
Chhattisgarh Tree Plantation: एक ओर जहां विकास की दौड़ में हर दिन हजारों पेड़ कट रहे हैं और जंगल सिकुड़ते जा रहे हैं, वहीं दुर्ग जिले के पाटन ब्लॉक के छोटे से गांव बड़े औंरी के 65 वर्षीय देवचरण साहू ने यह साबित कर दिया कि यदि इरादे मजबूत हों तो अकेला व्यक्ति भी प्रकृति का भविष्य बदल सकता है। जिस एक एकड़ जमीन को कभी लोग बंजर, पथरीली और बेकार मानते थे, आज उसी जमीन पर 1000 से अधिक पेड़ों का घना मिनी जंगल लहलहा रहा है। यह कहानी केवल पेड़ लगाने की नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति समर्पण, संघर्ष, धैर्य और अटूट विश्वास की कहानी है। यह उस इंसान की तपस्या है जिसने पेड़ों को केवल पौधे नहीं, बल्कि अपने बच्चों की तरह पाला।
देवचरण साहू का प्रकृति प्रेम बचपन से ही शुरू हो गया था। स्कूल के दिनों में उन्होंने गांव के आसपास बरगद और पीपल के पौधे लगाए थे। समय बीता और वे पौधे विशाल वृक्ष बन गए। आज भी उनकी छांव राहगीरों को राहत देती है। इन्हीं पेड़ों ने देवचरण के भीतर प्रकृति के लिए कुछ बड़ा करने का संकल्प जगाया।
वर्ष 2001 में उन्होंने गांव की एक बंजर और पथरीली एक एकड़ जमीन को हराभरा बनाने का निर्णय लिया। यह फैसला आसान नहीं था। आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी। कोई सरकारी सहायता नहीं मिली। सिंचाई की व्यवस्था भी नहीं थी। लेकिन देवचरण के इरादे अडिग थे। उनकी पत्नी यशोदा साहू और परिवार ने हर कदम पर उनका साथ दिया। पूरे परिवार ने पौधों को अपने बच्चों की तरह संभाला। तेज धूप, गर्म हवाएं और पानी की कमी जैसी तमाम कठिनाइयों के बीच एक-एक पौधा बड़ा होता गया।
देवचरण की वर्षों की मेहनत उस समय बर्बाद होती नजर आई, जब वर्ष 2012-13 में कुछ असामाजिक तत्वों ने रंजिश के चलते उनकी नर्सरी में घुसकर करीब 500 हरे-भरे पेड़ों को काट दिया। सुबह जब देवचरण वहां पहुंचे तो चारों ओर कटे हुए तने और बिखरी शाखाएं थीं। जिस हरियाली को उन्होंने वर्षों तक सींचा था, वह पलभर में उजड़ चुकी थी। यह किसी भी इंसान के लिए हार मान लेने वाला क्षण हो सकता था। लेकिन देवचरण ने हार नहीं मानी।
पेड़ कट चुके थे, लेकिन उनकी जड़ें अभी जीवित थीं। देवचरण ने हर दिन आधा किलोमीटर दूर स्थित नाले से कांवर में पानी भरकर लाना शुरू किया। वे कटे हुए ठूंठों पर पानी डालते, उनकी देखभाल करते और उम्मीद नहीं छोड़ते। दिन, सप्ताह और महीने बीतते गए। एक दिन उन्हीं ठूंठों से छोटी-छोटी हरी कोंपलें निकलने लगीं। धीरे-धीरे वे कोंपलें फिर पेड़ बन गईं। आज वही पेड़ घने वृक्षों का रूप लेकर हवा में झूम रहे हैं।यह केवल प्रकृति का चमत्कार नहीं, बल्कि एक व्यक्ति की अटूट निष्ठा और धैर्य की जीत है।
65 वर्ष की उम्र में भी देवचरण का उत्साह कम नहीं हुआ है। अब उनका लक्ष्य अपनी नर्सरी में 50 विभिन्न प्रजातियों के पौधे तैयार करना और 108 चंदन के वृक्ष लगाना है। वे हर वर्ष पर्यावरण प्रेमियों, युवाओं और विद्यार्थियों को अपनी नर्सरी में बुलाते हैं, उन्हें पौधरोपण के लिए प्रेरित करते हैं और प्रकृति संरक्षण का संदेश देते हैं।
आज इस एक एकड़ के हरित क्षेत्र में सीताफल, जामुन, आंवला, कटहल, बेल, करंज, बरगद और पीपल जैसी 35 अलग-अलग प्रजातियों के फलदार व छायादार पेड़ झूम रहे हैं। एक समय सूखी और वीरान दिखाई देने वाली जमीन अब पक्षियों की चहचहाहट, हरियाली और प्राकृतिक जैव विविधता का केंद्र बन चुकी है।
देवचरण बताते हैं कि उन्होंने यह पूरा काम बिना किसी विशेष सरकारी सहायता के किया। आर्थिक परेशानियां भी आईं, लेकिन उन्होंने कभी अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया। उनका मानना है कि यदि हर व्यक्ति अपने जीवन में कुछ पेड़ लगा दे और उनकी जिम्मेदारी भी निभाए, तो पर्यावरण की बड़ी समस्याओं का समाधान संभव है।
देवचरण साहू की कहानी हमें यह सिखाती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि मन में प्रकृति के प्रति प्रेम और संकल्प हो तो बंजर जमीन पर भी जंगल उगाया जा सकता है। 500 पेड़ों के कट जाने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। कांवर में पानी ढोकर उन्होंने सिर्फ पेड़ों को नहीं, बल्कि उम्मीद को भी जीवित रखा। आज उनका यह मिनी जंगल आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देता है कि धरती को बचाने के लिए बड़े संसाधनों की नहीं, बड़े इरादों की जरूरत होती है।