4 जून 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

30 दिनों में कैसे बिखर गई तृणमूल कांग्रेस? अभिषेक बनर्जी पर हमला, पार्षदों का पलायन; बगावत के रास्ते पर दिग्गज

Mamata Banerjee: तृणमूल कांग्रेस इन दिनों अपने सबसे बड़े आंतरिक संकट से जूझ रही है। करीब 60 विधायकों ने सामूहिक रूप से पार्टी छोड़ने और बगावत करने की चेतावनी दे डाली है।

2 min read
Google source verification
mamata banerjee

mamata banerjee

Trinamool Congress Crisis: पश्चिम बंगाल में 15 साल तक सत्ता में रहने वाली तृणमूल कांग्रेस सिर्फ 30 दिन में ही ताश के पत्तों की तरह बिखर गई। विधानसभा चुनाव परिणाम आज के दिन यानी 4 मई को जारी हुआ था। प्रदेश में पहली बार बीजेपी की सरकार बनी है। इस चुनाव में ममता बनजी की पार्टी टीएमसी बुरी तरह हार गई। करारी हार के साथ ही पार्टी आंतरिक संकट से जूझ रही है। निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में हुए विद्रोह ने टीएमसी को विघटन के कगार पर ला खड़ा किया है। हैरान की बात यह है कि हाल तक राजनीतिक रूप से अजेय प्रतीत होने वाली यह पार्टी इतनी तेजी से कैसे बिखर गई। पाटी के 100 से अधिक पार्षदों ने इस्तीफा दे दिया और शीर्ष नेता लगभग हर दूसरे दिन नेतृत्व के खिलाफ असहमति जता रहे हैं।

अभिषेक बनर्जी और आई-पैक (I-PAC) पर फूटा गुस्सा

टीएमसी संकट की मुख्य वजह पार्टी का शीर्ष नेतृत्व और उसकी चुनावी रणनीतियां बताई जा रही हैं। पार्टी के बागी नेताओं और विधायकों का आरोप है कि पार्टी अब जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं के बजाय 'आई-पैक' (I-PAC) जैसी कॉरपोरेट एजेंसियों और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के इशारों पर चल रही है। वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि टिकट बंटवारे में मनमानी और तानाशाही की गई। जमीन की हकीकत को नजरअंदाज करना पाटी को काफी महंगा साबित हुआ। इसी गुस्से का नतीजा था कि पार्टी की वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए पार्टी के पदों से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद से पार्टी की आंतरिक कलह सरेआम हो गई।

अभिषेक बनर्जी पर हमला और उम्मीदवारों का पीछे हटना

टीएमसी के भीतर की यह बगावत सड़कों पर नजर आई। इसका सबसे चौंकाने वाला उदाहरण सोनारपुर में देखने को मिला, जहां पार्टी कार्यकर्ताओं के ही एक आक्रोशित गुट ने अभिषेक बनर्जी की गाड़ी पर अंडों और पत्थरों से हमला कर दिया। इतना ही नहीं फाल्टा से टीएमसी के घोषित उम्मीदवार जहांगीर खान ऐन वक्त पर चुनावी मैदान छोड़कर भाग गए। उन्होंने खुद को प्रक्रिया से अलग कर लिया। जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं का यह विद्रोह साफ संकेत दे रहा है कि नेतृत्व और जमीनी स्तर के बीच का संवाद पूरी तरह टूट चुका है।

केंद्रीय एजेंसियों का डर और पार्षदों का पलायन

इस राजनीतिक उथल-पुथल के बीच कोलकाता नगर निगम (KMC) द्वारा कुछ बागी पार्षदों को भेजे गए नोटिस और प्रवर्तन निदेशालय (ED) जैसी केंद्रीय एजेंसियों की बढ़ती सक्रियता ने आग में घी का काम किया है। शुभेन्दु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा की बढ़ती आक्रामकता के कारण टीएमसी के नेता अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। राज्य के विभिन्न हिस्सों से लगभग 100 से अधिक पार्षदों ने या तो पाला बदल लिया है या वे भाजपा के संपर्क में आ गए।

'सिग्नगेट' ने तृणमूल में तहलका मचा दिया

टीएमसी में चल रहे विद्रोह की जड़ में जाली हस्ताक्षरों का विवाद है। यह विवाद तब शुरू हुआ जब अभिषेक ने पार्टी के महासचिव के रूप में स्पीकर को पत्र लिखकर शोभनदेब चट्टोपाध्याय को विपक्ष के नेता (एलओपी) के रूप में प्रस्तावित किया। हालांकि, ऋतब्रता और एक अन्य विधायक संदीपान साहा ने आरोप लगाया कि विधायक दल की बैठक में ऐसा कोई प्रस्ताव पारित नहीं हुआ था और शोभंदेब का समर्थन करने वाले पत्र पर कई हस्ताक्षर जाली थे। इससे कई विवाद खड़े हो गए और टीएमसी नेतृत्व पर अपने ही विधायकों को धोखा देने के आरोप लगे।