पटना

6 महीने की सीमा खत्म, फिर बिना MLA-MLC बने दोबारा कैसे बने मंत्री? सुप्रीम कोर्ट पहुंचा उपेंद्र कुशवाहा के बेटे का मामला

Minister Deepak Prakash: बिहार की राजनीति में दीपक प्रकाश कुशवाहा को पंचायती राज मंत्री के तौर पर दोबारा नियुक्त करने को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की है। उन्होंने इस कदम को चुनौती देते हुए कहा है कि बिना किसी सदन का सदस्य हुए उन्हें दोबारा मंत्री बनाना संविधान के अनुच्छेद 164(4) का सीधा उल्लंघन है।
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Updated: 8 Jun 2026, 12:54 PM IST
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पिता उपेंद्र कुशवाहा के साथ मंत्री दीपक प्रकाश (फोटो- फेसबुक)

Minister Deepak Prakash: राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के बेटे और बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश कुशवाहा की दोबारा मंत्री पद पर नियुक्ति को देश की सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी गई है। यह रिट याचिका सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह द्वारा दायर की गई है। जिसमें कहा गया है कि दीपक प्रकाश वर्तमान में किसी भी सदन के सदस्य नहीं है, इसके बावजूद उन्हें दोबारा मंत्री बनाया गया।

क्या है पूरा विवाद और संवैधानिक पेंच?

याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क संविधान के अनुच्छेद 164(4) पर आधारित है। इस नियम के तहत कोई व्यक्ति जो बिहार विधानसभा या विधान परिषद (किसी भी सदन) का सदस्य नहीं है, वह अधिकतम छह महीने की अवधि के लिए मंत्री पद संभाल सकता है। नियम के अनुसार, ऐसे व्यक्ति के लिए इस तय समय-सीमा के भीतर किसी एक सदन की सदस्यता हासिल करना अनिवार्य है।

दीपक प्रकाश को पहली बार 20 नवंबर 2025 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री नियुक्त किया गया था, जबकि वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। बाद में 15 अप्रैल 2026 को सरकार गिरने पर मंत्रिपरिषद भंग हो गई। हालांकि, विवाद तब बढ़ गया जब मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बनी नई सरकार में 7 मई 2026 को उन्हें फिर से मंत्री पद की शपथ दिलाई गई। याचिकाकर्ता का तर्क है कि उनकी पहली शपथ से गिनी जाने वाली छह महीने की संवैधानिक अवधि 20 मई 2026 को समाप्त हो गई थी। इस संदर्भ में सरकार बदलने के बहाने उन्हें दोबारा मंत्री नियुक्त करना संविधान की मूल भावना के पूरी तरह खिलाफ है।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का हवाला

सर्वोच्च न्यायालय में दायर इस याचिका में कोर्ट के ही एक बेहद चर्चित और ऐतिहासिक फैसले S.R. Chaudhuri v. State of Punjab का हवाला दिया गया है। इस अहम फैसले में कोर्ट ने साफ तौर पर स्पष्ट किया था कि अनुच्छेद 164(4) के तहत गैर-विधायक को दी गई छह महीने की छूट एक बार मिलने वाली, अस्थायी व्यवस्था है और इसका बार-बार इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

याचिका में तर्क दिया गया है कि छह महीने की इस अवधि को सिर्फ इसलिए फिर से शुरू नहीं किया जा सकता क्योंकि मुख्यमंत्री बदल गए हैं, कैबिनेट भंग हो गई है या दोबारा नियुक्ति हुई है। अगर ऐसी मिसाल को मान लिया जाए, तो कोई भी सरकार किसी व्यक्ति को बिना चुनाव जीते बार-बार मंत्री बना सकती है, जो लोकतंत्र के मूल ढांचे और संसदीय प्रणाली को कमजोर कर देगी। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से मांग की है कि दीपक प्रकाश से यह पूछा जाए कि वे किस संवैधानिक अधिकार के तहत अभी भी इस पद पर बने हुए हैं।

MLC चुनाव में भी नहीं मिला टिकट

एक तरफ जहां दीपक प्रकाश कानूनी पेंच में घिरे हैं, वहीं दूसरी तरफ बिहार विधान परिषद चुनाव में भी दीपक प्रकाश को उम्मीदवार नहीं बनाया गया है। एनडीए ने अपने कोटे के सभी उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर दी है, लेकिन इसमें उपेंद्र कुशवाहा के बेटे का नाम शामिल नहीं है। ऐसे में दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर बने रहने की उलटी गिनती शुरू हो गई है। यदि उन्हें कोई तकनीकी अस्पष्टता का लाभ मिलता भी है, तो भी वे बिना विधायक या विधान पार्षद बने अधिकतम नवंबर के पहले हफ्ते तक ही मंत्री रह पाएंगे।

Updated on:
8 Jun 2026, 12:54 PM IST
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