पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने सबको चौंका दिया है। जानिए उन 5 बड़े चेहरों के बारे में जिन्होंने ममता बनर्जी के अभेद्य दुर्ग में कमल खिलाने के लिए रची ऐतिहासिक रणनीति।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने पूरे देश को चौंका दिया है। दीदी के अभेद्य माने जाने वाले दुर्ग में सेंध लगाकर भारतीय जनता पार्टी ने ऐतिहासिक बढ़त बनाई है। रुझानों और नतीजों के जो आंकड़े सामने आ रहे हैं, उनमें बीजेपी बहुमत के जादुई आंकड़े को पार करती दिख रही है। यह जीत केवल एक चुनावी जीत नहीं है, बल्कि सालों की मेहनत और एक सोची-समझी रणनीति का परिणाम है। इस बड़ी जीत के पीछे पांच ऐसे चेहरे हैं, जिन्होंने बंगाल की राजनीतिक जमीन पर कमल खिलाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने पूरे देश को हैरान कर दिया है। दीदी के अजेय माने जाने वाले किले में सेंध लगाकर भारतीय जनता पार्टी ने ऐतिहासिक बढ़त हासिल की है। रुझानों और नतीजों से साफ है कि बीजेपी बहुमत के जादुई आंकड़े को पार करती नजर आ रही है। यह जीत सिर्फ एक चुनावी सफलता नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही रणनीति और कड़ी मेहनत का नतीजा है। इस बड़ी कामयाबी के पीछे पांच ऐसे चेहरे हैं, जिन्होंने बंगाल की राजनीति में कमल खिलाने के लिए पूरी ताकत लगा दी।
ये भी पढ़ें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस जीत के सबसे बड़े नायक बनकर उभरे हैं। उन्होंने बंगाल में केवल रैलियां ही नहीं कीं, बल्कि लोगों के दिलों तक पहुंचने के लिए सांस्कृतिक और भावनात्मक कार्ड भी खेला। पीएम ने हुगली नदी में बोटिंग की और आम बंगाली की तरह झालमुड़ी खाए। उन्होंने टीएमसी के बाहरी बनाम भीतरी वाले नैरेटिव को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। कोलकाता के थंथानिया कालीबाड़ी से लेकर बेलूर मठ तक मत्था टेककर मोदी ने बंगाली अस्मिता और आस्था को विकास के एजेंडे से जोड़ दिया। उनकी 21 रैलियों ने कार्यकर्ताओं में वह जान फूंकी, जिसका नतीजा आज सबके सामने है।
चुनाव की तारीखों के एलान से बहुत पहले ही केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बंगाल के मोर्चे पर मोर्चा संभाल लिया था। शाह ने राज्य में परिवर्तन यात्रा के जरिए भ्रष्टाचार और घुसपैठ को बड़ा मुद्दा बनाया। उन्होंने चुनावी वॉर रूम की कमान खुद संभाली और एक-एक सीट का माइक्रो मैनेजमेंट किया। अमित शाह का फोकस उन इलाकों पर था जहां टीएमसी मजबूत थी। उनकी रणनीति ने ममता बनर्जी के मजबूत कैडरों को हिलाकर रख दिया और एंटी इनकंबेंसी की लहर को वोट में तब्दील कर दिया।
कभी ममता बनर्जी के सबसे खास सिपहसालार रहे सुवेंदु अधिकारी इस चुनाव में बीजेपी के लिए गेम चेंजर साबित हुए। सुवेंदु को बंगाल की नब्ज पता थी। उन्होंने न केवल नंदीग्राम में ममता बनर्जी को घेरा, बल्कि पूरे दक्षिण बंगाल में बीजेपी की जमीन तैयार की। सुवेंदु ने टीएमसी के भीतर की कमजोरियों को बीजेपी के पक्ष में इस्तेमाल किया, जिससे ममता बनर्जी के अपने ही किले में दरारें पड़ गईं।
सुनील बंसल को बीजेपी का साइलेंट ऑर्गनाइजर कहा जाता है। उन्होंने बंगाल में चुनावी जमीन तैयार करने के लिए संगठन को जमीनी स्तर तक मजबूत किया। मंडल और बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ाने के लिए उन्होंने लगातार दौरे किए और स्थानीय नेताओं के साथ बैठकें कीं। उनकी खास रणनीति थी माइक्रो मैनेजमेंट। हर बूथ पर जिम्मेदारी तय करना, कार्यकर्ताओं को ट्रेनिंग देना और चुनावी दिन की प्लानिंग को पहले से फाइनल करना, इन सब पर उन्होंने बारीकी से काम किया। यही वजह रही कि बीजेपी का कैडर पहले के मुकाबले ज्यादा संगठित और आक्रामक नजर आया।
भूपेंद्र यादव ने इस पूरे अभियान में पॉलिटिकल मैनेजमेंट की कमान संभाली। उनकी भूमिका थी पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह संतुलन बनाना। उन्होंने बंगाल में स्थानीय नेताओं के बीच चल रहे मतभेदों को सुलझाने में अहम भूमिका निभाई। टिकट वितरण से लेकर प्रचार की रणनीति तक, हर बड़े फैसले में उनका हस्तक्षेप दिखा। भूपेंद्र यादव की सबसे बड़ी ताकत रही कोऑर्डिनेशन। उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व, राज्य इकाई और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच बेहतर तालमेल स्थापित किया। इसी के चलते चुनाव के दौरान बीजेपी एकजुट नजर आई और विपक्ष के मुकाबले ज्यादा संगठित ढंग से मैदान में उतरी।