नई दिल्ली

गजब! मरीज को बिना बेहोश किए डॉक्टरों ने बदल दी किडनी, ऑपरेशन के दौरान लगते रहे हंसी-ठहाके, फिर…

Kidney Transplant Surgery: दिल्ली के एक अस्पताल में डॉक्टरों ने एक मरीज को बिना बेहोश किए उसका किडनी ट्रांसप्लांट किया। ऑपरेशन के दौरान मरीज और डॉक्टरों के बीच हंसी-ठहाके भी गूंजते रहे। आइए जानते हैं फिर क्या हुआ?

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Kidney Transplant Surgery: राष्ट्रीय राजधानी में एम्स के बाद एक निजी अस्पताल ने भी अपने इलाज के तरीके से सबको हैरान कर दिया है। एम्स में जहां डॉक्टरों ने एक महिला के पेट से लगभग 20 किलो का ट्यूमर निकालकर उसे नई जिंदगी दी थी, वहीं अब दिल्ली के इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज (ILBS) ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए मरीज को बिना बेहोश किए किडनी ट्रांसप्लांट की सफल सर्जरी कर दिखाई है। अस्पताल के अनुसार, दिल्ली में यह पहली बार हुआ है, जब जनरल एनेस्थीसिया के बजाय केवल एपिड्यूरल एनेस्थीसिया देकर किसी मरीज की किडनी ट्रांसप्लांट की गई।

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ऑपरेशन के दौरान पूरी तरह होश में रहा मरीज

इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज (ILBS) के डॉक्टरों ने किडनी ट्रांसप्लांट छह फरवरी को किया। डॉक्टरों के अनुसार, ऑपरेशन के दौरान मरीज पूरी तरह होश में रहा, क्योंकि उसे जनरल एनेस्‍थीसिया नहीं दिया गया था। डॉक्टरों ने किडनी ट्रांसप्लांट से पहले मरीज को सिर्फ एपिड्यूरल एनेस्‍थीसिया दिया। इससे मरीज का सिर्फ कमर के नीचे का हिस्सा सुन्न हो गया। इसके चलते ऑपरेशन के दौरान मरीज को बिल्कुल भी दर्द महसूस नहीं हुआ और वो सर्जरी के दौरान भी डॉक्टरों से बातचीत करता रहा।

बिना जनरल एनेस्‍थीसिया पहली सर्जरी

इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज (ILBS) के डॉक्टरों ने बताया कि ऑपरेशन के समय मरीज को किसी भी तरह की असहजता महसूस नहीं हुई। फिलहाल मरीज स्वस्‍थ है। उसे मंगलवार को अस्पताल से छुट्टी दे दी जाएगी। डॉक्टरों का कहना है कि आमतौर पर किडनी ट्रांसप्लांट के लिए जनरल एनेस्थीसिया दिया जाता है, जिसमें मरीज को पूरी तरह बेहोश कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया में मरीज खुद सांस नहीं ले पाता है। इसलिए कृत्रिम सांस की नली डाली जाती है और मरीज को वेंटिलेटर पर रखा जाता है। यह तरीका सामान्य रूप से सुरक्षित माना जाता है, लेकिन जिन मरीजों को पहले हृदय या फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां है, उनमें संक्रमण का जोखिम बढ़ सकता है।

पहले से दिल और फेफड़ों की बीमारियों से परेशान था मरीज

इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज (ILBS) अस्पताल के डॉक्टरों ने बताया कि इस मरीज को भी हृदय और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां थीं। इससे जनरल एनेस्‍थीसिया से संक्रमण का खतरा था। इसी जोखिम को ध्यान में रखते हुए आईएलबीएस के डॉक्टरों ने इस बार एक अलग तकनीक अपनाई। मरीज को केवल एपिड्यूरल एनेस्थीसिया दिया गया, जिससे कमर के नीचे का हिस्सा सुन्न हो गया। सर्जरी के दौरान उसे दर्द नहीं हुआ और वह बिना किसी मशीन की मदद के खुद सांस लेता रहा।

क्या होता है एपिड्यूरल एनेस्थीसिया?

दरअसल, जनरल एनेस्‍थीसिया जहां मरीज को पूरी तरह बेहोश कर देता है, वहीं एपिड्यूरल एनेस्थीसिया में मरीज पूरी तरह जागता रहता है, लेकिन जिस हिस्से की सर्जरी होनी होती है, वह हिस्सा सुन्न हो जाता है। इसके लिए रीढ़ की हड्डी के पास एक पतली ट्यूब के जरिए मरीज को दवा दी जाती है, जिससे ऑपरेशन के बाद भी दर्द नियंत्रित किया जा सकता है। एपिड्यूरल एनेस्‍थीसिया में मरीज सामान्य रूप से स्वतः सांस लेता रहता है। वहीं, जनरल एनेस्थीसिया में मरीज को पूरी तरह बेहोश कर दिया जाता है। ऑपरेशन के दौरान उसे कुछ भी महसूस नहीं होता और सांस लेने के लिए गले में ट्यूब डालकर वेंटिलेटर का सहारा लिया जाता है।

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