
India National Gene Bank: बारिश समय पर न हो, बाढ़ आ जाए या फिर कोई नई बीमारी फसलों को नष्ट कर दे। ऐस स्थिति में किसानों के सामने बड़ा संकट सिर्फ अनाज का नहीं होता, बल्कि एक सवाल भी होता है, अगले मौसम में यही फसल बोने के लिए बीज कहां से आएंगे? जब खेतों में एक भी दाना नहीं बचेगा, तो खेती की नई शुरुआत कहां से होगी? ये सवाल सुनने में भले ही काल्पनिक सवाल लगें, लेकिन वर्तमान में जलवायु परिवर्तन और लगातार बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं के दौर में यह अब वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों के लिए गंभीर चिंता का सबब बन चुका है।
हर किसान अपनी फसल का एक हिस्सा अगले सीजन के लिए बीज के रूप में बचाकर रखता था। लेकिन आधुनिक खेती में बड़ी संख्या में किसान हर साल बाजार से प्रमाणित बीज खरीद रहे हैं। ऐसे में यदि किसी बड़े क्षेत्र में लगातार फसलें नष्ट हो जाएं, तो बीज की उपब्धता भी संकट में पड़ सकती है। इसी खतरे को देखते हुए भारत समेत दुनिया के कई देशों ने सीड बैंक बनाए हैं। इनका उद्देश्य किसी भी आपदा, युद्ध, महामारी या जलवायु संकट की स्थिति में सुरक्षित रखे गए बीजों से खेती दोबारा शुरू की जा सके।
भारत में इन बीजों के लिए एक ठोस और नामी संस्थान है। नई दिल्ली स्थित ICAR, राष्ट्रीय पादप आनुवांशिक संसाधन ब्यूरो (NBPGR)का राष्ट्रीय जीन बैंक, जो 1996 में स्थापित हुआ था। यह भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के कंट्रोल में काम करता है। देश में पादप आनुवांशिक संसाधनों के प्रबंधन के लिए नोडल संगठन है।
कम तापमान और नियंत्रित नमी के कारण बीजों की अंकुरण क्षमता बरसों तक बनी रहती है। फिलहाल इस जीन बैंक में करीब 5 लाख (0.47 मिलियन) एक्सेन्स, यानी संरक्षण के लिए रखी गई अलग-अलग किस्मों की सामग्री सुरक्षित रखी गई है। इनमें अनाज, दालें, तिलहन, मोटे अनाज, सब्जियां और कई दुर्लभ देसी किस्में शामिल हैं।
इसकी खासियत यह हैं कि नॉर्वे के स्वालबोर्ड सीड वॉल्ट के बाद यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा जीन बैंक माना जाता है। भारत सरकार ने केंद्रीय बजट 2025-26 में एक दूसरा राष्ट्रीय जीन बैंक बनाने की घोषणा भी की है, ताकि आने वाले वर्षों में 10 लाख से ज्यादा फसल जर्मप्लाज्मा को संरक्षित किया जा सके। समय-समय पर इन बीजों का परीक्षण किया जाता है। वहीं पुराने बीजों को फिर से उगाकर नया बीज तैयार किया जाता है, ताकि उनकी अंकुरण क्षमता कभी खत्म न हो।
मान लीजिए किसी राज्य में भीषण बाढ़ या सूखा या फिर कोई ऐसी बीमारी जो फसलों को पूरी तरह नष्ट कर दे तो। ऐसी स्थिति में कृषि वैज्ञानिक और सरकारी एजेंसियां सुरक्षित बीज भंडार से बीज उपलब्ध कराकर किसानों को दोबारा खेती करने में मदद कर सकती है। यही वजह है की बीज बैंक को कृषि इंश्योरेंस पॉलिसी भी कहा जाता है।
नॉर्वे के आर्कटिक क्षेत्र में एक पहाड़ा के अंदर बनाया गया स्वालबार्ड ग्लोबल सीड वॉल्ट दुनिया का सबसे बड़ा वैश्विक बीज भंडार माना जाता है। यहां दुनिया के लगभग हर देश से लाखों बीज नमूने सुरक्षित रखे गए हैं। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यदि बिजली चली भी जाए, तो भी वहां का प्राकृतिक तापमान लंबे समय तक बीजों को सुरक्षित रख सकता है। यदि किसी देश का अपना बीज संग्रह नष्ट हो जाए तो वहां जमा उसकी प्रतियां भविष्य में काम आ सकती हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ते तापमान, अनियमित मानसून, नई बीमारियों और कीटों के कारण फसलों पर खतरा पहले से अधिक बढ़ गया है। कई पारंपरिक किस्में धीरे-धीरे समाप्त हो रही हैं। इसीलिए अब सिर्फ अधिक उत्पादन नहीं, बल्कि बीजों की विविधता बचाना भी उतना ही जरूरी माना जा रहा है। क्योंकि भविष्य में कौन-सी किस्म कठिन मौसम में टिक पाएगी, यह पहले से तय नहीं किया जा सकता।
कई कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि स्थानीय जलवायु के मुताबिक विकसित देसी बीज कई बार सूखा, अधिक गर्मी या कुछ बीमारियों का बेहतर सामना कर लेते हैं। इसलिए देश में इन किस्मों को भी संरक्षित करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। यदि भविष्य में मौसम और अधिक अनिश्चित हुआ, तो यही विविधता किसानों के लिए सबसे बड़ा सहारा बन सकती है।
देश के कई हिस्सों में किसान समूह और स्वयंसेवी संस्थाएं सामुदायिक बीज बैंक भी चला रही हैं। यहां किसान अपनी स्थानीय किस्मों के बीज जमा करते हैं और जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे को उपलब्ध कराते हैं। इससे स्थानीय जैव विविधता भी बचती है और बाजार पर निर्भरता भी कम होती है।
हम अक्सर खाद, पानी और मौसम की बात करते हैं, लेकिन खेती की पूरी व्यवस्था की पहली सीढ़ी बीज है। यदि बीज ही सुरक्षित नहीं रहेगा, तो खेती की वापसी भी मुश्किल हो जाएगी। इसलिए आज बीज बैंक सिर्फ वैज्ञानिक परियोजना नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, किसानों के भविष्य और आने वाली पीढ़ियों की थाली की सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण आधार बन चुके हैं।