पटना के जाने-माने शिक्षक खान सर अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते हैं। एक पॉडकास्ट में, उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजराइल यात्रा के संबंध में भारतीय खुफिया एजेंसियों और विदेश मंत्रालय के कामकाज पर सवाल उठाए हैं। यह यात्रा मध्य पूर्व में जारी तनाव शुरू होने से ठीक पहले हुई थी। इसके अलावा खान सर ने पॉडकास्ट में की अन्य मुद्दों पर भी बात की।
मुश्किल विषयों को अपने अनोखे अंदाज में आसान तरीके से समझाने के लिए मशहूर, पटना के शिक्षक खान सर हाल ही में राज शमानी के पॉडकास्ट 'फिगरिंग आउट' में नजर आए। इस एपिसोड के दौरान, उन्होंने इजराइल-ईरान जंग, अमेरिकी डॉलर के भविष्य, अंतरराष्ट्रीय राजनीति, भारत की विदेश नीति और उसकी खुफिया प्रणालियों से जुड़े कई अहम सवाल उठाए। खान सर ने साफ तौर पर कहा कि जब हम कूटनीति की बात करते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान किसी एक सार्वजनिक चेहरे पर होता है, जबकि असली खिलाड़ी तो पर्दे के पीछे रहकर काम करते हैं।
विदेश मंत्रालय (MEA) के कामकाज पर टिप्पणी करते हुए, खान सर ने कहा कि भले ही लोग अक्सर सारा श्रेय विदेश मंत्री एस. जयशंकर को देते हैं, लेकिन असलियत इससे कहीं ज्यादा गहरी है। उन्होंने कहा, 'जब भी हम विदेश मंत्रालय की बात करते हैं, तो हमारा ध्यान सिर्फ एस. जयशंकर पर ही जाता है। लेकिन, असली मेहनत तो मंत्रालय में उनके नीचे काम करने वाले लोग करते हैं। जयशंकर साहब तो वहां जाकर चीजों को बस डिलीवर करते हैं।'
खान सर ने कहा कि नीतियों और रणनीतियों को जमीन पर उतारने वाले गुमनाम अधिकारियों की मेहनत ही भारत को वैश्विक मंच पर मजबूती देती है। उन्होंने कहा कि यह समझना जरूरी है कि किसी भी बड़ी कूटनीतिक पहल के पीछे पूरी टीम की सामूहिक कोशिश होती है, भले ही जनता के सामने सिर्फ एक ही प्रतिनिधि चेहरा पेश किया जाता हो।
पॉडकास्ट के दौरान, फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजराइल यात्रा का जिक्र करते हुए, खान सर ने भारत के खुफिया तंत्र की कड़ी आलोचना की। उन्होंने तर्क दिया कि जब दुनिया यह देखती है कि भारत ने अपने प्रधानमंत्री को युद्ध शुरू होने से ठीक एक दिन पहले उस इलाके में भेजा, तो इससे हमारी खुफिया एजेंसियों की विश्वसनीयता पर सवाल उठना लाजमी है।
कड़ी आलोचना करते हुए खान सर ने कहा, "अगर हमें यह पता ही नहीं था कि कोई जंग होने वाली है, तो इससे यह समझ आता है कि पुलवामा, पहलगाम या ताज होटल जैसे हमले क्यों होते हैं। विदेश यात्राओं के दौरान, आमतौर पर हर कदम बेहद सावधानी और सोच-समझकर उठाया जाता है। अगर हमारी खुफिया एजेंसियों को यह पता होता कि जमीनी हालात इतने ज्यादा तनावपूर्ण हैं, तो यह यात्रा आखिरी मिनट में रद्द भी की जा सकती थी।'
खान सर ने यह भी स्वीकार किया कि वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति अत्यंत जटिल है। उन्होंने कहा कि भारत को एक ही समय में अमेरिका, रूस, चीन और अरब देशों के साथ एक नाजुक संतुलन बनाए रखने के लिए विवश होना पड़ता है। हम मैन्युफैक्चरिंग के लिए चीन पर, हथियारों के लिए मल्टीपोलर सपोर्ट (इजराइल, फ्रांस, अमेरिका और रूस) पर, और तेल के लिए अरब देशों पर निर्भर हैं। इन परिस्थितियों में, तटस्थता बनाए रखना एक जरूरत भी है और एक रणनीतिक अनिवार्यता भी। हालांकि, न्यूट्रल रहना किसी एक पक्ष की तरफ झुकाव जैसा नहीं दिखना चाहिए।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर चर्चा करते हुए, खान सर ने दावा किया कि अमेरिका इस समय 40 ट्रिलियन डॉलर के भारी कर्ज में डूबा हुआ है। उन्होंने एक चौंकाने वाली थ्योरी पेश की, जिसमें उन्होंने दावा किया कि अमेरिका इस कर्ज को चुकाने के लिए क्रिप्टोकरेंसी का सहारा ले सकता है।
खान सर के अनुसार, अमेरिका इस समय भारी मात्रा में बिटकॉइन और अन्य क्रिप्टोकरेंसी जमा कर रहा है। उन्होंने यह तर्क दिया कि भविष्य में किसी समय, अमेरिका क्रिप्टोकरेंसी में अपना कर्ज चुकाने की घोषणा कर सकता है, यह एक ऐसा कदम होगा जिससे क्रिप्टो संपत्तियों के मूल्य में अचानक भारी उछाल आ जाएगा। एक बार जब कर्ज चुका दिए जाएंगे, तो अमेरिका जान-बूझकर क्रिप्टो बाजार को क्रैश कर सकता है, जिससे बाकी दुनिया के पास ऐसी क्रिप्टो संपत्तियां रह जाएंगी जो लगभग बेकार हो चुकी होंगी।
बातचीत के दौरान, खान सर ने वैश्विक आर्थिक पर भी अपने विचार साझा किए। उन्होंने तर्क दिया कि यदि BRICS देश अपनी खुद की एक करेंसी लाते हैं, तो इससे अमेरिकी डॉलर को एक जबरदस्त झटका लग सकता है। उन्होंने कहा कि जिस दिन भारत, चीन और रूस मिलकर अपनी BRICS करेंसी लॉन्च करेंगे, वह दिन डॉलर के लिए अब तक का सबसे बड़ा खतरा साबित होगा। ईरान ने पहले ही डॉलर को छोड़ने और तेल व्यापार के सौदे चीनी युआन में करने की अपनी मंशा की घोषणा करके अमेरिका की दुखती रग पर हाथ रख दिया है।
खान सर ने अमेरिकी राजनीति और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर भी निशाना साधा। ट्रंप को बड़बोला बताते हुए, उन्होंने टिप्पणी की कि अमेरिकी समाज अब दोहरे मापदंडों की व्यवस्था पर चलता है। उन्होंने बताया कि भारत में, किसी राजनेता का करियर एक ही विवाद के कारण तुरंत खत्म हो सकता है, जैसा कि पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा साहब के पोते के मामले में देखा गया था। लेकिन अमेरिका में ट्रंप एपस्टीन फाइल्स में नाम होने के बावजूद स्वीकार्य हैं। यह दिखाता है कि वहां नैतिकता का स्तर क्या है।