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कुलिश जी के लिए लोकतंत्र केवल शासन प्रणाली नहीं, बल्कि जीवन मूल्य था

Karpoorchandra kulish birth centenary : :कर्पूरचंद्र कुलिश जी की जन्म शताब्दी पर विशेष: जानिए कैसे उन्होंने पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बनाया और सत्ता के सामने कभी नहीं झुके। आज के मीडिया के लिए कड़े सबक।

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Feb 20, 2026
भारतीय पत्रकारिता के पुरोधा और राजस्थान पत्रिका के संस्थापक कर्पूरचंद्र कुलिश जी। (फोटो: पत्रिका)

Karpoorchandra kulish birth centenary: भारतीय पत्रकारिता के पुरोधा और राजस्थान पत्रिका के संस्थापक (Rajasthan Patrika Founder) कर्पूरचंद्र कुलिश जी न केवल एक अद्भुत पत्रकार थे, बल्कि वे भारतीय लोकतंत्र के एक सजग प्रहरी और चिंतक भी थे। उनके लिए लोकतंत्र केवल शासन प्रणाली नहीं, बल्कि एक जीवन मूल्य था, जिसमें 'लोक' (जनता) सर्वोपरि रहा। आज के दौर में जब मीडिया और लोकतंत्र के रिश्तों पर कई सवाल उठ रहे हैं, कुलिश जी (Karpoor Chandra Kulish Biography) के विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। उनका मानना था कि लोकतंत्र की असली शक्ति 'जनता' और 'जन-विश्वास' में निहित है। उनके अनुसार, एक पत्रकार और मीडिया संस्थान की सबसे बड़ी जिम्मेदारी अपने पाठकों और समाज के प्रति होती है, सत्ता के गलियारों के प्रति नहीं।

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निर्भीकता और सत्य के प्रति आग्रह

वे मानते थे कि लोकतंत्र तभी जीवित रह सकता है जब प्रेस स्वतंत्र और निर्भीक हो। कुलिश जी ने अपने जीवन में इसका जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया। एक प्रसिद्ध वाकया है जब वे 'राष्ट्रदूत' में कार्य कर रहे थे। उस समय जयपुर में एक समारोह के दौरान सामंती सरदारों को निर्वाचित जनप्रतिनिधियों (मंत्रियों) से अधिक सम्मान और ऊंचा स्थान दिया गया। कुलिश जी को यह बात लोकतंत्र की गरिमा के खिलाफ लगी। उन्होंने माना कि एक लोकतांत्रिक देश में जनता की ओर से चुने गए प्रतिनिधियों का स्थान सबसे ऊपर होना चाहिए, पुराने सामंतों का नहीं। जब उन्होंने इसके विरोध में खबर लिखी और उन पर इसे दबाने का दबाव डाला गया, तो उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता करने के बजाय नौकरी छोड़ना उचित समझा। यह घटना बताती है कि वे लोकतंत्र में 'जनमत' के सम्मान को लेकर कितने कठोर और स्पष्ट थे।

सत्ता से दूरी और निगरानी की सोच

कुलिश जी का साफ तौर पर यह मानना था कि पत्रकार को सत्ता के करीब नहीं, बल्कि सत्ता की निगरानी करने वाली संस्था के रूप में काम करना चाहिए। उन्होंने कहा था कि "सत्ता से दोस्ती पत्रकारिता को बीमार कर देती है।" लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका मीडिया की है। यदि मीडिया सरकार का भोंपू बन जाएगा, तो लोकतंत्र कमजोर हो जाएगा।

आज के दौर में कुलिश जी की प्रासंगिकता

वर्तमान समय में कर्पूरचंद्र कुलिश जी के आदर्श एक प्रकाश स्तंभ की तरह हैं। आज मीडिया की विश्वसनीयता पर गहरा संकट है। उन्होंने दशकों पहले यह भांप लिया था कि यदि अखबार ने पाठक का विश्वास खो दिया, तो वह रद्दी के टुकड़े से ज्यादा कुछ नहीं है। आज के पत्रकारों और सभी मीडिया घरानों को कुलिश जी के उस मूल मंत्र को याद करने की जरूरत है कि जनहित हमेशा व्यावसायिक हितों से ऊपर होना चाहिए।

दबावों के आगे न झुकना पत्रकार का धर्म

कुलिश जी ने आपातकाल और अन्य राजनीतिक दबावों के दौर में भी अपनी रीढ़ सीधी रखी। आज जब पत्रकारों पर कॉरपोरेट और राजनीतिक दबाव पहले से कहीं ज्यादा हैं, उनका जीवन यह साहस देता है कि सत्य के लिए खड़ा होना ही पत्रकार का धर्म है। उनसे सवाल जवाब और उनके विचारों पर आधारित 'धाराप्रवाह' पुस्तक में वर्णित उनके संघर्ष नई पीढ़ी को यह सिखाते हैं कि पत्रकारिता करने के लिए सुविधाएं और संसाधन कम हो सकते हैं, लेकिन साहस कम नहीं होना चाहिए।

भारतीय भाषाओं और संस्कृति का सम्मान

कुलिश जी ने हिंदी और राजस्थानी पत्रकारिता को जो मान-सम्मान दिलाया, वह लोकतंत्र में भाषाई समानता का परिचायक है। उन्होंने सिद्ध किया कि अंग्रेजी के बिना भी प्रभावशाली और गंभीर पत्रकारिता की जा सकती है। आज जब हम अपनी भाषाओं को लेकर हीनभावना से ग्रस्त हो जाते हैं, कुलिश जी की विरासत हमें अपनी जड़ों से जुड़ने की प्रेरणा देती है।

'धाराप्रवाह' और कुलिश जी के कुछ अनमोल वचन: एक नजर

"सच कहने का साहस रखो, परिणाम की चिंता मत करो। पत्रकारिता कायरों का काम नहीं है।"

"लोकतंत्र में सबसे बड़ा पद 'नागरिक' का है, और अखबार उस नागरिक का सबसे बड़ा हथियार।"

"जहाँ अंधेरा सबसे घना हो, वहीं दीया जलाने की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।" (यह वाक्य कठिन समय में पत्रकारिता के धर्म को इंगित करता है)

कुलिश जी का जीवन एक खुली किताब की तरह

बहरहाल, कर्पूरचंद्र कुलिश जी का जीवन एक खुली किताब की तरह था-एक ऐसा प्रवाह जो कहीं रुका नहीं, कहीं कभी झुका नहीं। लोकतंत्र के प्रति उनकी निष्ठा किताबी नहीं, बल्कि व्यावहारिक थी। उन्होंने राजस्थान पत्रिका के रूप में एक ऐसे मीडिया संस्थान की नींव रखी, जो आज भी उनके मूल्यों को संजोए हुए है। आज यदि हमें भारतीय लोकतंत्र को मजबूत बनाना है, तो हमें कुलिश जी के बताए रास्ते पर चलना होगा। हमें एक ऐसे समाज का निर्माण करना होगा जहां सवाल पूछना अपराध न हो, जहां सत्ता जनता के प्रति जवाबदेह हो, और जहां मीडिया निडर होकर सच बोल सके। कुलिश जी की प्रासंगिकता न केवल आज है, बल्कि जब तक लोकतंत्र रहेगा, उनके विचार हमें सही और गलत का भेद समझाते रहेंगे।

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