
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में इन दिनों बगावत की आग तेज है। कुछ सांसदों के बागी होने और एनडीए के साथ जुड़ने की खबरों ने पार्टी में हलचल मचा दी है।
इस बीच, टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को एक पत्र सौंपा है, जिसमें संवैधानिक नियम से चलने की मांग की गई है।
कुछ खबरों में दावा किया गया है कि 20 टीएमसी सांसद अलग होकर नया गुट बना रहे हैं। इसको लेकर सोमवार को वह ओम बिरला से मिलने वाले हैं। लेकिन इससे पहले ही कीर्ति आजाद स्पीकर ने स्पीकर को एक पत्र सौंप दिया है।
स्पीकर को पत्र सौंपने के बाद कीर्ति ने कहा- यह बिल्कुल साफ है। सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने कहा है और 10वीं अनुसूची के आर्टिकल 4 में भी लिखा है कि पार्टी में कोई विभाजन नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा- महाराष्ट्र में जो हुआ, वो गलत था। इसलिए हम स्पीकर के पास अर्जी लेकर आए हैं। वे पूरे भरोसे के साथ बोलते हैं कि स्पीकर अब तक नियमों का पालन करते आए हैं और आगे भी करेंगे।
आजाद ने आगे कहा- मैंने स्पीकर को पहले ही बता दिया है कि इन लोगों के पास कोई वैधता नहीं है। जिस तरह से वे काम कर रहे हैं, वह असंवैधानिक है। 'जिस थाली में खाया, उसी में छेद किया।
साधारण भाषा में समझें तो एंटी डिफेक्शन कानून यही कहता है कि अगर कोई विधायक या सांसद अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में चला जाता है तो उसकी सदस्यता जा सकती है। लेकिन अगर पार्टी का दो तिहाई हिस्सा मिलकर मर्ज करता है तो छूट मिल सकती है।
महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि सिर्फ बहुमत से पार्टी का नाम या सिंबल नहीं मिल जाता। संगठनात्मक ताकत भी देखनी पड़ती है। किर्ती आजाद इसी फैसले का हवाला दे रहे हैं।
टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में अगर कोई अलग होना चाहता है तो उसे कम से कम 19 सांसदों का साथ चाहिए। किर्ती आजाद का दावा है कि बागियों के पास इतनी ताकत नहीं है।
कई पूर्व लोकसभा सचिवों का कहना है कि अलग ब्लॉक बनाने का कोई प्रावधान नहीं है। अगर बागी स्पीकर के पास जाते हैं तो उन्हें कानूनी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
महाराष्ट्र वाला केस यहां पूरी तरह लागू नहीं होता क्योंकि वहां पूरा पार्टी स्प्लिट हुआ था।ममता बनर्जी की मजबूती और चुनौतियांममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी लंबे समय से पश्चिम बंगाल में मजबूत है। लेकिन हर चुनाव से पहले ऐसे बगावत के प्रयास होते रहते हैं।
अब सबकी नजर लोकसभा स्पीकर ओम बिरला पर है। अगर उन्होंने किर्ती आजाद की अर्जी पर सुनवाई की तो बागियों को मुश्किल हो सकती है। साथ ही चुनाव आयोग भी अगर कोई दावा आया तो संगठन और विधायी ताकत दोनों देखेगा।