Elections:सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल चुनाव में वोटर लिस्ट (SIR) विवाद पर टीएमसी को अलग से याचिका दायर करने का सुझाव दिया है। टीएमसी का दावा है कि चुनाव आयोग द्वारा मतदाताओं के नाम काटे जाने से विधानसभा चुनाव के परिणाम सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं।
Trinamool Congress: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे भले ही घोषित हो चुके हैं, लेकिन राज्य में सियासी घमासान थमने का नाम नहीं ले रहा है। तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। टीएमसी का दावा है कि चुनाव से ठीक पहले एक सोची-समझी साजिश के तहत लाखों मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से काट दिए गए, जिसका चुनाव परिणामों पर सीधा असर पड़ा है। पार्टी ने इस पूरे मामले को चुनावी प्रक्रिया में बड़ी धांधली बताते हुए न्याय की गुहार लगाई है।
चुनाव से पहले हुए 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' के दौरान पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से करीब 90 लाख नाम हटाने का बड़ा विवाद सामने आया था। हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, स्क्रूटनी के बाद 27 लाख से ज्यादा लोगों को अयोग्य घोषित कर दिया गया। इसका सबसे ज्यादा असर मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर 24 परगना जैसे जिलों में देखने को मिला। टीएमसी का आरोप है कि चुनाव आयोग ने एकतरफा कार्रवाई करते हुए उनके संभावित वोटरों और खास समुदायों के वोट काटे हैं, जिससे कई विधानसभा सीटों पर चुनावी समीकरण पूरी तरह से बदल गए।
टीएमसी ने सुप्रीम कोर्ट के सामने उन सीटों का विशेष रूप से जिक्र किया है, जहां हार-जीत का मार्जिन बहुत कम रहा है। उदाहरण के तौर पर, पार्टी ने दावा किया है कि एक सीट पर उनके उम्मीदवार को महज 862 वोटों के मामूली अंतर से हार का सामना करना पड़ा। हैरानी की बात यह है कि उसी क्षेत्र में वोटर लिस्ट से नाम कटने के खिलाफ करीब 5000 अपीलें अब भी ट्रिब्यूनल में लंबित हैं। पार्टी का तर्क है कि अगर इन मतदाताओं को वोट डालने का अधिकार मिलता, तो चुनाव के नतीजे उनके पक्ष में हो सकते थे। इसे बंगाल चुनाव में एक नए 'खेले' के रूप में देखा जा रहा है।
इस संवेदनशील मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टीएमसी को एक अहम सुझाव दिया है। अदालत ने साफ तौर पर कहा है कि चुनाव संपन्न होने के बाद, वोटर लिस्ट और नतीजों से जुड़े विवादों के लिए एकमुश्त याचिका के बजाय, प्रभावित उम्मीदवारों को 'चुनाव याचिका' के तहत अलग-अलग आवेदन दायर करने चाहिए। इससे पहले चुनाव के दौरान भी देश की सर्वोच्च अदालत ने अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए इस मामले में दखल दिया था। चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि जिन लोगों की अपीलें पेंडिंग हैं, उन्हें तभी वोट डालने का अधिकार मिलेगा, जब न्यायिक प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। कोर्ट ने रिटायर्ड जजों की अध्यक्षता में अपीलीय ट्रिब्यूनल भी बनाए थे, ताकि लोगों की शिकायतों का जल्द निपटारा हो सके।
मतदाता सूची विवाद के अलावा, टीएमसी ने 4 मई को हुई मतगणना की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए थे। चुनाव आयोग ने मतगणना केंद्रों पर राज्य सरकार के कर्मचारियों के बजाय केंद्रीय कर्मचारियों और माइक्रो-ऑब्जर्वर की तैनाती ज्यादा की थी। टीएमसी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि केंद्र सरकार के अधीन काम करने वाले कर्मचारियों की मौजूदगी से मतगणना में निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। हालांकि, 2 मई को एक विशेष सुनवाई के दौरान अदालत ने टीएमसी की इस याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि चुनाव ड्यूटी पर तैनात सभी अधिकारी चुनाव आयोग के अधीन होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश के बाद अब यह तय माना जा रहा है कि टीएमसी उन सभी सीटों पर अलग-अलग चुनाव याचिकाएं दायर करेगी, जहां हार का अंतर कम है और वोटर लिस्ट से नाम कटने का विवाद सबसे ज्यादा है। चुनाव आयोग ने भी अपनी सफाई में कहा है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक पारदर्शी प्रक्रिया थी, जिसका मकसद फर्जी और मृत मतदाताओं के नाम हटाना था। अब देखना दिलचस्प होगा कि अदालत इन याचिकाओं पर क्या फैसला सुनाती है और क्या इससे बंगाल की राजनीति में कोई नया भूचाल आता है।