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Analysis On West Bengal Election Result 2026: क्यों डूबी ममता बनर्जी की नैया, बीजेपी का फार्मूला कैसे हुआ सुपरहिट

West Bengal Assembly Election 2026: पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का मजबूत किला ढह गया है। भाजपा ने TMC को सत्ता से उखाड़ फेंका है और इसी के साथ पहली बार राज्य में पूर्ण बहुमत हासिल करके इतिहास रच दिया है। तमाम एग्जिट पोल्स ममता की हार का अनुमान पहले ही लगा रहे थे और चुनावी नतीजों ने उन पोल्स पर मुहर लगा दी है।

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ममता ने बंगाल पर 15 साल राज किया, पिछले लगभग हर चुनाव में उन्होंने यह साबित करके दिखाया कि बंगाल में उन्हें हराना नामुमकिन है। फिर इस बार ऐसा क्या हुआ कि भाजपा उस 'नामुमकिन' को मुमकिन बनाने में कामयाब रही। चलिए ममता बनर्जी की हार और बीजेपी की जीत के 5 कारण जानते हैं।

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सनातनी लहर

हिन्दू मतदाताओं ने इस चुनाव में खुलकर भाजपा को वोट दिया। भाजपा शुरुआत से ही यह कहती आ रही थी कि सनातन की रक्षा के लिए हिन्दू मतदाताओं को एकजुट होकर ममता के खिलाफ वोट करना होगा। बीजेपी ने ममता की TMC सरकार को एंटी हिन्दू प्रोजेक्ट किया और प्रदेश की हिन्दू आबादी को यह विश्वास दिलाने में सफल रही कि उसके हित केवल भाजपा के साथ ही सुरक्षित हैं। बंगाल में 25-30% तक मुस्लिम मतदाता हैं. भाजपा ने बाकी आबादी का ध्रुवीकरण मजबूती के साथ किया और उनके वोट को बंटने नहीं दिया। यहां तक कि दूसरे राज्यों में नौकरी या मजदूरी करने वाले बंगाल के हिन्दू वोटरों को भी भाजपा यह समझाने में सफल रही कि इस बार के चुनाव में उनकी भागीदारी क्यों जरूरी है। बड़े पैमाने पर प्रवासी घर लौटे और भाजपा के पक्ष में वोट किया। ममता बनर्जी को इसका आभास था, इसलिए उन्होंने आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए दावा किया था कि बीजेपी ने प्रवासी मज़दूरों को घर वापस लाने के लिए कई विशेष ट्रेनें चलाई हैं।

कानून-व्यवस्था

आरजी कर मेडिकल कॉलेज और दुर्गापुर गैंगरेप जैसी घटनाओं ने राज्य की कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए। इसके अलावा, ममता बनर्जी की लड़कियों को रात में बाहर न निकलने की नसीहत भी लोगों को पसंद नहीं आई। इस बयान से यह संदेश गया कि एक महिला मुख्यमंत्री महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर नहीं है। आरजी कर मेडिकल कॉलेज मामला 2024 का था, और अक्सर समय के साथ घटना की तीव्रता कम होती जाती है, लेकिन न भाजपा ने ऐसा होने दिया और न ममता सरकार ने कानून व्यवस्था दुरुस्त करके उसे एक अपवाद साबित करने की कोशिश की। 2025 में दुर्गापुर में एमबीबीएस छात्रा से कथित गैंगरेप ने कानून व्यवस्था को फिर बड़ा मुद्दा बना दिया। दूसरी तरफ, भाजपा ने आरजी कर मेडिकल कॉलेज पीड़िता की मां रत्ना देबनाथ को पानीहाटी सीट से उम्मीदवार बनाकर यह दर्शाया कि वो ऐसे मुद्दों पर कितना गंभीर और संवेदनशील है।

आपसी कलह

तृणमूल कांग्रेस में आपसी कलह भी ममता बनर्जी की हार का एक प्रमुख कारण है। TMC काफी हद तक दो भागों में बंट गई थी। एक तरफ, महुआ मोइत्रा और अभिषेक बनर्जी जैसे नेता रहे, जो ममता बनर्जी के बेहद खास हैं। दूसरी तरह, उन नेताओं का कुनबा एकजुट हो गया, जिन्हें पार्टी में अपेक्षित सम्मान नहीं मिला। इस वजह से चुनावी कार्यों में जो एकजुटता नजर आनी चाहिए थी, नहीं आई और इसका खामियाजा पार्टी जो भुगतना पड़ा। तृणमूल कांग्रेस सांसद कल्याण बनर्जी के मामले ने पार्टी में कलह को और गहरा कर दिया था। कल्याण को लोकसभा में पार्टी के चीफ व्हिप के पद से इस्तीफा देना पड़ा था। क्योंकि महुआ मोइत्रा और उनके बीच तकरार थी और ममता बनर्जी का झुकाव मोइत्रा की तरफ था। इस्तीफे के बाद कल्याण बनर्जी ने कहा था - मैंने लोकसभा में पार्टी के चीफ व्हिप का पद छोड़ दिया है, क्योंकि 'दीदी' ने डिजिटल बैठक के दौरान कहा था कि पार्टी सांसदों के बीच समन्वय की कमी है, इसलिए दोष मुझ पर है।

विजनलैस कैम्पैन

ममता बनर्जी लगातार 15 साल सत्ता में रहीं, ऐसे में मतदाताओं के बीच सरकार के खिलाफ एक स्वाभाविक नाराजगी या बदलाव की भावना निर्मित होना लाजमी थी। ऐसे में ममता को मतदाताओं को यह समझाना था कि उनका चौथी बार सत्ता में आना क्यों जरूरी है। लेकिन वो इसमें नाकामयाब रहीं। ममता के पास ठोस मुद्दे नहीं थे, जबकि भाजपा ने महिला सम्मान, सुरक्षा, धर्म और बांग्लादेशी घुसपैठियों को बाहर करने के नाम पर वोट मांगे।

3000 रुपए और SIR

ममता की हार में भाजपा की लोकलुभान घोषणा भी प्रमुख रही। मध्य प्रदेश की लाड़ली बहना की तर्ज पर भाजपा ने महिलाओं को हर महीने आर्थिक सहायता देने का ऐलान किया, लेकिन उसकी राशि मध्य प्रदेश से कहीं ज्यादा रखी। 3000 रुपए हर महीने के ऐलान ने बंगाल की महिला मतदाताओं को भाजपा के पक्ष में वोट करने को उत्साहित किया। लाडली बहना योजना मध्य प्रदेश में भी भाजपा के लिए गेम चेंजर साबित हुई थी और यहां भी रिजल्ट वही रहा। इसके अलावा, चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया से भी ममता का मजबूत किला कमजोर हुआ। इस दौरान, आयोग ने करीब 91 लाख नाम वोटर लिस्ट से काटे। इनमें ममता बनर्जी का वोट बैंक समझे जाने वाले समुदाय के लोगों की भी बड़ी तादाद थी।

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Updated on:
04 May 2026 12:05 pm
Published on:
04 May 2026 11:45 am
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