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केरल में CM के बाद विपक्ष की कुर्सी के लिए भी खुला विद्रोह, अब CPI-CPI (M) के अंदर शुरू हुआ नया बवाल

Kerala CPM CPI dispute: केरल में चुनाव हारने के बाद LDF में खुला विवाद देखने को मिला है। CPI ने CPM पर दादागिरी का आरोप लगाते हुए डिप्टी लीडर ऑफ अपोजिशन का पद मांगा है।

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Kerala opposition Seat Rows

पूर्व सीएम पिनाराई विजयन के साथ केरल में सीपीआई के नेता। (फोटो- IANS)

केरल में अभी तक कांग्रेस के भीतर सीएम पद को लेकर अंदरूनी तकरार देखने को मिली थी, लेकिन अब वहां विपक्ष की कुर्सी पर कौन बैठेगा? इसको लेकर भी नया बवाल शुरू हो गए है। केरल विधानसभा चुनाव में करारी हार झेलने के बाद लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) में दरार साफ नजर आने लगी है।

सीपीआई और सीपीआई(एम) के बीच डिप्टी लीडर ऑफ अपोजिशन की कुर्सी को लेकर खुला विवाद सामने आ गया है। यह सिर्फ एक पद की लड़ाई नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही बड़े-छोटे भाई वाली मानसिकता और सत्ता बंटवारे की शिकायत का नया रूप है।

केरल में खुला टकराव

चुनाव हारने के तुरंत बाद सीपीआई ने साफ कहा कि उन्हें डिप्टी लीडर ऑफ अपोजिशन का पद मिलना चाहिए। वहीं, सीपीआई(एम) भी इसी मांग पर अड़ गया है। केरल के वामपंथी कार्यकर्ता भी इस बहस को नजदीक से देख रहे हैं।

कई छोटे साथी दल जैसे आरएसपी और फॉरवर्ड ब्लॉक भी पिछले कई सालों से यही शिकायत करते रहे हैं कि मीटिंग में सीपीआई(एम) की दादागिरी चलती है।

पुरानी रणनीति और नई समस्या

1964 में सीपीआई का अलग होकर होकर सीपीआई(एम) बनी थी। तब से दोनों पार्टियां अलग-अलग संगठन हैं, लेकिन चुनाव में साथ रहती आई हैं।

केरल, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में उनका गठबंधन मजबूत रहा। लेकिन हर बार कार्यकर्ता शिकायत करते कि फैसले सीपीआई(एम) ही तय करता है।

साल 2000 के दशक में यूपीए-1 सरकार के समय लेफ्ट ने बाहर से समर्थन दिया था। बाद में अमेरिका के साथ न्यूक्लियर डील पर विवाद हो गया और लेफ्ट ने समर्थन वापस ले लिया। यह घटना आज भी याद की जाती है।

बिहार और बंगाल में क्या हुआ?

2020 बिहार चुनाव में कम्युनिस्टों ने अच्छा प्रदर्शन किया। महागठबंधन के साथ लड़ते हुए सीपीआई(एम) ने अपने आधे सीटों पर जीत दर्ज की, सीपीआई ने भी दो सीटें जीतीं।

सबसे बड़ा फायदा सीपीआई(एमएल) लिबरेशन को हुआ, जिसने 19 में से 12 सीटें जीत लीं। लेकिन 2025 बिहार चुनाव में लेफ्ट फिर कमजोर हो गया। सिर्फ तीन सीटों तक सिमट गया। पश्चिम बंगाल में तो 2021 में लेफ्ट लगभग साफ हो गया। 2026 चुनाव में भी हाल बेहतर नहीं रहा।

सीपीआई (एमएल) के दीपंकर भट्टाचार्य ने एक बार टीएमसी के साथ हाथ मिलाने की सलाह दी थी, तो लेफ्ट फ्रंट चेयरमैन बिमान बोस ने साफ कहा- हमें सलाह देने की जरूरत नहीं।

नक्सल से संसद तक का सफर

कम्युनिस्टों में प्रो-सोवियत और प्रो-चाइना की लड़ाई पुरानी है। 1960 के दशक के बाद कई गुट नक्सलवादी रास्ते पर चले गए। सीपीआई(एमएल) लिबरेशन आज भी नक्सल आंदोलन से हमदर्दी रखती है, लेकिन हिंसा छोड़कर संसदीय राजनीति में आई है।