
Pali Shubham Shrishrimal: भौतिक सुख-सुविधाओं और कॉर्पोरेट दुनिया को छोड़कर आत्म-कल्याण की राह चुनना हर किसी के बस की बात नहीं होती। लेकिन पाली शहर के युवा सॉफ्टवेयर इंजीनियर शुभम श्रीश्रीमाल ने ऐसा ही एक साहसिक निर्णय लिया है। शुभम ने सालाना 40 लाख रुपए के पैकेज वाली अपनी नौकरी को अलविदा कह दिया है और अब वे संयम पथ (जैन दीक्षा) पर चलने के लिए तैयार हैं। आगामी 4 सितंबर को बीकानेर में उनका दीक्षा समारोह आयोजित होगा।
पाली की अमरनाथ कॉलोनी (बापूनगर) के निवासी शुभम का जन्म 18 सितंबर 1995 को ब्यावर में प्रदीप और पुष्पा श्रीश्रीमाल के घर हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पाली से पूरी की। इसके बाद, तकनीकी क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए उन्होंने कोटा और पटियाला से इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में बीटेक की डिग्री हासिल की। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे एक प्रतिष्ठित कंपनी में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर ऊंचे पैकेज पर कार्यरत थे।
मोटी सैलरी होने के बावजूद शुभम का मन हमेशा से आत्मकल्याण और अध्यात्म की ओर आकर्षित था। आखिरकार उन्होंने संसार का त्याग कर संयम मार्ग चुनने का दृढ़ संकल्प लिया। शुभम आगामी 4 सितंबर को आचार्य रामलाल महाराज और उपाध्याय राजेश मुनि महाराज की पावन निश्रा में बीकानेर में जैन दीक्षा ग्रहण करेंगे।
इस वैराग्य पथ की ओर बढ़ते कदम पर साधुमार्गी जैन संघ द्वारा पाली के तिलक नगर स्थित समता भवन में एक भव्य अभिनंदन समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम में समाज के पदाधिकारियों और बंधुओं ने शुभम व उनके माता-पिता का गर्मजोशी से स्वागत कर उनके इस अनुकरणीय निर्णय की सराहना की।
सिरोही जिले के सिरोड़ी गांव में एक ऐतिहासिक और भावुक कर देने वाला जैन दीक्षा महोत्सव संपन्न हुआ था। इस महोत्सव में रेखा बेन और जितेंद्र कुमार संघवी के 30 वर्षीय पुत्र हर्षित जितेंद्र संघवी ने समस्त सांसारिक वैभव, सुखों और धन-दौलत का त्याग कर संयम पथ अंगीकार कर लिया। हर्षित की दीक्षा का यह क्षण इसलिए भी विशेष था क्योंकि वे 11 बहनों के बीच इकलौते भाई हैं। उनके इस त्याग से वहां मौजूद हजारों श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं।
यह दीक्षा महोत्सव पूज्य आचार्य भगवंत श्रीमद्विजय रविरत्नसूरीश्वरजी महाराज की पावन निश्रा में संपूर्ण धार्मिक विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ संपन्न हुआ। दीक्षा ग्रहण करने के बाद आचार्य श्री ने हर्षित के नए नाम 'मुनिराज हितगुण रत्न विजय' की घोषणा की, जिससे पूरा पंडाल जयकारों से गूंज उठा। आचार्य श्री ने नूतन मुनिराज को संयम जीवन का प्रतीक 'रजोहरण' प्रदान किया और केशलोचन की विधि पूरी की।
गौरव की बात यह है कि अकेले सिरोड़ी गांव से अब तक 52 लोग संयम पथ अपना चुके हैं और हर्षित अपने संघवी परिवार से दीक्षा लेने वाले सातवें सदस्य बने हैं। दीक्षा से पूर्व नगर में हाथी, घोड़ों और बैंड-बाजों के साथ हर्षित का एक भव्य दीक्षा जुलूस (वरघोड़ा) निकाला गया। माता-पिता और परिजनों ने अश्रुपूर्ण आंखों और गर्व भरे दिल से उन्हें तिलक लगाकर संयम जीवन के लिए विदा किया।