बाहर और मुस्लिम बहुल इलाक़ों में सेहरी तक खाने-पीने की विशेष दुकानें सजी रहती हैं। सिवइयां, खजूर, टोपियों और इत्र की दुकानों पर भारी भीड़ देखी जा सकती है। इसके अलावा, इस दौरान ज़कात (अपनी जायदाद का 2.5% दान) निकालने का चलन भी जोरों पर है, जिससे कई ग़रीब परिवारों को सीधे आर्थिक लाभ मिल रहा है।