Former DGP Abhayanand on Bharat Tiwari encounter: भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामले में बिहार के पूर्व डीजीपी अभ्यानंद की एंट्री हो गई है। उन्होंने वायरल वीडियो और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि अदालत में आत्मसमर्पण के बाद गोली चलने की बात साबित हुई, तो मामला एनकाउंटर नहीं बल्कि हत्या के दायरे में आ सकता है।

Bharat Tiwari encounter controversy Bihar: बिहार के भोजपुर जिले के शाहपुर में हुए भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर और उसमें पुलिस की कार्रवाई की सच्चाई पर सवाल उठाने वालों में अब बिहार के एक ऐसे शख्स का नाम जुड़ गया है, जिनकी ईमानदारी और कड़क पुलिसिंग की मिसाल आज भी दी जाती है। बिहार के पूर्व DGP अभयानंद ने कहा कि सोशल मीडिया और न्यूज़ चैनलों पर चल रहे वीडियो फुटेज के आधार पर यह पूरी घटना एनकाउंटर नहीं, बल्कि सीधे-सीधे हत्या का मामला प्रतीत होती है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यह मामला कोर्ट में साबित हो गया, तो इसमें शामिल पूरी पुलिस टीम को अपनी जिंदगी सलाखों के पीछे काटनी होगी।
घटना के समय मृतक भरत तिवारी द्वारा किए जा रहे फेसबुक लाइव और मीडिया में आए वीडियो क्लिप्स को लेकर पूर्व डीजीपी अभ्यानंद ने कहा, "वीडियो में दिखाई दे रहा है कि उस अकेले व्यक्ति ने अपना हथियार नीचे फेंक दिया था। वह निहत्था था और उसकी तरफ से कोई फायरिंग नहीं हो रही थी। जब कोई अपराधी आत्मसमर्पण कर दे या हथियार डाल दे, तो उसे घेरकर गोली मार देना एनकाउंटर नहीं कहलाता। अगर ट्रायल के दौरान यह बात अदालत में साबित हो गई, तो गोली मारने वाले पुलिसकर्मी को लोअर कोर्ट से मृत्युदंड होगी और टीम के अन्य पुलिसकर्मियों को आजीवन कारावास भुगतनी पड़ेगी। इस धारा में तीसरी कोई सजा होती ही नहीं है।"
जब उनसे पुलिस के इस आधिकारिक दावे पर सवाल पूछा गया कि भरत ने पिस्टल फेंकने के बाद उसे दोबारा उठाकर पुलिस पर तानने और गोली चलाने की कोशिश की थी, इसलिए आत्मरक्षार्थ गोली चलानी पड़ी, तो अभ्यानंद जी ने कहा, "यह पुलिस का अपना डिफेंस है। जब कोई कानून का रखवाला 'राइट ऑफ प्राइवेट डिफेंस' का सहारा लेता है, तो उसे कोर्ट में यह साबित करने का पूरा जिम्मा उसी पर होता है। यह दो-चार दिन की बात नहीं है, पुलिस को अपनी बेगुनाही साबित करने में 10 साल भी लग सकते हैं। यह एक लंबी कानूनी लड़ाई होगी।"
बिहार पुलिस में हाल के दिनों में बढ़ते एनकाउंटर कल्चर और ऑपरेशन लंगड़ा जैसी कार्रवाइयों पर तंज कसते हुए पूर्व डीजीपी ने जूनियर अधिकारियों और दरोगाओं को संदेश दिया।
उन्होंने कहा, "आजकल एनकाउंटर को एक बहादुरी के काम की तरह पेश किया जा रहा है। जूनियर अफसर लोग खुश हो जाते हैं कि उन्हें गैलेंट्री मेडल मिल जाएगा, उनकी पीठ थपथपायी जाएगी। इसी उत्साह में वे कानून हाथ में लेकर गोली चला देते हैं। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि जब मामला फंसता है और मानवाधिकार आयोग या अदालतें शिकंजा कसती हैं, तो जो बड़े साहब लोग आज एनकाउंटर पर तालियां बजा रहे हैं, वे सबसे पहले अपना किनारा पकड़ लेंगे। दरोगा जी अकेले सस्पेंड होंगे, जेल जाएंगे और उनका परिवार बर्बाद होगा। पुलिसकर्मियों को खुद समझना चाहिए कि शॉर्टकट के चक्कर में वे अपनी जिंदगी दांव पर लगा रहे हैं।"
अभ्यानंद जी ने अपनी 36 साल की लंबी आईपीएस (IPS) सेवा के दौरान, नक्सल प्रभावित जिलों में एसपी रहने के बावजूद और खुद 22 एनकाउंटर्स को लीड करने के बाद भी एक बार भी अपनी सर्विस रिवॉल्वर से फायर नहीं किया था। इस रिकॉर्ड के पीछे की रणनीति समझाते हुए उन्होंने कहा, "पुलिसिंग ताकत से नहीं, दिमाग से होती है। जब एक कप्तान (SP या DIG) किसी ऑपरेशन या एनकाउंटर को लीड करता है, तो उसका काम खुद बंदूक चलाकर आत्मरक्षा करना नहीं होता, बल्कि अपनी पूरी टीम के एक-एक सिपाही को सुरक्षित रखना होता है। अगर मैं खुद .32 या 9एमएम की पिस्टल लेकर 25 गज की रेंज में निशाना लगाने बैठ जाऊंगा, तो मेरा दिमाग शांत नहीं रह पाएगा।"
अभ्यानंद ने कहा, "लीडर का काम फायर करना नहीं, बल्कि फायर को डायरेक्ट करना होता है। उसे ठंडे दिमाग से सोचना होता है कि कब आगे बढ़ना है, कब पीछे हटना है और किधर से घेराबंदी करनी है। यूपीएससी पास करके आने वाले आईपीएस अधिकारी सिर्फ फाइलों पर दस्तखत करने या शॉर्टकट अपनाने के लिए नहीं बने हैं, उनका काम कानून की चौहद्दी के भीतर रहकर क्रिएटिव सॉल्यूशंस निकालना है।"