
Bihar Makhana farming:बिहार के मिथिलांचल में जो किसान पहले पारंपरिक रूप से धान और गेहूं की खेती पर निर्भर थे, वे अब कुछ नया करने की कोशिश कर रहे हैं। इस बदलाव की मुख्य वजह मखाना है, जिसे किसान अब बहुत ज्यादा मुनाफे की वजह से 'व्हाइट गोल्ड या सफेद सोना' कह रहे हैं। ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग मिलने के बाद से न सिर्फ मिथिलांचल के मखाने की पहचान बदली है, बल्कि इसने स्थानीय किसानों की किस्मत भी बदल दी है और पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नया रूप दिया है। ज्यादा मुनाफा और कम लागत की संभावना से आकर्षित होकर, युवा और प्रगतिशील किसान तेजी से मखाने की खेती की ओर बढ़ रहे हैं।
मखाने के सुनहरे सफर की कहानी संघर्षों से भरी रही है। कुछ साल पहले तक, हैदराबाद, बेंगलुरु और दिल्ली जैसे बड़े भारतीय शहरों में लोग मखाने की अहमियत से ज्यादा वाकिफ नहीं थे। कई जगहों पर तो लोग इसके हल्के वजन और बनावट की वजह से इसे 'थर्मोकोल' कहकर मजाक भी उड़ाते थे। उस समय मखाना के लिए बाजार में 150-200 रुपये प्रति किलोग्राम की कीमत पर भी खरीदार मिलना मुश्किल होता था।
लेकिन फिर वक्त बदला और जब रिसर्च से इसके औषधीय गुणों का पता चला, तो वैज्ञानिकों और डॉक्टरों ने मखाना को 'सुपरफ़ूड' की श्रेणी में रखा। आज इसे कैल्शियम, मैग्नीशियम और फ़ॉस्फोरस जैसे जरूरी मिनरल्स का बेहतरीन स्रोत माना जाता है, जो दिल की बीमारी, कमजोर हड्डियों और डायबिटीज से जूझ रहे मरीज़ों के लिए वरदान साबित हो रहा है।
मखाने की खेती की सबसे खास बात यह है कि यह कम समय और सीमित निवेश में किसानों को बहुत अच्छा रिटर्न देती है। दरभंगा के प्रगतिशील किसान प्रदीप कुमार के अनुसार, एक बीघा जमीन या तालाब में मखाने की खेती करने में शुरुआती लागत लगभग 50,000 रुपये आती है। इस रकम में बीज, मजदूरी और रखरखाव से जुड़े खर्च शामिल होते हैं। फसल तैयार होने के बाद, अगर किसानों को बाजार में मखाने के बीज के लिए सही और उचित कीमत मिल जाती है, तो वे आसानी से प्रति बीघा 1.5 लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफ़ा कमा सकते हैं। जब किसान बिचौलियों को हटाकर कच्चे माल को खुद प्रोसेस करते हैं यानी बीजों को 'लावा' (फूले हुए मखाने) में बदलते हैं और फिर सीधे बाजार में बेचते हैं तो उनकी कमाई और बढ़ जाती है।
बिहार के मिथिलांचल इलाके के कई हिस्सों में बाढ़ और भारी बारिश की वजह से जलजमाव लंबे समय से एक बड़ी समस्या रही है। जिन गड्ढे, तालाब और जलमग्न इलाकों को कभी बेकार और पारंपरिक फसलों की खेती के लिए नामुमकिन मान कर छोड़ दिया जाता था, अब वही मखाने के रूप में 'सफेद सोना' उगल रहे हैं। पानी से भरे ये प्राकृतिक स्रोत मखाने की खेती के लिए बेहतरीन साबित हो रहे हैं। दरभंगा और मधुबनी जैसे जिलों में कई ऐसे प्रखंड हैं जहां हजारों एकड़ दलदली और जलमग्न जमीन का इस्तेमाल अब बड़े पैमाने पर मखाने की खेती के लिए किया जा रहा है।
मखाने की बढ़ती मांग को व्यवस्थित करने के लिए किसान खुद को संगठित कर रहे हैं। राज्य में 'श्री मिथिला मखाना किसान उत्पादक संघ' जैसे कई संगठन बने हैं, जो छोटे और सीमांत किसानों को एक मंच पर ला रहे हैं। सैकड़ों किसान इन संगठनों से जुड़े हैं और सामूहिक खेती व सीधे मार्केटिंग का फायदा उठा रहे हैं। एक अच्छी बात यह भी है कि जो पढ़े-लिखे युवा पहले गांवों से पलायन कर गए थे, वे अब इस फसल से होने वाले मुनाफे से आकर्षित होकर वापस लौट रहे हैं। वे आधुनिक तकनीकों, पैकेजिंग और ब्रांडिंग का इस्तेमाल करके मखाने को नए रूपों में बाजार में ला रहे हैं।
मिथिला के मखाने को मिले GI टैग ने दुनिया भर के अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों तक पहुंचने का रास्ता साफ कर दिया है। इस वैश्विक पहचान के बाद, खाड़ी देशों, अमेरिका और यूरोपीय बाजारों में मखाने का निर्यात तेज़ी से बढ़ा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती मांग ने स्थानीय कीमतों को स्थिर किया है, जिससे किसानों को अपनी उपज बहुत कम दामों पर बेचने की मजबूरी से राहत मिली है। सरकार प्रोसेसिंग और कोल्ड स्टोरेज जैसी सुविधाओं को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी और ट्रेनिंग प्रोग्राम भी चला रही है, जिससे उम्मीद है कि भविष्य में बिहार के मखाने की वैश्विक मौजूदगी और मजबूत होगी।