पाली

कांग्रेस के 29 पार्षद, फिर भी BJP की नमिता बुबकिया कैसे बनीं पाली की महापौर? समझिए पूरा गणित

पाली नगर निगम में 29 पार्षदों के साथ सबसे बड़ा दल होने के बावजूद कांग्रेस महापौर चुनाव हार गई। बीजेपी की नमिता बुबकिया ने 33 वोट लेकर जीत दर्ज की। कांग्रेस की सुमित्रा जैन को तीन, जबकि बागी राजबाला हिंगड़ को 29 वोट मिले।
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Sep 22, 2026
pali mayor election result
जीत की खुशी मनाते हुए नमिता बुबकिया के साथ अन्य महिलाएं (पत्रिका फोटो)

-नागेश शर्मा

Pali Mayor Election Result: राजनीति में संख्या शक्ति जरूर देती है, लेकिन सत्ता तक पहुंचने के लिए उस संख्या को आखिरी वोट तक अपने साथ बनाए रखना पड़ता है। पाली नगर निगम महापौर चुनाव ने इसी सियासी सच को एक बार फिर सामने ला दिया। 65 सदस्यीय निगम में 29 पार्षदों के साथ सबसे बड़ा दल बनी कांग्रेस बहुमत के करीब होने के बावजूद महापौर की कुर्सी तक नहीं पहुंच सकी।

बीजेपी की नमिता बुबकिया ने 33 वोट हासिल कर महापौर पद पर कब्जा जमाया, जबकि कांग्रेस की अधिकृत प्रत्याशी सुमित्रा जैन को केवल 3 वोट मिले। वहीं, कांग्रेस से बगावत कर निर्दलीय मैदान में उतरी राजबाला हिंगड़ को 29 वोट मिले। बहुमत का आंकड़ा 33 था और कांग्रेस उससे महज चार कदम दूर थी, लेकिन चुनावी मैदान में पहुंचते-पहुंचते उसका अपना ही संख्या बल उसके हाथ से निकल गया।

जीत के बाद प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए नमिता बुबकिया

29 पार्षदों का मजबूत आधार था, फिर भी…

इस चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश आंकड़ों में छिपा है। कांग्रेस के पास 29 पार्षदों का मजबूत आधार था, लेकिन मतदान के दिन यही संख्या उसकी अधिकृत प्रत्याशी के साथ खड़ी नजर नहीं आई। दूसरी ओर, कांग्रेस की बागी प्रत्याशी राजबाला हिंगड़ को मिले 29 वोटों ने साफ कर दिया कि पार्टी के भीतर असंतोष कितना गहरा था। यह सिर्फ हार-जीत का अंतर नहीं था, बल्कि संगठनात्मक पकड़ और नेतृत्व के भरोसे की परीक्षा भी थी। कांग्रेस के पास संख्या थी, लेकिन उस संख्या को एक दिशा देने वाला राजनीतिक समन्वय कमजोर पड़ गया।

टिकट वितरण से ही होने लगा था 'खेला'

महापौर चुनाव की पटकथा मतदान से काफी पहले लिखी जाने लगी थी। टिकट वितरण के दौरान ही पार्टी के भीतर असंतोष के संकेत दिखाई देने लगे थे। दो सिंबल जमा नहीं हो सके और चार नामांकन खारिज हुए, फिर भी कांग्रेस 29 पार्षद जिताकर सबसे बड़ा दल बनने में सफल रही। लेकिन चुनाव के अगले चरण में असली चुनौती सामने आई, इन 29 पार्षदों को एकजुट रखना। महापौर प्रत्याशी के चयन को लेकर उठे सवालों और राजबाला हिंगड़ के बगावती तेवरों ने मुकाबले को सीधे मुकाबले से निकालकर त्रिकोणीय बना दिया। इसके बाद कांग्रेस के सामने भाजपा से ज्यादा चुनौती अपने ही खेमे को संभालने की बन गई।

जीत के बाद खुशी मनाते हुए मेयर नमिता बुबकिया

निकाय की राजनीति में संख्या बल नहीं रखता मायने

भाजपा के पास चुनाव से पहले 21 पार्षद थे। बहुमत के लिए उसे 12 अतिरिक्त वोटों की जरूरत थी। वहीं, कांग्रेस 29 के आंकड़े के साथ पहले से मजबूत स्थिति में थी। लेकिन निकाय की राजनीति में केवल संख्या होना पर्याप्त नहीं होता, उसे साथ बनाए रखना भी उतना ही जरूरी होता है। भाजपा ने अपने पक्ष में जरूरी समर्थन जुटाकर 33 का आंकड़ा छू लिया, जबकि कांग्रेस का 29 का आधार उसकी अधिकृत प्रत्याशी के बजाय बागी उम्मीदवार के खाते में चला गया।

पाली नगर निगम चुनाव से राजनीति में क्या मिलेगी सीख?

पाली नगर निगम का यह चुनाव बताता है कि निकाय राजनीति में सबसे बड़ा दल होना सत्ता की गारंटी नहीं है। चुनावी मैदान में जीत उस दल की होती है, जो अपने पार्षदों, समर्थकों और समीकरणों को आखिरी क्षण तक एकजुट रख सके। कांग्रेस के हाथ में 29 वोटों की मजबूत मुट्ठी थी, लेकिन अंदरूनी खींचतान के बीच यह पकड़ कमजोर होती गई। आखिरकार वही संख्या, जो सत्ता की सीढ़ी बन सकती थी, बिखराव की कहानी बन गई। पाली की सियासत में महापौर चुनाव का यह परिणाम आने वाले दिनों में संगठन, नेतृत्व और आपसी भरोसे को लेकर दोनों प्रमुख दलों के लिए कई सवाल छोड़ गया है।

Updated on:
22 Sept 2026 12:39 pm
Published on:
22 Sept 2026 12:38 pm