
Bihar Politics देवेश कुमार के एमएलसी पद से इस्तीफे के बाद बिहार का सियासी तापमान बढ़ गया है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा शुरू हो गई है कि क्या भूमिहार समाज बीजेपी के लिए सिर्फ वोट बैंक बनकर रह गया है। बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के मतदान के तुरंत बाद देवेश कुमार ने एमएलसी पद से इस्तीफा दे दिया। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि पार्टी चुनाव तक इस मुद्दे पर चुप रही और मतदान संपन्न होने के बाद पार्टी के निर्देश पर उनसे इस्तीफा लिया गया।
यह भी चर्चा है कि उपेंद्र कुशवाहा के बेटे और बिहार सरकार के मंत्री दीपक प्रकाश का मंत्री पद बचाने के लिए बीजेपी ने भूमिहार समाज से आने वाले देवेश कुमार की राजनीतिक कुर्बानी दी। इसी के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या बीजेपी भूमिहार समाज के साथ समान व्यवहार नहीं कर रही है।
बिहार में भूमिहार समाज की आबादी करीब सात प्रतिशत मानी जाती है। हालांकि संख्या कम होने के बावजूद कई विधानसभा क्षेत्रों में इस समाज का प्रभाव निर्णायक माना जाता है। लंबे समय तक कांग्रेस का समर्थक रहा यह समाज बाद में बड़ी संख्या में बीजेपी के साथ जुड़ा था। लेकिन अब इसी समाज के एक वर्ग में उपेक्षा की भावना देखने को मिल रही है।
नाम नहीं छापने की शर्त पर एक भूमिहार नेता ने कहा कि बीजेपी "आग से खेल रही है।" उनका कहना है कि लालू प्रसाद यादव भी इस समाज की नाराजगी का राजनीतिक असर देख चुके हैं और बीजेपी को उससे सबक लेना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में भी पार्टी को इसका संकेत मिल चुका है, लेकिन इसके बावजूद नेतृत्व इस नाराजगी को गंभीरता से नहीं ले रहा है।
देवेश कुमार के इस्तीफे के साथ-साथ भूमिहार समाज के कुछ लोग नीट छात्रा के कथित दुष्कर्म और हत्या के मामले का भी जिक्र कर रहे हैं। उनका आरोप है कि उस मामले में भी समाज को न्याय नहीं मिला। वहीं, भरत तिवारी एनकाउंटर मामले का हवाला देते हुए उनका कहना है कि पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ में उनकी हत्या कर दी। उनका दावा है कि यदि बांकीपुर उपचुनाव के दौरान यह मुद्दा नहीं उठता तो सरकार इस मामले को गंभीरता से भी नहीं लेती। इन घटनाओं के आधार पर समाज के कुछ लोगों का कहना है कि बीजेपी को अब भूमिहार समाज की राजनीतिक जरूरत महसूस नहीं हो रही है।
देवेश कुमार के मुद्दे के साथ समाज के लोग बिहार के उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा का मामला भी उठा रहे हैं। बीजेपी के कुछ नेताओं का कहना है कि पहले उनसे राजस्व विभाग वापस लिया गया और बाद में आम लोगों के हित में उनके द्वारा लिए गए कई फैसलों में भी बदलाव कर दिया गया। उनका मानना है कि इन घटनाओं से यह संदेश गया है कि पार्टी धीरे-धीरे भूमिहार समाज को राजनीतिक रूप से किनारे कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भूमिहार समाज कई विधानसभा क्षेत्रों में चुनावी परिणाम प्रभावित करने की क्षमता रखता है। उनका कहना है कि यदि नीट छात्रा मामले, भरत तिवारी एनकाउंटर और अन्य मुद्दों को लेकर समाज की नाराजगी बढ़ती है, तो इसका असर आगामी विधानसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है।