ओपिनियन

चुनौती का वक्त

असल में निर्वाचन आयोग की भूमिका भी न्यायपालिका की तरह होती है। जिसका किया न्याय होना ही नहीं दिखना भी चाहिए।
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Oct 14, 2017
election commission
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चुनाव आयोग ने हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव की तारीख का ऐलान कर दिया। उम्मीद पूरी थी कि वह इसी के साथ गुजरात विधानसभा चुनाव के कार्यक्रम का ऐलान कर देगा, लेकिन वह पूरी नहीं हुई। इससे पहले दोनों राज्यों की विधानसभाओं के कम से कम तीन चुनावों के कार्यक्रमों की घोषणा एक साथ हुई और दोनों ही जगह एक साथ आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू हुई। इस बार चुनाव आयोग ने ऐसा क्यों किया, इसका कोई कारण आयोग की ओर से नहीं बताया गया।

चुनाव कार्यक्रम की घोषणा करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ने इतना ही कहा कि गुजरात में मतदान १८ दिसम्बर से पहले हो जाएगा यानी उस दिन के लिए तय हिमाचल की मतगणना गुजरात चुनावों को प्रभावित नहीं करेगी। केवल इसी कारण से कि आयोग ने हमेशा की तरह दोनों राज्यों के लिए एक साथ चुनाव कार्यक्रम की घोषणा नहीं की, उसकी निष्पक्षता पर अंगुली उठाना वाजिब नहीं है लेकिन पारदर्शिता के इस जमाने में देश की जनता इसके कारण जानने की उम्मीद तो चुनाव आयोग से कर ही सकती है। ऐसा नहीं हुआ तो विपक्ष के इस आरोप को बल मिलेगा कि गुजरात जो राजनीतिक दृष्टि से आज देश का अति संवेदनशील राज्य है, को आयोग ने अवसर दिया है, कुछ और चुनावी घोषणाएं करने का।

ऐसे में बेहतर यह भी हो सकता है कि आयोग बिना किसी विवाद में पड़े हिमाचल प्रदेश की तरह गुजरात में भी तारीखों की घोषणा कर आदर्श आचार संहिता लागू कर दे या फिर तारीख की घोषणा जब करे-तब करे लेकिन गुजरात सरकार को यह निर्देश दे कि वह अब कोई नयी घोषणा नहीं करे। असल में चुनाव आयोग की भूमिका भी न्यायपालिका की तरह है। जिसका किया न्याय होना ही नहीं दिखना भी चाहिए।

आयोग ने हाल ही गुजरात के राज्यसभा चुनाव के दौरान जो भूमिका निभाई उसने उसकी निष्पक्षता ही जाहिर की थी। भले मुख्य चुनाव आयुक्त गुजरात कॉडर के वरिष्ठ अधिकारी रहे हों। निर्वाचन आयोग और उससे जुड़ी राज्यों की मशीनरी के साथ राजनीतिक दलों के लिए आने वाले महीने दिन-रात काम करने के हैं। उम्मीद है कि इन सबके साथ मतदाता भी अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन सजगता से करेगा।

Published on:
14 Oct 2017 03:13 pm