Women Identity: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कामकाजी महिला से करियर कुर्बान करने की उम्मीद नहीं की जा सकती। पति से दूर नौकरी करना क्रूरता नहीं है।
Supreme Court Judgment : सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक संबंधों और महिला अधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई विवाहित महिला अपने करियर और पेशेवर महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए पति से अलग किसी दूसरे शहर में रहने का विकल्प चुनती है, तो इसे 'क्रूरता' या 'परित्याग' नहीं माना जा सकता। कोर्ट के इस रुख ने उन पारंपरिक बेड़ियों को तोड़ने का काम किया है, जहाँ शादी के बाद महिला से केवल समझौते की उम्मीद की जाती थी।
मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि एक शिक्षित और पेशेवर रूप से योग्य महिला से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह सिर्फ इसलिए अपनी स्वतंत्र पहचान और करियर के सपनों का बलिदान दे दे क्योंकि उसकी शादी हो गई है। कोर्ट ने कहा कि शादी का मतलब यह कतई नहीं है कि महिला अपनी व्यक्तिगत तरक्की और पहचान को खत्म कर ले।
यह फैसला उस याचिका के संदर्भ में आया है जहां पति ने अपनी पत्नी के करियर के कारण अलग रहने को आधार बना कर तलाक की मांग की थी। अदालत ने साफ कर दिया कि करियर की दौड़ में स्वतंत्र रूप से रहने वाली पत्नी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यह फैसला पितृ सत्तात्मक सोच पर एक कड़ा प्रहार है और कामकाजी महिलाओं को कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है।
जस्टिस की पीठ ने इस फैसले के जरिए समाज में गहरे तक पैठी उस सोच को चुनौती दी है, जहां महिलाओं की सफलता को अक्सर उनके वैवाहिक जीवन के लिए खतरा माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि आधुनिक युग में विवाह एक साझेदारी है, न कि किसी एक पक्ष के वर्चस्व का माध्यम। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि एक पेशेवर महिला की अपनी स्वतंत्र गरिमा होती है। उसे महज इसलिए 'परित्याग' का दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि उसने अपनी आर्थिक स्वतंत्रता और पदोन्नति के लिए किसी दूसरे शहर में बसने का निर्णय लिया है। यह फैसला उन महिलाओं के लिए एक मजबूत कवच बनेगा जिन्हें अक्सर करियर और घर के बीच किसी एक को चुनने के लिए मजबूर किया जाता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में 'हिंदू मैरिज एक्ट' के तहत दायर होने वाले तलाक के मामलों में नजीर साबित होगा। अब तक कई मामलों में पति 'दांपत्य अधिकारों की बहाली' की आड़ में पत्नी को अपनी पसंद के स्थान पर रहने के लिए बाध्य करते थे। कोर्ट के इस स्पष्टीकरण के बाद अब 'कैरियर चॉइस' को क्रूरता के दायरे से बाहर कर दिया गया है। इससे उन कामकाजी महिलाओं को बड़ी राहत मिलेगी जो अपने कार्यस्थल पर बेहतर प्रदर्शन करना चाहती हैं, लेकिन कानूनी उलझनों और सामाजिक दबाव के कारण अपनी महत्वाकांक्षाओं को दबा देती थीं। यह फैसला समानता के संवैधानिक अधिकार को घर की दहलीज के भीतर भी मजबूती से स्थापित करता है।